मानिक सेठ और कस्बे में कैशलेस


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माणिक सेठ, महराजगंज, जिला भदोही के दुकानदार 

मानिक सेठ की महराजगंज, जिला भदोही में किराने की दुकान है। नोटबन्दी के बाद उनकी पहली दुकान थी, जहां मैने कैशलेस ट्रांजेक्शन का विकल्प पाया। पच्चीस नवम्बर की शाम थी। नोटबन्दी की हाय हाय का पीक समय। वे पेटीएम के जरीये पेमेण्ट लेने को तैयार थे। मैने अपने मोबाइल से पेमेण्ट करना चाहा पर इण्टरनेट का सिगनल नहीं मिला। मानिक ने कहा कि वे वाई-फाई ऑन कर सकते हैं। खैर, रिलायंस जियो मौके पर जिन्दा हो गया और मैने महराजगंज कस्बे में पहला वेलेट के माध्यम से कैश लेस पेमेण्ट किया। इसके पहले ऑन लाइन खरीद, मोबाइल रीचार्ज या टेलीफोन का बिल पेमेण्ट मैं ऑनलाइन किया करता था। वह नोटबन्दी के पहले भी होता था। पर फुटकर खरीद में पहला गंवई प्रयोग था।

इस लिये मैं मानिक सेठ को भूल नहीं पाया।

एक बार और उनकी दुकान पर गया। मानिक वहां नहीं थे। उनके बड़े भाई थे। उन्होने बताया कि छोटा भाई ही पेटीएम-वेटियम जानता है। वही अपने मोबाइल से करता है। बाहर गया हुआ है, इसलिये कैशलेस पेमेण्ट नहीं हो पायेगा।

आज, लगभग एक महीने के बाद सवेरे अपने साइकल-भ्रमण के समय बाजार पंहुच गया। दुकाने नहीं खुली थीं। मुझे टॉर्च के लिये बैटरी लेनी थी। देखा; माणिक दुकान का ताला खोल रहे थे। मैने इन्तजार किया। सवेरे मैं अपना मोबाइल लिये हुये नहीं था, अत: पेमेण्ट तो कैश से किया पर माणिक से पूछा – कैशलेस ट्रांजेक्शन कैसे चल रहे हैं?

“ज्यादा नहीं। लोग ढर्रा बदलना नहीं चाहते। मैं खुद इण्टरनेट, फेसबुक, ऑनलाइन खरीद और वेलेट का प्रयोग करता हूं। पर आसपास लोग नहीं करते। करीब डेढ-दो हजार रुपये महीने का ट्रांजेक्शन हो जाता है; वेलेट और ऑनलाइन खरीद को ले कर।”  

तब भी अच्छा है। लोगों को सिखाइये। लोगों के बारे में फ़ेसबुक पर बताइये। 

उसमें झंझट है। लोग सीखना नहीं चाहते। और यहां की बात फ़ेसबुक में लिखना रिस्की है। मैं अपने बारे में फेसबुक पर लिखता नहीं। कोई जानकारी नहीं देना चाहता। क्या पता क्या लफ़ड़ा हो जाये। बाहर हो आया हूं। वहां की कोई यार-दोस्त इधर-उधर की फोटो डाल दे या कुछ लिख ही दे तो बैठे बिठाये मुसीबत हो जाये। 

मैने माणिक को अपना फेसबुक पर लिखा दिखाया। जिसमें अपने परिवेश के बारे में (और अपने बारे में भी) जैसा है, वैसा लिखा है। और यह भी बताया कि मुझे तो कोई कभी झमेला नहीं हुआ। मैने सुझाव दिया कि माणिक अपने परिवेश – बाजार, दुकान और लोगों की सोच के बारे में पोस्ट करें।

माणिक ने हां-हां तो की; पर जैसा मुझे लगा कि जवान आदमी बहुत कन्वीन्स्ड नहीं है। आखिर मैं अपनी और उसकी तुलना तो नही कर सकता। जवान आदमी की अपनी उमंगे हैं, अपने भय।

पर माणिक मुझे ऊसर गंवई जीवन में नये प्रकार के जीव मिले। शायद भविष्य में भी उनसे सम्पर्क रहे।

एक भाग्यशाली (?!) नौजवान से मुलाकात


अमित पाण्डेय। मेडिकल रिप्रजेण्टेटिव। मुझे रथयात्रा, वाराणसी में सोनू उपाध्याय के दफ़्तर में मिले।
अमित पाण्डेय। मेडिकल रिप्रजेण्टेटिव। मुझे रथयात्रा, वाराणसी में सोनू उपाध्याय के दफ़्तर में मिले।

(यह मैने बतौर फेसबुक नोट पोस्ट किया हुआ है। ब्लॉग पर इसका परिवर्धित रूप रख रहा हूं। दस्तावेज के लिये।)

वाराणसी में मैं सोनू (प्रमेन्द्र) उपाध्याय के रथयात्रा स्थित मेडिकल स्टाक-दफ़्तर में बैठा था। सोनू मेरे बड़े साले साहब (देवेन्द्र नाथ दुबे जी) के दामाद हैं। अत्यन्त विनम्र और सहायता को तत्पर सज्जन। वे मेरे लिये एक आवश्यक औषधि मंगवा रहे थे थोक विक्रेता के यहां से। उनका जो कर्मचारी औषधि लेने गया था, वह जाम में फंस गया था। उसके आने में देरी हो रही थी। सोनू आवाभगत में हमें (मेरी पत्नीजी और मुझको) एक-एक कुल्हड़ (उम्दा) चाय पिला चुके थे। हम आपस में इधर उधर की बातचीत भी निपटा चुके थे। अब विशुद्ध इन्तजार करना था औषधि लाने वाले व्यक्ति का।

वहीं बैठे थे दो सज्जन – नौजवान। वे आपस में मैडीकल कम्पनियां ज्वाइन करने/छोड़ने और विभिन्न दवाओं के स्टाक आदि के बारे में बात कर रहे थे – आपस में और सोनू से भी।

समय गुजारने की गर्ज से ही मैने उनमें से एक, जो एक गमछे के साथ खेल भी रहा था, से पूछा – कम्पनियां ज्वाइन करने और छोड़ने की बातें कर रहे हैं आप। इसमें अनिश्चितता नहीं रहती? तनाव नहीं होता?

उसने बताया – है क्यों नहीं। तनाव भी रहता है। पर यह नौकरी – मेडिकल रिप्रजेण्टेटिव की – महीने में बीस हजार दे रही है। सो ठीक लगता है।

प्रमेन्द्र (सोनू) उपाध्याय। यह चित्र तब का है, जब वे मेरे गांव स्थित घर में मिलने आये थे।
प्रमेन्द्र (सोनू) उपाध्याय। यह चित्र तब का है, जब वे मेरे गांव स्थित घर में मिलने आये थे।

सोनू ने कहा कि ये नौजवान करीब दो लाख महीने का टर्नओवर कर रहे हैं। मेडिकल रिप्रजेण्टेटिव के अलावा किसी न किसी कम्पनी की फ्रेंचाइज़ी हासिल कर लेते हैं। जितना काम, जितनी मेहनत, उतनी कमाई।

उस नौजवान से पूछा – कितना समय हुआ यह करते? इसके पहले क्या करते थे?

नौजवान ने नाम बताया अमित। अमित पाण्डेय। करीब डेढ साल से यह काम कर रहे हैं। फार्मेसी की पढ़ाई नहीं की। बी.ए. किया है। उसके बाद इसी काम में लग गये।

हंसमुख नौजवान। तनाव को काम का अनिवार्य अंग मान कर चल रहा है। अपने काम में सजग। जीवन में बड़ी जल्दी नेटवर्किंग का महत्व समझ गया है। … व्यक्ति सजग हो, उसका व्यक्तित्व हंसमुख हो, वह मिलनसारता का महत्व जानता हो और अपनी दशा से कुढ़ता न हो; तो वह भाग्यशाली होगा। अपॉर्च्युनिटीज उसके पास सामान्य से अधिक आयेंगी और (अपनी मानसिकता के अनुकूल) वह अवसर पहचानेगा और तरक्की करेगा। पता नहीं, अमित यह जानता है या नहीं, पर अगर नहीं भी जानता, तो अपनी प्रवृत्ति के अनुसार, अनजाने ही सफ़लता की गोल्डमाइन पर हाथ तो रख ही लिया है उसने।

अमित का प्रोफाइल चित्र - ह्वाट्सएप्प पर।
अमित का प्रोफाइल चित्र – ह्वाट्सएप्प पर।

मैने अमित का एक चित्र लेना चाहा तो अमित ने सही पोज बनाया – गमछा अलग रख कर। मैने कहा – ऐसे नहीं वैसे बैठो जैसे गमछा लपेट कर बैठे थे।

अमित ने गमछा पुन: लपेट कर मुझे ओबलाइज़ किया। सोनू ने उससे कहा – लो, अब तुम सोशल मीडिया पर आ जाओगे।

सोनू जी का सहकर्मी मेरी दवाई ले कर आ चुका था। दवाई का डिब्बा ले कर लौटते समय अमित के बारे में मैं और सोच रहा था। दशकों पहले किसी बिजनेस पत्रिका में आदि गोदरेज का पढ़ा एक इण्टरव्यू याद आ रहा था, जिसमें उन्होने कहा था – इस देश में ऐसा कोई भी व्यक्ति बेरोजगार नहीं है, जो रोजगार पाने का हुनर रखता है। (No one is unemployed who is employable)

अमित को देख वह धारणा पुष्ट हो रही थी। अमित आज रोजगार पाने का हुनर रखता है। कल शायद रोजगार देने का भी हुनर हासिल कर ले!

अविनाश सिरपुरकर : एक दण्ड-अधिवक्ता के पीछे का व्यक्तित्व


श्री अविनाश सिरपुरकर (उनके फेसबुक प्रोफाइल का चित्र)
श्री अविनाश सिरपुरकर (उनके फेसबुक प्रोफाइल का चित्र)

समाचारों में मैं क्रिमिनल लॉयर्स के बारे में बहुत पढ़ता-सुनता रहा हूं। पर पहले किसी क्रिमिनल लॉयर से सम्पर्क नहीं हुआ था। अत: एक कौतूहल तो था मन में कि ये व्यक्ति अपराध, छद्म, और मामलों को सदा एक्यूट एंगल से देखते देखते अपने सामान्य व्यक्तित्व, आदर्श और नैतिकता को किस स्तर का बनाये रखते हैं। यह इच्छा मन में थी कि अगर ऐसे किसी व्यक्ति से कभी मिला तो इस बारे में पूछूंगा जरूर।

मुझे अवसर मिल गया जब मैं उस दिन अपने काम से श्री अविनाश सिरपुरकर से उनके इन्दौर के दफ्तर में मिला। उनसे इस विषय में टेनटेटिव प्रश्न किया। पर अविनाश जी ने सम्भवत: इसे मूल विषय से इतर मान कर यही समझा कि मैं उनसे नेटवर्किंग बनाने के लिये इस प्रकार का प्रश्न कर रहा हूं। वह बात वहीं रह गयी।

अविनाश जी से अगले दिन पुन: मुलाकात हुई। रतलाम में। तब उन्होने स्वयम अपने विषय में (लगभग) विस्तार से बताया।

अविनाश मध्य प्रदेश हाई-कोर्ट के वरिष्ठ दण्ड-अधिवक्ता (क्रिमिनल लॉयर) हैं। वरिष्ठ और व्यस्त। “मेरी सात पीढ़ियां अधिवक्ताओं/कोर्ट-कचहरी वालों की हैं।” उनकी मानी जाये तो कानून-कोर्ट-कचहरी-अदालत केन्द्रित है उनका जीवन। “उसके अलावा कुछ नहीं”

मैं असहमति जताता हूं। एक व्यक्ति जो सफलता के सोपान तय कर के (लगभग) शीर्ष पर पंहुचता है, एकांगी नहीं हो सकता। किसी न किसी अन्य प्रकार से समाज के प्रति अपना दायित्व समझता होगा – अगर वह मात्र आत्मकेन्द्रित/स्वार्थपरायणी न हो। और एक इण्ट्रोवर्ट व्यक्ति के भी उत्कृष्टता के एक से अधिक पहलू होते हैं।

स्टीफन आर कोवी की पुस्तक – द एड्थ हैबिट ( THE 8TH HABIT: FROM EFFECTIVENESS TO GREATNESS) पढ़ते समय मुझे यह गहरे से महसूस हुआ था कि सफल व्यक्ति केवल सफलता पर ही ठहरता नहीं है। उसमें समाज और जीवन को प्रतिदान (contribution) करने,  मूल्य (values) देने, और लीगेसी स्थापित करने की अंतर्निहित इच्छा होती है। यह मानव का मूल स्वभाव है।

अविनाश जी का फेसबुक कवर
अविनाश जी का फेसबुक कवर

इस बारे में अविनाश जी काफी झिझकते हुये खुले। मुझ जैसे लगभग अपरिचित से खुलने में होने वाली झिझक स्वाभाविक है। शुरुआत उन्होने अपने घर के पास एक मन्दिर बनाने की बात से की। मैं धार्मिकता का पहलू समझ सकता हूं। उनके फेसबुक प्रोफाइल के कवर पर गजानन महाराज का चित्र है। उन्होने बातचीत में शेगांव (वह स्थान जहां गजानन महाराज प्रकट हुये) की चर्चा भी की।

इसके बाद उन्होने जिस बात की चर्चा की, वह प्रसन्न कर देने वाली थी। अपने किसी मित्र ‘व्यास जी’ के कहे अनुसार वे सन 2003 से प्रतिवर्ष इंजीनियरिंग/डाक्टरी के कुछ विद्यार्थियों की शिक्षा का खर्च वहन करते हैं। उसमें विद्यार्थी के साथ तय यही होता है कि पढ़ाई के बाद समर्थवान हो कर वह भी इसी प्रकार दूसरों की पढ़ाई में सहयोग करेगा।

“क्या वे बाद में ऐसा करते हैं?”

“जी हां।”

मुझे अच्छा लगा यह जानकर कि इस तरह अविनाश जी विद्यादान की चेन कायम कर रहे हैं।

आगे स्वत: बताया उन्होने – “वकालत में सफलता के कारण मुझे पैसे की समस्या नहीं है। मेरा विचार है कि पचपन की अवस्था तक वकालत करूंगा। उसके बाद आदिवासियों के बीच काम करने का मन है।”

“अच्छा! क्या तय कर लिया है कि कहां और किस प्रकार कार्य करेंगे?”

अविनाश जी ने झाबुआ क्षेत्र की बात की। रतलाम रेल मण्डल में लम्बे अर्से तक कर्य करते हुये मुझे झाबुआ के आदिवासियों की विपन्नता के बारे में अनुभूति है। अनेक आदिवासी लोगों के चेहरे मेरी स्मृति में हैं। वनवासी कल्याण की जरूरतों के बारे में बहुत लोगों से सुना है। अत: यह जान कर बहुत अच्छा लगा।

मैने अविनाश जी से अपनी भी कही – आने वाले समय में गांव और गंगा नदी के सामीप्य में रहने की बात। उन्होने कहा – अच्छा है। आपके पास गंगा हैं और मेरे समीप हैं नर्मदा!

बातचीत के प्रारम्भ में मैं एक क्रिमिनल लॉयर के समक्ष था। एक ऐसा व्यक्ति जो सामने वाले को अपने तर्क, सूचना और वाकपटुता से हतप्रभ और निष्प्रभावी करने में दक्ष होता है। जिस क्रिमिनल लॉयर का यह ‘आवरण’ जितना कठोर और इम्प्रेगनेबल होता है, वह (मेरे अनुमान से) अपने पेशे में उतना कुशल होता है। पर बातचीत समाप्त कर हाथ मिलाते हुये मैं उस आवरण के पीछे के एक संवेदनशील और समाज के प्रति जिम्मेदार व्यक्ति से परिचय पा चुका था। एक सज्जन और एक उत्कृष्ट व्यक्ति से परिचय पाना किसे अच्छा नहीं लगता?

मैं वास्तव में प्रसन्न था। भविष्य में अगर अविनाश जी से सम्पर्क बना रहा तो उनके झाबुआ अदिवासियों के कल्याण कार्यों के बारे में जानने की इच्छा रहेगी!


मुर्दहिया


बहुत पहले – बचपन की याद है। गांव सुकुलपुर। एक ओर किनारे पर चमरौटी और पसियान। तीन=चार साल का मैं और वहां से गुजरते हुये अपने से एक बड़े की उंगली थामे। मन में कौतूहल पर बड़े मुझे लगभग घसीटते हुये तेज कदमों से वहां से ले आये। कुछ इस अन्दाज में कि अगर वहां रुका तो कोई जबरी मुंह में मछरी या मांस डाल देगा।

भय का तिलस्म से गहरा नाता है। चमरौटी/पसियान के तिलस्म में वही सब बनाया गया था मेरे बचपन में। वह तिलस्म अभी भी पूरा टूटा नहीं है। अन्यथा गंगाजी के कछार में घूमते हुये मन में कई बार आया था कि चिल्ला गांव जा कर पासी-केवट-मल्लाह की जिन्दगी देखी जाये। कल्लू ने एक बार निमंत्रण भी दिया था अपने घर आने का। पर वह हो नहीं पाया।

शिवकुटी के गंगा-कछार में कई ब्राह्मणिक वर्जनायें तोड़ी हैं मैने। पर चमरौटी/पसियान में घूम कर वहां के वातावरण को अनुभव करने की बात अभी नहीं हो पायी। खैर, अभी जिन्दगी आगे है। … बाज की असली उड़ान बाकी है। वह सब भी होगा समय के साथ।

इन्ही वर्जनाओं का प्रभाव हो शायद कि दलित-बौद्ध-मार्क्सवादी-जे.एन.यू. छाप साहित्य या दर्शन मुझे दूसरे एक्स्ट्रीम की स्नॉबरी लगते रहे। कभी उनमें पैठने का प्रयास नहीं किया।

अत: उस दिन जब नितिश ओझा ने  आग्रह किया कि मैं डा. तुलसीराम की पुस्तक मुर्दहिया पढ़ूं, तो बिना किसी ललक के वह पुस्तक अमेजन.इन पर ऑर्डर की। जब कल वह किताब मिली तो आशंका सही निकली – डा. तुलसी राम “दलित-बौद्ध-मार्क्सवादी-जे.एन.यू. छाप साहित्य” वाले ही निकले।IMG_20150217_091238

मैने नितिश को सन्देश दिया –

तुलसीराम जी की पुस्तक मिल गयी मुझे – मुर्दहिया। दलित, बौद्ध और मार्क्सवादी – तीनों प्रकार का साहित्य मेरे प्रिय विषय नहीं हैंँ। पर आपने कहा है तो पढ़ कर देखता हूं। 🙂

उनका उत्तर मिला –

ओहह !!… सर कभी टेस्ट बदल कर देखिये …. कम से कम मूक दर्शक की भांति ही ….. तो भी न पसंद आए तो मुझे दान कर दीजिएगा ब्राह्मण होने की वजह से मुझे आपसे स्वीकार करने मे संकोच नहीं होगा या फिर अमेज़न पर 30 दिन की रिटर्न पॉलिसी भी है..

पर मैं चाहूँगा की आप पढे … एक नायाब कृति विशेषकर आत्मकथा लिखने का अनूठा ढंग …. पूरब के देसी छौंक के साथ …

मैं मुर्दहिया पढ़ना शुरू कर चुका था। अपने  ‘दलित-बौद्ध-मार्क्सवादी’ विरोधी पूर्वाग्रह को परे रख कर। और उस पुस्तक में वह सब मिल रहा है जो मेरे बचपन से अब तक चले आ रहे कौतूहल का शमन करता है। वह सब; जिसके बारे में बहुत टेनटेटिव तरीके से मेरी जानकारी है। या, जानकारी है भी तो उसके प्रति संवेदनशील नजरिया वैसा नहीं है।

दलित साहित्य की स्नॉबरी युक्त पुस्तकों के एक दो पन्ने पढ़ कर छोड़ चुका हूं कई बार। पर यह मुर्दहिया तो भिन्न प्रकृति की है। भिन्न और बांध कर रखने वाली।

और मुर्दहिया मैं पढ़े चला जा रहा हूं। भूमिका में लेखक ने इसके खण्ड-दो की बात भी कही है – जिसमें गांव से आगे कलकत्ता-बनारस-दिल्ली-इंगलैण्ड-रूस की जीवन यात्रा भी है। लेखक तो इस महीने नहीं रहे। पता नहीं वह खण्ड-दो लिख पाये या नहीं। पर मुझे तो यह आजमगढ़ के उनके गांव का मुर्दहिया का खण्ड-एक बहुत ही रोचक लग रहा है।

नितिश के शब्दों में कहूं तो मुर्दहिया एक नायाब कृति है!     

लता और प्रदीप


होशंगाबाद से लौटते समय मेरे पास एक काम था – प्रदीप ओझा के घर जाना। प्रदीप भोपाल रेल मण्डल में वरिष्ठ मण्डल परिचालन प्रबन्धक हैं। जब मैं उत्तर-मध्य रेलवे में मालगाड़ी परिचालन का कार्य देखता था, तो प्रदीप इलाहाबाद मण्डल के वरिठ मण्डल परिचालन प्रबन्धक हुआ करते थे। वे एक ऐसे अफसर हैं जो सोते-जागते ट्रेन परिचालन में जीते हैं। मैं अपने विषय में कुछ ऐसा ही सोचता हूं, पर मुझसे वे कई गुणा बेहतर जीते हैं ट्रेन परिचालन में। प्रदीप की पत्नी – लता ओझा (या रुचि ओझा) मेरी फेसबुक मित्र हैं। उनके लाइक्स और उनकी टिप्पणियों का सदैव इन्तजार रहता है। उनके घर में वनस्पति और जीवों/पक्षियों का अरण्य़ है। उनकी कविताओं में गज़ब की सेंसिटिविटी है। पर कुछ लोग महसूस करने से रह जाते होंगे – हिन्दी की उनकी कवितायें रोमनागरी में आती हैं फ़ेसबुक पर; जिन्हे पढ़ने के लिये अतिरिक्त एकाग्रता की आवश्यकता होती है। शायद कुछ लोगों को फ्लो नहीं बनता होगा। पर होती हैं वे बहुत सहृदय।

प्रदीप और लता ओझा
प्रदीप और लता ओझा

मैने लता और प्रदीप से कह दिया था कि उनके यहां आऊंगा और लगभग शाम आठ बजे पंहुच जाऊंगा। होशंगाबाद से सड़क वाहन छोड़ गोण्डवाना एक्स्प्रेस से लौटने के कारण मैं  समय की डेडलाइन में पंहुच पाया उनके घर।

प्रदीप की पदोन्नति और उसके बाद उनकी इलाहाबाद वापसी की प्रतीक्षा बहुत से लोग कर रहे हैं। मैं भी सोचता हूं कि मेरी इलाहाबाद की माल यातायात परिचालन वाले पद पर – जिस पर लगभग छ साल बैठना मैं हांफते-झींखते निभा पाया था, और मेरी मात्र यही उपलब्धि थी कि इतना समय निभा पाया; प्रदीप उस पद को कहीं बेहतर ढंग से चलायें/निबाहें। शायद प्रदीप को भी उसकी प्रतीक्षा है।

हम लोगों के मुख्य परिचालन प्रबन्धकों के सम्मेलन का आयोजन करने में प्रदीप और उनकी टीम की महती भूमिका रही है। एक एक चीज पर बारीकी से ध्यान दिया उन्होने। कोई कमी या अव्यवस्था नहीं दिखी उनके आयोजन में। प्रदीप का यह ईवेण्ट मैनेजमेण्ट का पक्ष मैने पहले नहीं देखा था। मुझे यकीन है कि यह उन्होने अपनी पत्नी लता से सीखा होगा।

??????????लता इलाहाबाद/झूंसी के पास की रहने वाली हैं। मैने कभी जिज्ञासा व्यक्त नहीं की, पर देखें तो लता-प्रदीप मेरे किसी न किसी प्रकार से सम्बन्धी हो सकते हैं। इलाहाबाद के देहाती इलाके में ब्राह्मणों की आबादी, आपस में ही होने वाले सम्बन्धों के कारण एक व्यापक परिवार की तरह दिखती है। [यह अलग बात है कि वे सम्बन्धों पर जोर न दे कर पारस्परिक सिरफ़ुटव्वल पर ज्यादा कन्सन्ट्रेट करते हैं! 😆 ]

हम उनके बरामदे में बैठे। अंधेरा हो गया था। अत: उनका लॉन धुंधलके में ही दिखा। पर जो दिखा, उससे लता कि सुरुचि की छाप जबरदस्त दिखी।

… सर, इलाहाबाद से आते समय मुझे अपने कई गमले छोड़ कर आने पड़े। उन पौधों को छोड़ कर आने में बहुत कष्ट हुआ। और ये आप जो साइकस का गमला देख रहे हैं, न! उसे लाने में तो मुझे इनकी (प्रदीप की) बहुत डांट सुननी पड़ी थी।

ओझा दम्पति का वृहदाकार साइकस का गमला।
ओझा दम्पति का वृहदाकार साइकस का गमला।

 

मैने देखा – – गमला कांक्रीट का था और बहुत बड़ा था। प्रदीप ने बताया कि इलाहाबाद से लाते समय कई लोगों ने मिल कर उठाया था उसे। यह भी ध्यान रखा कि टूट न जाये। भोपाल से इसे ले जाना अपने आप में बड़ा प्रॉजेक्ट होगा!

मैं प्रदीप के बच्चों – बेटा और बेटी से भी मिला। बच्चे विनम्र और तहज़ीबदार थे। फिर कभी समय मिला तो उनके साथ समय व्यतीत करूंगा।

लता ने बहुत विस्तार से बताया कि घर में किस ओर कौन सा पौधा या वृक्ष है। किस पेड़ पर कौन चिड़िया रहती हैं। किसमें कितने फूल आये थे… धुंधलका होने के कारण मैं अपनी नोटबुक नहीं खोल पाया, अन्यथा विवरण देता आप को! (एक अच्छे ब्लॉगर के पास नोटपैड उपलब्ध होना चाहिये। मेरे पास बहुधा नहीं होता। यह अच्छी बात नहीं है!)

मेरा सैलून परीक्षण के लिये गया हुआ था। अत: स्टेशन पर इन्तजार करने की बजाय प्रदीप और लता के साथ ही समय गुजारते हुये एक कप चाय और पी। करीब डेढ़ घण्टा रहा उनके घर। चलते हुये दो-तीन चित्र लिये। उन्हे इस पोस्ट पर लगा दे रहा हूं।

अगली बार देखता हूं, ओझा दम्पति से कहां मिलना होता है – भोपाल में या इलाहाबाद में!