विष्णु मल्लाह – गंगा-नाव-मछली ही उसका जीवन है!


वह नाव के एक सिरे पर बैठा डांड/पतवार के साथ। दूसरी ओर उसका जाल पड़ा था। मैं नाव के फ़र्श पर बीच में बैठा। वह नाव चलाने लगा और मैं उससे उसके बारे में पूछने लगा।

मचिये के लिये मिला राजबली विश्वकर्मा से


राजबली का परिवार अलाव जला कर कोहरे में गर्माहट तलाशता बैठा था। आकर्षक मूछों वाले राजबली एक मोटे लकड़ी के टुकड़े को बसुले से छील भट्ठा पर काम करने वालों के लिये खड़ाऊँ बना रहे थे।

मोहनलाल, सूप वाला


गजब के आदमी मिले सवेरे सवेरे मोहनलाल। आशा और आत्मविश्वास से परिपूर्ण। कर्मठता और जिन्दगी के प्रति सकारात्मक नजरिये से युक्त। इस इलाके के निठल्ले नौजवानों के लिये एक मिसाल।

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