भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
कालि पाणिनि आनंद जी क फोन आई रहा। ओ तीन ताल वाली बतकही क बाबा हयेन। ओ जेतना पारंगत हिंदी में हयेन ओसे ढेरइ अवधी में होइहीं। ओनसे हम आपन हिंदी सुधारई बदे बात किहा। आपन अवधियऊ धाराप्रबाह करे के बारे में भी कहा। ओ कहेन कि हम अवधी में कुछ लिखि क देखाई त ओ कौनौ सुझाब दई सकिहीं। उही बदे ई लिखत हई।
पाणिनि आनंद
जब हम गदेला रहे, त सात साल कि उमिर तक अवधियई बोलात रहा घरे में। ओकरे बाद पिताजी अपने संगे जेहर लई गयेन ओहर रहे त अवधियउ भुलाइ गइ। एक साध मन में जरूर जिंदा रही कि अवधी में, आपन बोली में पांच सात मिनिट बोलि सकी। बकिया, हमार पत्नी जी ई परयोग के बहुतइ खिलाफ हइन। ओनकर बिस्वास बा कि हमार अवधी कौनौं लाया नाहीं बा।
एक किताब रही सीताराम पांड़े सुबेदार पर। ओ सन सत्तावन क लड़ाई में अंगरेजन क सेना में रहेन और रिटायर भये पर अवधी में आपन आत्मकथा लिखे रहें। ऊ आत्मकथा त बिलाइ गई, लेकिन कौनों अंगरेज अफसर जेम्स लंट ओकर अंगरेजी अनुबाद करे रहेन। ऊ किताब सिविल सेवा के अफसरन के पढ़े परत रही। [अंगरेजी में कितबिया सायदसे इण्टरनेट आर्काइव पर मिलि जाये।] ओकर अनुबाद फेरि से अवधी में मधुकर उपाध्याय करे रहेन। हमरे लगे ऊ प्रति रही पर के जाने के लई गयेन त लौटायेन नाहीं। ओकरे बारे में अपने ब्लॉग पर हम लिखे भी रहे। अब ऊ कितबिया कतऊं मिलतऊ नाहींं बा। आउट आफ प्रिण्ट होई गइ। अवधी पढवैय्या हईअई नाहीं हयें त काहे फेरि छापइ परकासक?
“सीताराम पांड़े” रही होति त ओके पढ़े से कौनो सहायता मिलत। अब त जीडी तोहके खुदै परयोग करे परे।
हमरे खियाल से एतना काफी रहे पाणिनि जी के देखावई बदे। बकिया, ई लिखब बहुत मुस्किल बा। अउर असल बात त ई बा कि एकर कौनो पढ़वईया त हयेन नाहीं! :lol:
कुलदीप मिश्र (उर्फ कुलदीप सरदार) तीस साल के जवान हैं। पत्रकारिता के इलाके में हैं। उनकी प्रोफाइल बताती है कि डेढ़ पौने दो साल से इण्डिया टुडे समूह में एसोशियेट एडीटर हैं। मुझे अंदाज नहीं कि एसोसियेट एडीटर किस औकात का पद होता है, पर देखने में बड़ा प्रभावशाली लगता है; वह भी तीस साल के नौजवान के लिये। उदाहरण के लिये अगर मैंने रेलवे यातायात सेवा की राजपत्रित नौकरी ज्वाइन न की होती और अपनी रुचि के अनुसार विश्वविद्यालय में प्रवक्ता बना होता, तो पैंतालीस पचास की उम्र में (कुलदीप जी की उम्र से 15-20 साल बाद) असिस्टेण्ट या एसोसियेट प्रोफेसर ही बना होता।
कुलदीप मिश्र
सो कल जब कुलदीप जी का फोन आया और उनके बारे में कुछ पता चला तो मैं प्रभावित ही नहीं हुआ, मैं अतीत के तीस साल की उम्र के ज्ञानदत्त पाण्डेय से उनकी तुलना के मोड में आ गया। ऐसा नहीं कि कुलदीप की तुलना में अपनी मेधा या अपनी उपलब्धियों को कम या अधिक कर आंकने का प्रयास करने लगा – हम दोनो के रास्ते, प्रोफेशन और (सम्भवत:) रुचियां अलग अलग प्रकार की हों, या रही हों; पर जो बात मुझे चमत्कृत करने लगी वह तब के और आज के तीस साला युवा की जिंदगी में आये अपने भविष्य के स्वप्नों में (व्यापक) बदलाव को ले कर है।
कुलदीप जी ने बताया कि उनकी शादी हाल ही में हुई है। उनकी पत्नी भी पत्रकार हैं। वे भी इण्डिया टुडे समूह के ‘लल्लनटॉप’ में जुड़ी हैं। वे दोनो एक ही फील्ड में एक ही प्रकार के काम में हैं – यह बड़ा ही अच्छा है। दोनों में उत्कृष्टता को ले कर स्वस्थ प्रतिद्वन्द्विता भी हो सकती है और दोनो एक दूसरे को प्रोफेशनली परिपुष्ट भी कर सकते हैं। दोनो अपनी योग्यताओं से भविष्य की योजनायें कहीं अधिक सार्थक तरीके से बना सकते हैं।
कुलदीप जी ने एक बात कही, जो मेरे मन में गहरे से पैठ गयी वह थी उनकी पैंतालीस की उम्र से पहले शीर्ष को प्राप्त कर लेने की इच्छा और उसके बाद रिटायरमेण्ट की सुकून भरी जिंदगी का स्वप्न! कमाने और प्रभुता पाने की जो रैट रेस है – जो मेरे समय में भी थी, पर इतनी नहीं थी – अब बहुत भीषण हो गयी है। हम लोग जो पचपन की उम्र में ‘बर्न-आउट’ महसूस करते थे, वह शायद अब लोग पैंतीस-चालीस की उम्र में करने लग गये हैं। फिर भी, अर्जन के अवसर इतने अधिक हो गये हैं कि एक व्यक्ति 28-30 साल की उम्र में पंद्रह साल बाद रिटायरमेण्ट की सोचने लगा है। इस संदर्भ में काफी साहित्य और सेल्फ-हेल्प पुस्तकें, ब्लॉग, व्लॉग, पॉडकास्ट आदि भी उपलब्ध हैं।
पैंतालीस की उम्र में जूते टांग देना अब महज शेखचिल्लियत नहीं रही; वह मनुष्य की मुठ्ठी में आने वाली चीज हो गयी है। यद्यपि, मेरा सोचना है कि वह सरल नहीं है। और पैंतालीस के बाद का कुलदीप जी का पोस्ट-रिटायरमेण्ट मेरी तरह साइकिल ले कर घूमना तथा ब्लॉग या सोशल मीडिया पर दो चार पोस्ट ठेल देना भर नहीं हो सकता है। वह काफी कुछ एक्टिव या हाइपर एक्टिव होगा। यह उपभोक्तावाद की बुनियाद पर चल रही दुनियाँ चैन लेने नहीं देगी – ऐसा मेरा मानना है!
मंगोलियन भोजन खोजी
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मैं युवाल नोवा हरारी की पुस्तक से उद्धरण देता हूं। हरारी के अनुसार भोजन-खोजी मानव जब खेती करने लगा तो उसे बहुत अच्छा लगा होगा। उसके जीवन में स्थायित्व आया होगा। वह घुमंतू जिंदगी छोड़ घर बसाने, खेती करने, गुड़ाई निराई में लगा रहने वाला हो गया। पर तब वह अपनी खेती पर इतना आश्रित हो गया था कि खेती बिगड़ने पर अकाल और भुखमरी का सामना भी उसे ज्यादा ही होने लगा। उसे खेती पर काम करने के लिये लोगों की जरूरत पड़ने लगी तो बच्चे भी पैदा करने की ज्यादा से ज्यादा जरूरत हुई। उनके लिये खाने के लिये ज्यादा अनाज भी चाहिये था। … वह रैट-रेस में धंसता गया। इतना धंसा कि वह अपने आप को खेती ईजाद कर, हल चला कर अभूतपूर्व प्रोडक्टिविटी बढ़ाने वाला तीसमारखाँ समझने लगा। पर वास्तव में वह गेंहू जैसी एक जंगली घास का दास ही बना।
“वास्तव में मानव गेंहू जैसी एक जंगली घास का दास ही बना” Photo by Pixabay on Pexels.com
आज भी कृषि युग वाली जैसी ही दशा है। सेपियंस पुस्तक के निम्न उद्धरण को देखें –
‘सेपियंस’ से एक उद्धरण। अध्याय 5 – इतिहास का सबसे बड़ा धोखा
आज से आधा शताब्दी बाद अगर कोई सेपियंस का आधुनिक सीक्वेल लिखेगा तो मोबाइल, इण्टर्नेट, डिजिटल गैजेट्स और आर्टीफीशियल इण्टैलिजेंस के चक्र (दुश्चक्र?) में लिप्त आज के नौजवान की तुलना भोजन-खोजी से खेती के व्यवसाय में आये आदिमानव से कर यह निष्कर्ष निकालेगा कि यह डिजिटल क्रांति भी ‘इतिहास का सबसे बड़ा धोखा’ ही थी! एक ऐसी क्रांति, जिसे हम अनिवार्य या अवश्यम्भावी मानने के सिवाय कुछ और सोच या कर नहीं सकते।
और, मुझे यह विश्वास नहीं होता कि जब लॉगेविटी 100 साल की हो जायेगी तो पैंतालीस की उम्र में रिटायर हो कर लोग बाकी के पांच दशक सशक्त और रचनात्मक तरीके से विलासिता की हाय हाय में न फंसते हुये, हर साल नये बनते गैजेट्स को लेते बदलते रहने या नये मॉडल की सेल्फ ड्रिवन कार लिये बिना बिता सकेंगे। वे कैसे हर साल अपनी पत्नी को नये ब्राण्ड के डिजिटल गहने की गिफ्ट देने की चिंता से मुक्त रह सकेंगे, जब उनके जीवन की बुनियाद में ही उपभोक्तावाद का अर्थशास्त्र है। कैसे वे सुकूनात्मक तरीके से जी सकेंगे?
मैं यह भ्रम नहीं पाले हूं कि मेरे निष्कर्ष सही हैं। मैं यह भी नहीं कहना चाहता कि कुलदीप मिश्र और उनकी युवा पत्नीजी “रिटायरमेण्ट@45” का लक्ष्य नहीं पा सकते। मेरे ख्याल से एक ठीकठाक मध्यवर्गीय जीवन जीने के लिये (आजकी कीमतों पर) 8 करोड़ का कॉर्पस पर्याप्त है। और वह वे दोनो अपने अर्जन से 45 की उम्र तक यह लक्ष्य पा सकते हैं। लेकिन मितव्ययता, संतोष और अपनी चाहतों (wants) के पीछे भागने का दमन एक घोर अनुशासन है। यह घोर अनुशासन मैं तो नहीं कर पाया। पर यह मान कर चला जाये कि मिश्र दम्पति में वह संकल्प शक्ति होगी और खूब होगी!
इस रिटायरमेण्ट@45 के ध्येय की सफल प्राप्ति के लिये कुलदीप मिश्र दम्पति को ढेरों शुभकामनायें!
इस मुद्दे पर मैंने धीरेंद्र कुमार दुबे, अपने बड़े साले साहब को भी सोचने और अपने निष्कर्ष बताने को कहा है। धीरेंद्र मेरी तरह अपने को गांव की सीमाओं में ‘कूर्मोंगानीव’ समेटे नहीं हैं। वे बेंगलुरु में रहते हैं और उन्हे देश परदेश के लोगों को ऑब्जर्व करने का व्यापक अनुभव है। वे जैसा बतायेंगे, उसके अनुसार मैं इस पोस्ट का दूसरा भाग प्रस्तुत करूंगा। आशा है, वे जल्दी ही अपने विचार प्रकटित करेंगे! :-D
सुग्गी हमारी अधियरा है। और मेरे ब्लॉग का एक प्रमुख पात्र। उसके माध्यम से गांवदेहात को समझता हूं मैं। गांव को समझने की खिड़की। लोग कहते हैं कि अपना अधियरा बदलते रहना चाहिये, पर हमें (निर्णय मेरी पत्नीजी करती हैं) उससे कोई शिकायत नहीं तो बदलने की बात भी नहीं उठती। वह हमारे विस्तृत परिवार की तरह हो गयी है।
बरसात के मौसम में गोबर पाथ कर उपले बनाये नहीं जा सकते। गोबर इकठ्ठा करने की जगह भी सुग्गी के घर के पास नहीं है। इसलिये आजकल वह मेरे घर में ला कर पीछे जमा कर देती है। गोबर सड़ कर अच्छी खाद बन जायेगा। तब उसका प्रयोग वह खेत में करेगी और मेरी पत्नीजी अपनी बगिया में। हम दोनों का लाभ है इसमें।
आज रात भर से बारिश हो रही है। कभी तेज और कभी धीमी। पर रुक नहीं रही। जब बारिश होती है तो बिजली नहीं आती गांव में। आज भी रात भर से नहीं है। मेरे घर का सोलर बैक-अप भी बहुत कम काम कर रहा है। पूरा आसमान मेघाच्छादित है। हमारा एक इंवर्टर बैठ चुका है। दूसरे के बल पर काम चल रहा है। बिजली का मितव्ययता से प्रयोग हो रहा है। पर चूंकि गांव में हमारे यहां ही बिजली होती है, आसपास के लोग यहीं आते हैं अपना मोबाइल चार्ज करने। सुग्गी का लड़का भी लगा गया है अपना स्मार्टफोन (उसके जीजा ने अपना पुराना उसे दे दिया है)।
सुग्गी गोबर ले कर आती है। हम पोर्टिको में चाय पी रहे हैं और मेरे पास मोबाइल फोन रखा है। मैं सुग्गी के चित्र लेता हूं। सुग्गी गोबर पीछे डाल कर आती है। घर में काम करने में और खुले में निकलने में पूरी तरह भीग गयी है। पर वह तुरंत वापस लौटने की बजाय मेरी पत्नीजी से बातचीत करने लगती है।
सुग्गी कहती है, बहुत काम है, पर बतियाने को रुकी रहती है।
सुग्गी बहुत वाचाल है। कहती जाती है – “जीजी, बहुत काम है। मरने की फुर्सत नहीं है।” पर फिर भी रुक कर बातें खूब करती है। कई बार तो बातें खत्म कर जाने लगती है तब कुछ और याद आ जाने पर वापस लौट कर बताने-बतियाने लगती है।
आज तो उसके पास कहने को बहुत कुछ है। रात भर बारिश होती रही। उसके घर में दो मड़ई हैं। एक में पूरा परिवार रहता है और दूसरे में उसकी भैंस, बकरियां, तोता, खरगोश और मुर्गियाँ। जानवरों वाली मड़ई धसक रही है। छप्पर पर इतना अटाला पड़ा रहता है और बारिश में छप्पर भीग कर इतना वजनी हो जाता है कि उसका धसकना लाजमी है। कल उसकी एक बल्ली टूट गयी थी तो हमारे घर से एक बांस मांग कर ले गयी थी। आज पूरी मड़ई ही लटकी जा रही है। रात किसी तरह काटी है। अब दिन में उसकी मरम्मत भी करनी है।
सुग्गी का आदमी – राजू – सब्जी का ठेला लगाता है। सब्जी लेने भोर में ही कछंवा सब्जीमण्डी जाता है। आज बारिश के कारण निकल ही नहीं पाया। अब दिन में कभी जायेगा। वैसे भी, राजू मेरी तरह लद्धड़ है और सुग्गी मेरी पत्नीजी तरह स्मार्ट। गृहस्ती तभी चल पा रही है – उसकी भी और हमारी भी।
वह अपनी धान की नर्सरी की बात करने लगती है। इस साल मेरी पत्नीजी की फरमाइश पर बासमती धान के बीज ले आई थी। उसकी नर्सरी बनाई पर उसके बाद पानी बरसे चले जा रहा है। पता नहीं बीज अंकुरित भी होंगे या नहीं। अगर नहीं हुये तो एक बार फिर नर्सरी बनानी होगी। बीज का खर्चा डबल होगा। एक और खेत में उड़द बोनी है। पर बारिश रुके तभी वह हो सकेगा। ज्यादा बारिश में तो उड़द की पौध गल जायेगी। बारिश ज्यादा होने से काम रुक भी गया है और काम बढ़ भी गया है।
बातचीत बारिश से हट कर परनिंदा पर खिसक आयी है। पड़ोसियों से कष्ट है सुग्गी को। उन्होने अपने घर ऊंचे कर लिये हैं। अपनी बाउण्ड्री भी बनवा ली है। उसके यहां बारिश का पानी ज्यादा इकठ्ठा होने लगा है। पचीस पचास ट्रॉली मिट्टी गिरे तो जा कर उसका घर सूखा रह पाये। औरों के पास तो पैसे हैं; उसके पास नहीं; और इसका दर्द झलक जाता है। स्वसुर ने भी राजू के छोटे भाई को दे दिया, उसको नहीं। छोटे भाई ने पक्का कमरा बनवा लिया है। उसकी भी कसक सुग्गी को है। … पर इस परनिंदा के बावजूद सुग्गी बहुत नहीं कोसती। हंसती रहती है।
घर में काम का अकाज हो रहा है, यह वह कई बार बताती है पर फिर भी बातचीत के लिये खड़ी रहती है। मुझे लगता है कि उसे एक कप चाय ऑफर कर दी जाये, पर वह पीती नहीं – “अभी मुखारी नहीं किया है जिज्जी।” दातुन करने के बाद ही कुछ मुंंहमें डालने की परम्परा है। सवेरे उठते ही भैस की सेवा का काम सामने होता है तो मुखारी करना रह ही जाता है।
सुग्गी जिस तसले में वह गोबर ले कर आयी थी, उसको सिर के ऊपर छाते की तरह ओढ़ लेती है।
आखिर में वह वापस लौटती है। बारिश हुये जा रही है। जिस तसले में वह गोबर ले कर आयी थी, उसको सिर के ऊपर छाते की तरह ओढ़ लेती है। और मैं एक और चित्र खींच लेता हूं उसके जाते हुये का!