उठो; चलो भाई!


यह एक पुरानी पोस्ट है – बारह जनवरी 2013 की। मैं अस्पताल में भर्ती था। शरीर इण्ट्रावेनस इंजेक्शनों से एण्टीबायोटिक अनवरत भरने की प्रक्रिया से छलनी था। पर मन यात्रा की सोच रहा था। उस समय शरीर कह रहा था कि वह यात्रा नहीं कर सकता। मन उस समय भी – भीषण बीमारी में भी – यात्रा की याद में खोया था। पोस्ट में मैंने लिखा है –

शैलेश पाण्डेय ने पूर्वोत्तर की यात्रा ज्वाइन करने का न्योता दिया है – मोटर साइकल पर। सुकुल ने साइकल पर नर्मदा यात्रा का। मुझे मालुम है इनमें से दोनों पर मैं नहीं निकलने वाला। … पर ये न्योते, ये सोच और ये आग्रह यह बताते हैं कि एक आध ठीक ठाक ट्रेवलॉग अपने हिस्से भी भगवान ने लकीरों में लिख रखा है।

– इसी पोस्ट से।

इस पोस्ट को लिखे 9 साल हो रहे हैं। अनूप शुक्ल इस समय आयुध कारखाने के महाप्रबंधक हो गये हैं। शीर्षस्थ अफसर। शैलेश भाजपा के केंद्रिय कार्यालय में पार्टी की सतत चलने वाली चुनावी जद्दोजहद का (महत्वपूर्ण) हिस्सा हैं। दोनो को ही यात्रा का कीट काटता रहता है।

डा. विनीत अग्रवाल भी रिटायर हो चुके हैं। उन्हें बारम्बार हिमालय अपनी ओर खींचता रहता है और वे यात्रायें करते रहते हैंं।आजकल उनसे सम्पर्क नहीं हो रहा है।

मैं रिटायर हो कर भदोही जिले के एक गांव में हूं और भौतिक तौर पर यात्रा के नाम पर मेरे पास साइकिल भ्रमण भर है – आसपास के पचीस तीस गांवों का भ्रमण। पर अचानक मेरे हाथ प्रेमसागर लग गये हैं और उनके माध्यम से एक डिजिटल ट्रेवलॉग लेखन मेरे हिस्से लग गया है। यह सही होता नजर आ रहा है –

एक आध ठीक ठाक ट्रेवलॉग अपने हिस्से भी भगवान ने लकीरों में लिख रखा है।

वेगड़ नहीं, साइकिल-वेगड़ या रेल-वेगड़ भी नहीं; मैं प्रेमसागर जी के जोड़ीदार के रूप में डिजिटल-वेगड़ बन रहा हूं। द्वादश ज्योतिर्लिंग की डिजिटल-यात्रा कर रहा हूं! :lol:

आप पुरानी पोस्ट पढ़ें –


बीमार ज्ञानदत्त का लेटेठाले स्केच।
बीमार ज्ञानदत्त का लेटेठाले स्केच।

अनूप शुक्ला जब भी बतियाते हैं (आजकल कम ही बतियाते हैं, सुना है बड़े अफसर जो हो गये हैं) तो कहते हैं वे नरमदामाई के साइकल-वेगड़ बनना चाहते हैं। अमृतलाल वेगड़ जी ने नर्मदा की पैदल परिक्रमा कर तीन अनूठी पुस्तकें – सौन्दर्य की नदी नर्मदा, अमृतस्य नर्मदा और तीरे तीरे नर्मदा लिखी हैं। साइकल-वेगड़ जी भी (नर्मदा की साइकल परिक्रमा कर) ट्रेवलॉग की ट्रिलॉजी लिखें, शुभकामना।

अभी यहां अस्पताल में, जब हाथ में इण्ट्रावेनस इन्जेक्शन की ड्रिप्स लग रही हैं और एण्टीबायोटिक अन्दर घुसाये जा रहे हैं; मैं यात्रा की सोच रहा हूं।

यही होता है – जब शरीर बन्धन में होता है तो मन उन्मुक्तता की सोचता है।

मैं रेल की नौकरी वाला, ट्रेने चलवाना जिसका पेशा हो और जिसे और किसी चीज से खास लेना देना न हो, उसके लिये यात्रा – ट्रेवल ही सब कुछ होना चाहिये। पर मेरे पास ट्रेवल ही नहीं है। या ट्रेवल के नाम पर शिवकुटी का गंगाजी का फाफामऊ के पुल से निषादघाट तक का वह क्षेत्र है, जहां से कच्ची शराब का बनना सेफ दूरी से देखा जा सके। मेरे कथन को एक ट्रेवलर का कथन नहीं माना जा सकता।

इसलिये, जब मैं यह अपनी स्कैपबुक में दर्ज करता हूं – एक औसत से कुछ अधिक बुद्धि का इन्सान, जिसे लोगों से द्वेष न हो, जो आत्मकेन्द्रित न हो, जो सामान्य तरीके से मानवता की भलाई की सोचता हो, जो यात्रा कर देखता, परखता, लोगों से इण्टरेक्ट करता और अपनी ऑब्जर्वेशन रिकॉर्ड करता हो; वह मानव इतिहास में आसानी से जगह पा सकता है – तो मैं अपनी सोच ईमानदारी से प्रस्तुत करता हूं। पर उस सोच की सत्यता के बारे में बहुत आश्वस्त नहीं होता। ऐसे बहुत से लोग हैं जो इस सोच के अनुसार हैं – गुरु नानक, जीसस क्राइस्ट या बुद्ध जैसे भी।

पर मैं साइकल-वेगड़ या रेल-वेगड़ बन कर भी आत्म संतुष्ट हो जाऊंगा।

शैलेश पाण्डेय ने पूर्वोत्तर की यात्रा ज्वाइन करने का न्योता दिया है – मोटर साइकल पर। सुकुल ने साइकल पर नर्मदा यात्रा का। मुझे मालुम है इनमें से दोनों पर मैं नहीं निकलने वाला। … पर ये न्योते, ये सोच और ये आग्रह यह बताते हैं कि एक आध ठीक ठाक ट्रेवलॉग अपने हिस्से भी भगवान ने लकीरों में लिख रखा है। निकलना चाहिये।

उठो; चलो भाई!

(यह पोस्ट कल 12 जनवरी को पब्लिश होगी। तब तक शायद डाक्टर विनीत अग्रवाल, यहां रेलवे के मुख्य फीजीशियन मुझे अस्पताल से छुट्टी देने का निर्णय कर लें।)


कुण्डम से जबलपुर – वृहन्नलाओं का आशीष पाये प्रेमसागर


वृहन्नलाओं के समूह में चार लोग थे। सबसे उम्रदराज व्यक्ति प्रेमसागर के सिर पर हाथ रख आशीष दे रहा था, अपने पूरे समूह की ओर से। भारतीय समाज में उनके आशीर्वाद का बहुत महत्व है। नया बच्चा जन्मता है या किसी का विवाह होता है तो हिंजड़े गुणगान कर आशीष दें; वह शुभ माना जाता है। प्रेमसागर को अपनी यात्रा के पुनीत ध्येय के कारण वह आशीर्वाद बिन मांगे बड़ी सरलता से सहर्ष मिल गया।

मैंने सवेरे साढ़े पांच बजे फोन किया प्रेमसागर को। सोचा था कि वे इस समय निकलने वाले होंगे अपनी पदयात्रा पर। पर उन्होने कहा – “भईया सवेरे साढ़े चार बजे निकल लिये हैं। आज लम्बा चलना है और जितना सवेरे खींच लें उतना बेहतर है। दिन में गर्मी बहुत हो जाती है और चलना सवेरे चलने से चार गुना भारी पड़ने लगता है। अब सवेरे 11-12 बजे तक 25 किमी चल लेंगे। उसके बाद आराम करेंगे और तब तक वन विभाग वाले यादव जी आ कर सामान भी ले जायेंगे। कांवर हल्की हो जायेगी। आगे जबलपुर की यात्रा सुगम हो जायेगी।”

चलने की धुन में रमे हैं प्रेम सागर।

उसके बाद आठ बजे फोन आया उनका – “भईया, पैर की तकलीफ बढ़ गयी है। रास्ते में बार बार मैं जांघ में पाउडर लगा रहा था। मैडीकल दुकान खोज रहा था कोई दर्द की दवाई के लिये। कुछ लोगों ने बताया – ऐसे दवाई लेने की बजाय आगे गांव में एक डाक्टर साहब रहते हैं; उन्हें दिखाओ। वे बहुत भले इंसान हैं। अगर वे मिट्टी भी उठा कर दे देंगे तो आपका सारा रोग दूर हो जायेगा।”

“एक किमी आगे डाक्टर साहब का घर था। वहीं आया हूं। भले डाक्टर साहब हैं। दवाई भी दिये हैं और चाय भी पिलाये हैं। आप जरा उनसे बात कर लीजिये।”

डाक्टर साहब से मैंने बात की। मैंने उन्हे कहा – “डाक्टर साहब आप जो कर रहे हैं, बहुत ही पुण्य का कार्य है। ये सज्जन द्वादश ज्योतिर्लिंग की पदयात्रा पर हैं। और यह संयोग ही है कि इनको महादेव ने आपके यहां भेज दिया है, निदान-उपचार के लिये।”

डाक्टर साहब ने कहा कि फिक्र न करें; आगे 24 किलोमीटर जबलपुर है और उसके आगे भी लम्बी यात्रा है इनकी। भगवान, ऊपर वाले सब सही करवायेंगे इनकी यात्रा! जब मन में आ जाती है तब ऊपर वाला अपने से सब व्यवस्था करता है।

डाक्टर परिहार और प्रेमसागर

डाक्टर साहब वास्तव में बहुत भले इंसान थे, डाक्टर से ज्यादा। उन्होने प्रेमसागर को पैरासेटामॉल का एक पत्ता, जख्म सूखने के लिये गोलियां और लगाने के लिये क्रीम/मलहम दिया। कोई पैसे नहीं लिये। उनको चाय, बिस्कुट और मठरी खिलाया अलग से। सवेरे सवेरे प्रेमसागर चाय की दुकान तलाशते हैं; आज अजनबी डाक्टर साहब से मिलवा दिया जिन्होने उनको चाय और दवा दोनो ही सप्रेम दी। आप अगर किसी महत-ध्येय के लिये निकल लिये होते हैं तो सारी प्रकृति, सारी दैवी शक्तियां अपने अपने प्रकार से आपकी सहायता में लग जाती हैं। एक अनजान से गांव पडरिया के डाक्टर परिहार इसी में एक कड़ी प्रमाणित हुये।

पड़रिया गांव के डाक्टर परिहार ने प्रेम सागर को दवाई दी और चायपान भी कराया। एक अंचलीय गांव में यह सत्कार और यह इलाज! हर हर महादेव!

जब प्रेमसागर डाक्टर परिहार के यहां इलाज करा रहे और चाय पी रहे थे; तभी वहां वीरेंद्र यादव जी पंहुचे। वीरेंद्र जबलपुर के वनविभाग की पर्यटन नर्सरी के कर्मी हैं। उनका गांव पीछे रह गया था। करीब पांच किलोमीटर पहले। वीरेंद्र जी अपने गांव में थे और वहीं से प्रेमसागर का सामान ले कर जबलपुर निकलने वाले थे। उन्होने सोचा था कि कुण्डम से प्रेमसागर छ बजे के आसपास निकलेंगे, पर वे तो साढ़े चार बजे ही निकल कर उनके गांव से आगे बढ़ आये थे। वीरेंद्र जी ने पड़रिया में सामान लिया। दवा लगा कर और गोलियां खा कर प्रेमसागर भी रवाना हुये। अब उनके साथ केवल हल्की कांवर थी। यादव जी भी रास्ते में उनके साथ आगे पीछे आते रहे और उनका ख्याल रखते रहे।

प्रेमसागर और वीरेंद्र यादव

लगभग बारह बजे फिर एक फोन आया प्रेम सागर का। मुझे आशंका हुई कि कहीं उनकी जांघ का दर्द फिर तो नहीं बढ़ गया। पर इसबार उनकी आवाज में एक अलग तरह की उत्तेजना थी – “भईया कुछ हिंजड़ा लोग मिले हैं चाय की दुकान पर। मेरी यात्रा के बारे में जानने पर मुझे आशीर्वाद दे रहे हैं। हिंजड़ा लोगों का आशीर्वाद बहुत मायने रखता है! आप अगर ठीक समझें तो उनके साथ एक चित्र आपके पास भेज दूं?”

यह अलग तरह की उत्तेजना ही रही होगी; अन्यथा ढेरों चित्र वे रास्ते में लेते हैं और शाम को एक साथ मुझे भेजते हैं। हिंजड़ों का आशीर्वाद उन्हें तुरंत किसी से बोलने बताने वाला अनुभव लगा होगा। और उन्हें मैं ही सुपात्र नजर आया शेयर करने के लिये! :-)

मैंने चित्र देखा। वृहन्नलाओं के समूह में चार लोग थे। सबसे उम्रदराज व्यक्ति प्रेमसागर के सिर पर हाथ रख आशीष दे रहा था, अपने पूरे समूह की ओर से।

भारतीय समाज में उनके आशीर्वाद का बहुत महत्व है। नया बच्चा जन्मता है या किसी का विवाह होता है तो हिंजड़े गुणगान कर आशीष दें; वह अत्यंत शुभ माना जाता है। वे दान लेने के बाद उसी में से कुछ अन्न निकाल कर देते हैं और उस अन्न को लोग अपने घर में हर जगह छींट देते हैं – जिससे उनका आशीर्वाद घर के सब स्थानों को पवित्र कर दे। प्रेमसागर को अपनी यात्रा के पुनीत ध्येय के कारण वह आशीर्वाद बिन मांगे बड़ी सरलता से सहर्ष मिल गया। उन लोगों ने आशीर्वाद के रूप में सिर पर हाथ रखा और उनको एक रुपया का सिक्का भी दिया। इससे बड़ा और क्या हो सकता है?! वह सिक्का उन्हें सदा साथ रखना चाहिये!

मैंने चित्र देखा। वृहन्नलाओं के समूह में सबसे उम्रदराज व्यक्ति प्रेमसागर के सिर पर हाथ रख आशीष दे रहा है, अपने पूरे समूह की ओर से।

आगे बरगी राइट-बैंक केनाल मिली। बहुत ही सुंदर चित्र आया है। साफ पानी, सीधी बनी नहर। वेगड़ जी ने लिखा है कि भविष्य में नर्मदा परिक्रमा का स्वरूप ही बदल जायेगा जब इतने बांध नर्मदा का सौंदर्य बिगाड़ देंगे और कितनी जगहें तो लुप्त हो जायेंगी कितने गांव मिट जायेंगे। वह हुआ होगा, और वह त्रासद है। पर यह नहर भी अपने आप में सुंदर है। मानव कृति प्रकृति से टक्कर लेती!

आगे बरगी राइट-बैंक केनाल मिली। बहुत ही सुंदर चित्र आया है। साफ पानी, सीधी बनी नहर।

उसके पास कहीं टूरिस्ट स्पॉट है। उसके बाद शहरी इलाका प्रारम्भ हुआ। खमरिया का ऑर्डीनेंस डिपो था, जिसके सामने एक डी-कमीशण्ड टैंक रखा था शो पीस के रूप में।

आज कुल मिला कर 50+ किमी चले प्रेम सागर करीब बारह – तेरह घण्टे लगे यात्रा में। रास्ते में उन्हें जांघ के घाव के कारण पीड़ा भी हुई और चाल भी कम हो गयी। जब वे लगभग पंहुच ही गये थे तो रास्ते में एक बुजुर्ग चाचा जी ने जबरी उन्हे रोका और चाय पिलाने पर ही जाने दिया। प्रेम सागर की कांवर यात्रा से रास्ते में बहुत से लोग कौतूहल, श्रद्धा, स्नेह और आदर से भरे मिलते हैं। वे अपने अपने तरीके से उसे व्यक्त करते हैं। प्रेम सागर सरलता से उसे स्वीकार करते रहे होंगे पहले भी, अब वे मुझे बताना/शेयर करना भी प्रारम्भ कर दिये हैं। मैंने देखा कि वे अपना एक ट्विटर अकाउण्ट बना कर मेरा आशीर्वाद भी मांग रहे थे –

शिव जी उत्तरोत्तर उनका मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। बस वे अपनी सरलता क्षण भर को भी न त्यागें और अहंकार को कभी मन में घुसने न दें।

हर हर महादेव!

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची


देवरी से कुण्डम का रास्ता


2 अक्तूबर 21, रात्रि –

प्रेम सागर पहले अपने संकल्प में, ज्योतिर्लिंगों तक येन केन प्रकरेण पंहुचने में अपनी कांवर यात्रा की सार्थकता मान रहे थे। अब वे (उत्तरोत्तर) यात्रा में हर जगह, हर नदी, पहाड़, झरने, पशु पक्षियों और लोगों में शिव के दर्शन करने लगे हैं।

अमेरा के वन विभाग के बंधु कह रहे थे कि वे देवरी के आगे भी कुण्डम तक प्रेमसागार का सामान पंहुचा देंगे और उन्हें सिर्फ कांवर ले कर ही चलना होगा। पर यह करने के लिये सवेरे अमेरा से देवरी तक आते और वहां से सामान ले कर पचीस किलोमीटर और चल कर कुण्डम पंहुचाते। प्रेम सागर को लगा कि यह तो लोगों को अपनी सुविधा के लिये ज्यादा ही असुविधा में डालना हुआ। उन्होने जी.के. साहू जी से मना कर दिया। सवेरे देवरी से थोड़ा देर से निकले – ज्यादा लम्बी यात्रा नहीं करनी थी। निकले तो अपनी कांवर और अपना पूरा सामान ले कर।

आठ बजे के आसपास चाय की दुकान पर बैठ कर उन्होने चित्र भेजे थे रास्ते के। वे कल एक कोलाज के रूप में पोस्ट कर चुका हूं। दुकान वाले का चित्र बाद में भेजा। चाय की दुकान वाला लम्बी नीली धारियों वाली कमीज पहने और ऊपर का एक बटन खुला रखे बड़ा जीवंत लगता है। इकहरे शरीर का सांवला सा नौजवान कैमरे की तरफ सावधान हो कर नहीं देख रहा है। उसके मुंह पर मुस्कान है और वह तिरछे कहीं देख रहा है। प्रेमसागर ब्लॉग के लिये जीवंत चित्र लेने का अनुशासन सीख गये हैं। और वे अपने को जितनी तेजी से बदल रहे हैं, उसे देख आश्चर्य होता है!

चाय की दुकान वाला।

प्रेमसागर में आये बदलाव पर मैं प्रवीण दुबे जी से फोन पर बात कर रहा था। उनका भी कहना था कि प्रेमसागर के सोच और तकनीकी बदलाव के कारण उत्तरोत्तर उनके बारे में लेखन भी बदल रहा है। अब जानकारी और यात्रा के बारे में इम्प्रेशन बेहतर दर्ज हो रहे हैं। मसलन उनके द्वारा उडद की दंवाई करते बैलों के जीवंत चित्र को ब्लॉग से स्कीनशॉट ले कर उन्होने कई लोगों को फारवर्ड किया – यह कहते हुये कि प्रेमसागर वास्तविक मध्यप्रदेश, वास्तविक जीवन क्या है, वह दिखा रहे हैं अपनी यात्रा के जरीये।

उडद की दंवाई का चित्र।

रास्ते में दोनो ओर पहाड़ियाँ थीं। मिट्टी और पत्थर के टीलों पर उगे पेड़ और झाड़िया। विंध्य पर्वत बुढ़ा गया है और अगस्त्य मुनि के अंगूठे से दबने के बाद उत्तरोत्तर झर रहा है। उसे अब तक तो यकीन हो ही गया होगा कि कुम्भज ऋषि अब वापस आने वाले नहीं हैं। मैंने यह सोचने का प्रयास किया कि तीस चालीस किलोमीटर दक्षिण में सतपुड़ा को देख कर वह क्या कहता होगा? क्या दोनो आपस में कुछ कहते होंगे, या प्रतिस्पर्द्धा में मुंहफुलाये रहते होंगे! इण्टरनेट छानने पर तो विंध्य बड़ा पहाड़ है पर सतपुड़ा कहीं कहीं उसे लज्जित भी करता है!

रास्ते में दोनो ओर पहाड़ियाँ थीं। मिट्टी और पत्थर के टीलों पर उगे पेड़ और झाड़िया।
छीजता पहाड़, सड़क किनारे

यहीं उन्हें महानदी मिलीं। यह महानदी पूर्वी घाट के छत्तीसगढ़ के इलाके से निकली महानदी नहीं हैं जो बंगाल की खाड़ी में मिलती हैं और जिनके रास्ते में हीराकूद डैम है। इन महानदी को मैंने ट्रेस किया तो इनको बाण सागर में समाहित होते पाया। बाण सागर से आगे शोणभद्र निकलता है। इस प्रकार से ये सोन की ट्रिब्यूटरी होंगी। पर इनके बारे में जानकारी में मैं कोई अंतिम शब्द नहीं लिख रहा हूं।

महानदी

महानदी पर बने पुल को देख कर नहीं लगता कि यहां इनका पाट बहुत चौड़ा होगा और अपने नाम को सार्थक पाती होंगी ‘महानदी’। आगे बाणसागर झील के पहले नदी जरूर हृष्ट-पुष्ट दिखती हैं गूगल मैप में। पर डिजिटल यात्रा बहुत कुछ बताने के साथ साथ बहुत से प्रश्न अनुत्तरित छोड़ देती है। मुझे लगता है कि प्रेमसागर किसी नदी को पार करें तो वे यह भी नोट करें कि जल का बहाव दांये से बायें है या बांये से दांये। इससे उसका उद्गम और गंतव्य ट्रेस करने में सहूलियत होगी। … फिर भी प्रेमसागर जितनी जानकारी दे रहे हैं और उसे उत्तरोत्तर बेहतर बनाये जा रहे हैं वह अभूतपूर्व है!

महानदी पर पुल

महानदी से प्रेमसागर पौने इग्यारह बजे गुजरे। एक पुल प्रेमसागर जी ने और पार किया तीन बजे के पहले। वह भी छोटा पुल है। शायद कोई बरसाती नाला हो। उसके जल का चित्र नहीं है। शायद रहा भी न हो, तेज वर्षा में भी जल नीचे से बहता हो।

एक पुल प्रेमसागर जी ने और पार किया तीन बजे के पहले।

यहां भी उसी प्रकार के वृक्ष और झाड़ियां हैं। कोई खेत-खलिहान नहीं। इस जगह अगर जमीन बिकाऊ हो तो जितना कीमत मेरे यहां भदोही जिले में एक बिस्से की हो, उतने में एक दो बीघा जमीन मिल जाये! हर जगह देख कर लगता है वहीं जा कर रहा जाये। महानदी के बगल में एक कुटिया बना कर रहने में कितना आनंद होगा! अपने नाम को स्थायी बनाने के लिये वहां एक शिवाला बनाया जाये – ज्ञानदत्तेश्वर महादेव! :lol:

सांझ ढलने के पहले ही प्रेमसागर कुण्डम पंहुच गये। यहां वन विभाग के रेंजर साहब का दफ्तर है। साथ में आवास हैं और रेस्टहाउस भी। प्रेम सागर जी को रहने और भोजन की सुविधा मिल गयी। रेंजर साहब तो नहीं थे, डिप्टी साहब भी किसी काम में व्यस्त थे; उनसे बातचीत नहीं हो पाई। वहां के तीन लोगों के चित्र भेजे हैं प्रेमसागर ने – जिन्होने उनके लिये व्यवस्था की होगी। उनके नाम बताये हैं – लक्ष्मी मिश्र, भोलू जी और यादव जी। सांझ ढलने के बाद लिया चित्र अपने सही रंग में नहीं आ पाया है।

लक्ष्मी मिश्र, भोलू जी और यादव जी

कल सवेरे प्रेम सागर जबलपुर के लिये रवाना होंगे। रास्ता लम्बा है – पैंतालीस किलोमीटर का। वे जल्दी ही रवाना होंगे। शायद भोर में, सूर्योदय होने के पहले ही। वे टेलीग्राम पर संदेश देते हैं कि सबेरे आठ बजे तक कल की यात्रा के प्रारम्भ की जानकारी दे पायेंगे। जल्दी निकलने के कारण कुण्डम के परिवेश के चित्र वे नहीं ले सकेंगे। वैसे प्रेमसागर को यह स्पष्ट हो गया है कि बहुत से चित्रों की बजाय बोलते चित्रों की आवश्यकता कहीं ज्यादा है। वे चित्र जो एक पैराग्राफ से ज्यादा, कहीं ज्यादा बोलते हों। … मैं डिजिटल ट्रेवलॉग के लिये प्रेमसागर से उत्तरोत्तर ज्यादा मांग करता जा रहा हूं और वे उसको पूरा करने में पूरा यत्न कर रहे हैं। मुख्य बात है कि इस सब को करने में उन्हें भी आनंद आ रहा है। प्रेम सागर पहले अपने संकल्प में, ज्योतिर्लिंगों तक येन केन प्रकरेण पंहुचने में अपनी कांवर यात्रा की सार्थकता मान रहे थे। अब वे (उत्तरोत्तर) यात्रा में हर जगह, हर नदी, पहाड़, झरने, पशु पक्षियों और लोगों में शिव के दर्शन करने लगे हैं। उनके दर्शन से पढ़ने वालों को भी हर कदम पर शिवानुभूति हो रही होगी!

आज यहीं तक। कल का विवरण अगली पोस्ट में। कल!

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची


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