प्रेम पाण्डेय, कांवरिया का फोन आया


मैंने दो दिन पहले प्रेम पाण्डेय पर पोस्ट लिखी थी। वे साल में 10-12 बार पैदल संगम से बाबा विश्वनाथ को जल चढ़ाने के लिये कांवर ले कर जा चुके हैं। उनका मोबाइल नम्बर मैंने लिया था। पोस्ट लिखने के बाद उन्हे मैंने ह्वाट्सएप्प पर लिंक भी दिया और बात करने का प्रयास भी किया। पर यह लग रहा था कि उन्होने पिछले शनिवार के बाद ह्वाट्सएप्प देखा ही नहीं था। और उनसे बात करने के प्रयास में एक दर्जन से ज्यादा बार यही संदेश आता रहा कि मोबाइल बंद है।

आज दोपहर में उनका फोन लगा पर कोई उत्तर नहीं मिला। मैंने दो बार कोशिश की। अचानक उनका फोन आया। बताया कि वे बनारस में ही विश्वनाथ मंदिर के पास किसी गेस्ट हाउस में हैं। जब मेरा फोन उनके मोबाइल पर आ रहा था, तो वे बुरी तरह थक कर सो रहे थे। उन्हें लगा कि दो बार फोन बजा, पर वे उठा नहीं पाये।

अचानक प्रेम पाण्डेय जी का फोन आया।

“अब आज रात निकलने की सोच रहा हूं, उज्जैन के लिये।”

कैसे निकलेंगे? वाहन से या पैदल?

“पैदल ही निकलूंगा। अभी मैप देख रहा हूं।”

उन्होने ह्वाट्सएप्प मैसेज नहीं पढ़ा था। मैंने उन्हें कहा कि वे मेरी पोस्ट का उसमें दिया लिंक क्लिक कर पोस्ट पढ़ लें। लोग उनकी यात्रा के प्रति जिज्ञासु हैं। एक सज्जन ने तो त्रयम्बकेश्वर और सोमनाथ में सहायता करने और आर्थिक मदद करने की भी बात कही है। उन्होने बताया कि उनका मोबाइल बिगड़ गया था। ठीक करने को दिया तो ठीक हो कर आज मिला। उसके बाद मेरा फोन उनके पास आया।

उन्होने बताया कि वे यहां से उज्जैन जायेंगे और वहां से ओँकारेश्वर।

वे रात में बनारस से निकलते हैं और वाया प्रयाग जाते हैं तो मेरा स्थान रात में ही निकल जायेगा। मैंने उनको कहा कि अगर सवेरा हो या दिन हो तो मुझे सूचित कर मेरे यहां भोजन करें। मेरा घर हाईवे से ज्यादा दूर नहीं है।

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
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द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची

प्रेम पाण्डेय जी यह सब सुन कर प्रसन्न तो थे, पर उनकी आवाज में गर्मजोशी नहीं थी। थकी थकी सी आवाज। शायद थकान और नींद का असर। लम्बी यात्रा पर निकलना है; उन्हे अपनी ऊर्जा संचय कर रखनी चाहिये।

मैंने उन्हे अपनी यात्रा के विषय में सूचना देते रहने को कहा। मैंने यह भी कहा कि लोग उनकी यात्रा के बारे में जानने और भरसक उनकी सहायता करने को तत्पर होंगे। वे अगर अपनी यात्रा के एक दो चित्र भी दे सकें तो बहुत अच्छा होगा। पर मुझे लगा नहीं कि वे चित्र लेने और भेजने में बहुत दक्ष या तत्पर होंगे। फिर भी, देखा जाये कि आगे क्या होता है।

प्रेम पाण्डेय जी को शुभकामनायें।


कुनबी का खेत, मचान और करेला


जिंदगी का यह एडहॉकिज्म; सुकूनदायक दूसरी पारी का आनंद है। जब आप रीजनेबल तरीके से स्वस्थ हों, मानसिक रूप से उर्वर हों, लिखने पढ़ने में मनलायक ठेल सकते हों और किसी को ‘सर, सर’ करने की बाध्यता न हो! और कहीं भी कुछ भी एक्स्प्लोर करने की मनमौजियत पाल सकते हों।

कुनबी का खेत था सड़क किनारे। कोई काम करता दिख नहीं रहा था। बेल जमीन से ऊपर उठा कर एक परत के रूप में चढ़ाई हुई थीं। कुछ कुछ वैसे लग रहा था मानो अंगूर की खेती हो। मैंने उसमें अनाधिकृत प्रवेश कर लिया।

बांस और अन्य लकड़ी जमीन में गाड़ कर बल्लियों के प्रयोग से धरती से करीब पांच छ फुट ऊपर एक स्तर बनाया गया था खेत के बड़े भाग में। उसपर करेले की बेलें बिछी हुई थीं।

करेले की बेलें बिछी हुई थीं।

दिन का समय था। करीब साढ़े इग्यारह बजे। धूप टनटना रही थी। पर बेलोंंके कारण वहां ठण्डक थी। एक रखवाला मड़ई में बने मचान पर सो रहा था।

रखवाला मड़ई में बने मचान पर सो रहा था।

मैंने उसे आवाज लगाई – पपीता होगा क्या तुम्हारे पास। कुछ कच्चा भी हो तो चलेगा। ऐसा हो जो तीन चार दिन में पक जाये।

उसने लेटे लेटे जवाब दिया कि है नहीं। एक पेड़ में है वो कच्चा है, पकने में पंद्रह दिन लगेंगे। और वह बेचने के लिये लगाया नहीं है। घर के खाने के लिये लगाया है।

अरे, जो बड़ा हो गया हो, वही दे दो। एक भी मिल जाये तो काम चलेगा।

पपीता

मेरे कहने पर वह अनिच्छा से उठा। पपीता का पेड़ दिखा कर बोला कि कोई भी फल दो हफ्ते से कम में खाने लायक नहीं बनेगा। और बेचने के हिसाब से लगाया भी नहीं है। बेचने के लिये तो अभी करेला और नेनुआ है।

तब वही दे दो। करेला ही दे दो। क्या भाव?

उसने अपने मचान के नीचे रखी एक बोरी में से करेला निकाला।

उसने अपने मचान के नीचे रखी एक बोरी में से करेला निकाला। बताया बीस रुपये किलो का भाव है। जो ढेरी मुझे दी वह किलो भर से ज्यादा ही रही होगी। बीस रुपये मांगे। मैंने पचास का नोट दिया तो वह आस पड़ोस में नोट भंजाने निकला।

मेरा वाहन चालक अभिनंदन और वह साथ गये। दुकानदार ने उन्हे दो दो रुपये के पचीस सिक्के निकाल कर दिये। वापस दोनो पैसे गिनते लौटे। पंद्रह सिक्के अभिनंदन ने गिने और मैंने वैसे ही जेब में रख लिये। मेरे लिये तीस रुपये की ज्यादा वैल्यू नहीं थी; वह अनुभव ज्यादा महत्वपूर्ण था – पूरी तरह एड-हॉक तरीके से गांव की सड़क पर चलते चले जाना। किसी कुनबी के खेत में यूंही हिल जाना। मचान से सोते किसान को उठाना और पपीता खरीदने की मंशा रखते हुये करेला खरीद लेना। …ऐसा कम ही लोग अनुभव करते होंगे! :lol:

मेरा वाहन चालक अभिनंदन और वह साथ गये। दुकानदार ने उन्हे दो दो रुपये के पचीस सिक्के निकाल कर दिये। वापस दोनो पैसे गिनते लौटे।

उस किसान से नाम पूछा। बताया देवनाथ। फिर बोला भाई का नाम कैलाश है। कुछ इस अंदाज में कि भाई महत्वपूर्ण है। मालिकाना हक उसके भाई का हो! :-)

जिंदगी का यह एडहॉकिज्म; सुकूनदायक दूसरी पारी का आनंद है। जब आप रीजनेबल तरीके से स्वस्थ हों, मानसिक रूप से उर्वर हों, लिखने पढ़ने में मनलायक ठेल सकते हों और किसी को ‘सर, सर’ करने की बाध्यता न हो! और कहीं भी कुछ भी एक्स्प्लोर करने की मनमौजियत पाल सकते हों। साइकिल ले कर निकलें तो अगले क्षण उसका हैण्डल किस ओर मुड़ेगा, इसकी कोई प्लानिंग न हो। कार में हों तो चालक महोदय को कहीं भी रुकने को कह सकते हों। पपीता खरीदने निकले हों और करेला खरीद कर लौटें तो पत्नीजी कुड़बुड़ाने की बजाय उसका स्वागत ही करें!

पता नहीं, लोगों को यह आनंद चाहिये या नहीं; मुझे बहुत भाता है। देवनाथ-भाई-कैलाश से फिर मिलना चाहूंगा। कोशिश करूंगा कि वह पपीता मुझे बेच ही दे हफ्ता दस दिन बाद! :-)

देवनाथ

ललही छठ के दिन ढोल ताशा


ये ढोल है और वो ताशा। उसने मुझे इस प्रकार से उत्तर दिया मानो उम्रदराज होने पर भी जनरल नॉलेज में हाँथ तंग होने वाले व्यक्ति पर उसे आश्चर्य/तरस हो।

हाईवे – एनएच19 – ग्राण्ड ट्रंक रोड। यह स्थान दिल्ली और कलकत्ता के मध्य में है। बजनिया आदमी और एक असिस्टेण्ट लड़का बैरियर कूद कर सर्विस लेन पर आये। जब कूद लिये तो मैंने अपना फीचर फोन का कैमरा क्लिक किया।

यह तीन दिन पहले की बात है।

उस आदमी से पूछा – शादी व्याह का लगन तो नहीं चल रहा? काहे के लिये निकले हो सवेरे सवेरे?

वह सर्विस लेन क्रॉस कर मेरे सामने आया और बोला – आज ललही छठ है। औरतें पूजा करेंगी। साथ में बाजा बजना चाहिये। उसके लिये हमें काम मिलेगा।

वह सर्विस लेन क्रॉस कर मेरे सामने आया और बोला – आज ललही छठ है। औरतें पूजा करेंगी। साथ में बाजा बजना चाहिये। उसके लिये हमें काम मिलेगा।

उसके कांधे पर ढोल था। कमीज के दो बटन खुले। लड़का टीशर्ट पहने था और गोल नगाड़े नुमा नाद करने वाला उपकरण लिये था। मैंने पूछा – इन्हे क्या कहते हैं?

ये ढोल है और वो ताशा। उसने मुझे इस प्रकार से उत्तर दिया मानो उम्रदराज होने पर भी जनरल नॉलेज में हाँथ तंग होने वाले व्यक्ति पर उसे आश्चर्य/तरस हो।

ये ढोल है और वो ताशा। ढोल आदमी के पास। उसके पास तश्तरी नुमा जो चीज है वह कड़कड़िया है। ताशा नगाड़े नुमा चीज लड़के के पास है।

बहुत से लोग, बहुत सी चीजें नहीं जानते। मसलन सच्चिदानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ जी के पास गये एक कवि जी अपनी कालजयी कविता ठेल रहे थे। उसमें कई शानदार बिम्ब थे। “खंजन नयन” जैसी उपमाओं का प्रयोग था। अज्ञेय जी ने उनसे पूछा – सामने जो चिड़िया बैठी है; वह कौनसी है? आप जानते हैं?

कवि महोदय बता न पाये। तब अज्ञेय जी ने बताया – वह खंजन है!

मैंने भी ढोल-ताशा खूब सुना था। शायद लिखने में प्रयोग भी किया हो। देखा भी हो। पर ताशा क्या होता है, वह तीन दिन पहले पता चला।

बाई द वे; खंजन आपने देखा है न? :-)

ललही छठ को महिलायें शीतला माता की पूजा करती हैं अपने पुत्र की वृद्धि और रक्षा के लिये। उसके लिये एक देशज कथा भी प्रचलित है। उस कथा में किसान के हल से नवजात शिशु को चोट लगने और शीतला माता की कृपा से शिशु का ठीक हो जाना होता है। कथाओं में सत्यनारायण कथा की तरह कर्म और फल का चटपट सम्बंध निहित होता है। कथायें तो हमारे देशज व्रत-पूजन-त्यौहार का अभिन्न अंग होती ही है!

व्रत करना भी अधिकतर महिलाओं के डोमेन में आता है। तो ललही छठ के दिन यूंही उगने वाला तिन्नी का चावल और महुआ का लाटा प्रयोग में लाती हैं वे। शीतला माता के थान पर पूजा करने जाती हैं – अकेले और समूह में भी। आते जाते मैंने देखा है, पूजन करते नहीं देखा। देशज व्रत-पूजन बहुत कुछ देखना अभी शेष है।

और ललही छठ, बलराम जयंती है। हल की पूजा होती है। अब हल तो बचे कहां। उसकी जगह ट्रेक्टर पूजा का विधान तो शायद ही बना हो! कैसे पूजन होता है, उस बारे में मेरा जी.के. तंग है! :lol:


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