कुल मिला कर लड़कियों की जिंदगी ढर्रे पर चल निकली है। वे घर संभालने लगी हैं। खेतों में कटाई के काम में जाने लगी हैं। लड़के अभी बगड्डा घूम रहे हैं, पर कुछ ही साल बाद मजदूरी, बेलदारी, मिस्त्रियाना काम में लग जायेंगे।
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बांस के कारीगरों के समीप
करीब एक दर्जन घर हैं धईकारों के। वे सब बांस के सामान बुनते हैं। रीता पाण्डेय ने एक महिला, बदामा, से बातचीत की। एक उसौनी खरीदी।
राजबली से मुलाकात
राजबली दसवीं आगे नहीं पढ़े। उसके बाद ममहर बाजार में किराने की दुकान खोली। पर उनके बब्बा को यह पसंद नहीं था कि घर से दूर राजबली पुश्तैनी धंधे से अलग काम करें।
