आज के चित्र – मेदिनीपुर, पठखौली और इटवा

घास छीलने वाली सवेरे सवेरे निकल पड़ी थीं। आपस में बोल बतिया भी रहे थीं। गर्मी बढ़ रही है। गाय-गोरू के लिये घास मिलनी कम हो गयी है। उसके लिये इन महिलाओं को अब ज्यादा मशक्कत करनी पड़ने लगी है।


मेदिनीपुर, पठखौली, इटवा उपरवार, हुसैनीपुर/महराजगंज, बनवारीपुर, दिघवट – ये मेरे लिये वैसे ही नाम हैं, जैसे कोई देश-परदेश वाला बोस्टन, मासेचुसेट्स, कैलीफोर्निया, फ्लोरिडा, स्टॉकहोम, शांघाई और सिंगापुर के बारे मेँ कहता होगा।

मेरे बिट्स, पिलानी के बैचमेट्स और रेलवे के वेटरन अफसरों ने मुझे ह्वाट्सएप्प ग्रुपों मेँ मुझे जोड़ रखा है। उन ग्रुपों में वे लोग इन बड़े बड़े जगहों की बात करते हैं। कोई खुद वहां हैं, किसी के बच्चे वहां हैं। और कुछ तो अभी एक्टिव हैं और अपने कामधाम के सिलसिले में इन स्थानों की यात्रा करते रहते हैं। पर मेरे जीवन में तो यही आसपास के गांव और बटोही – मेरी साइकिल की सवारी भर है। 😦

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डेल्हीवरी के नीरज मिश्र

नीरज अपने नियमित कस्टमर से आत्मीय सम्पर्क भी रखते हैं। मुझे पैर छू कर प्रणाम करते हैं – संक्रमण काल में थोड़ा दूरी से।


भदोही के इस इलाके में सभी कुरियर कम्पनियां ठप्प हो गयी हैं कोरोनासंक्रमण के समय। सिर्फ़ डेलिह्वरी (Delhivery) नामक कम्पनी काम कर रही है।

नीरज कुमार मिश्र

कल कम्पनी के भदोही कार्यकर्ता नीरज कुमार मिश्र आये। मेरा दवाई का पैकेट देने। बताया कि और किसी कुरियर कम्पनी का भी अगर पैकेट होता है तो उसे इन्ही को दिया जाता है डिलिवर करने के लिये। नीरज अपनी कम्पनी से जुड़ाव में गर्व महसूस करते हैं। वे अपने मोबाइल में कम्पनी के सी.ई.ओ. साहिल बरुआ का चित्र भी दिखाते हैं और बताते हैं कि बरुआ जी से मिल भी चुके हैं।

“साहिल बरुआ हम लोगों को नाम से जानते हैं।”

बरुआ की यह कुरियर कम्पनी 2011 में स्थापित हुई। पिछले तीन साल में यहां इसी कम्पनी की सेवायें मुझे सबसे कार्यकुशल लगीं। अमेजन वालों ने भी अपनी सेवा शुरू की थी और उससे उनका व्यवसाय बढ़ा भी; पर कोविड19 के इस समय वे बुरी तरह लड़खड़ा गये। उनके पैकेट्स पिछले एक माह में अब तक नहीं मिल पाये हैं मुझे। जब कि सारे प्री-पेड हैं। उनका एक पैकेट तो डेल्हिवरी के माध्यम से नीरज ही ले कर आये!

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