प्रसन्नता की तलाश – गंगा, गांव की सैर


बेटा-बहू-पोती का गांव से प्रयागराज शिफ्ट हो जाना घरेलू दशा में बड़ा बदलाव है हमारे लिये। वैवाहिक जीवन में, शुरुआती दिनों को छोड़ दें तो हम परिवार बनाने में या परिवार के साथ रहने में ही लगे रहे। चालीस साल उस तरह बीते। पहले बेटा-बिटिया को पालने में रहे। बिटिया की शादी होने के बाद कुछ ही समय बीता; और उसमें भी बेटा साथ रहा; हम अपने माता पिता के साथ रहने प्रयागराज आ गये। वहां माता के देहावसान के बाद मेरे पिताजी मेरे साथ रहे। करीब चार साल तो वे और मैं एक ही कमरे को शेयर करते रहे।

नौकरी की समाप्ति पर हम गांव में शिफ्ट हो गये। गांव में मेरा पूरा परिवार – पिता, बेटा-बहू-पोती साथ रहे। कभी कभी मेरी सास जी भी आकर हमारे साथ रहती रहीं। मेरे पिताजी और मेरी सास जी ने देह त्याग भी हमारे इसी गांव के घर में किया।

अब, चालीस साल बाद, यह समीकरण बना है कि गांव में घर है, और केवल हम दो व्यक्ति – पत्नीजी और मैं भर घर में रह रहे हैं। चालीस साल बाद यह स्थिति आयी है कि स्नानघर में जाते समय दरवाजा बंद करेंं या न करें – कोई फर्क नहीं पड़ता। और यह स्थिति एक या दो दिन की नहीं है। आगे केवल एक दूसरे के साथ जीना है।

अटपटा लग रहा है। कोरोना संक्रमण काल से यह कहीं बड़ा डिसरप्शन (disruption) है।

पर हर बदलाव को परखना और उसमें से रास्ता निकालना ही जीवन है। हमने भी, जो परिस्थिति है, उसमें ‘अच्छा’ तलाशने का काम किया। अपनी दिनचर्या बदलने की शुरुआत की। सवेरे उठ कर एक घण्टा घर में ही एक्सर्साइजर पर कानों में हेडफोन लगा पॉडकास्ट सुनते व्यायाम करने को नियमित किया है। पत्नीजी भी म्यूजिक लगा कर घर के बड़े और लम्बे ड्राइंग रूम में घूमने का व्यायाम करती हैं। उनके लिये पौधों की देखभाल, पानी देना और खरपतवार निराई करने के भी काम हैं। उससे भी उनका व्यायाम हो जाता है।

गंगा तट पर रीता पाण्डेय और मैं। चित्र अशोक ने लिया।

हा दोनों ने अपना वजन कम करने की दिशा में प्रयत्न किये हैं। भोजन सीमित करना, दूध वाली चाय की बजाय पानी, जीरा और ग्रीन-चाय का प्रयोग करना प्रारम्भ कर दिया है। अब दूध लेने जाने की जिम्मेदारी मैंने ले ली है। उसमें भी कुछ व्यायाम होता ही है।

घर के बाहर देखने के लिये मेरे पास गांवदेहात का भ्रमण पहले से था – साइकिल ले कर 10 किलोमीटर के दायरे में घूम आता था। अब उसमें मैंने पत्नीजी को भी जोड़ा। सवेरे अपने वाहन चालक को सात बजे बुला, उसके साथ एक कप चाय पीने के बाद हम दोनों ने घर से निकल कर गांव की छोटी सड़कों पर यूंही घूमने की सोची। करीब एक घण्टा इस प्रकार व्यतीत करने का कार्यक्रम रखा।

उस सिलसिले में कल द्वारिकापुर के गंगा तट पर गये।

सूर्योदय होने पर भी कोहरा था। कहीं कहीं तो बहुत घना भी हो जाता था। उसे चीरते हुये धीमी चाल से कार से निकलना और खिड़की से गांव देहात को निहारना बहुत अच्छा लग रहा था। साइकिल पर होता तो कई जगह रुकता – सरसों के खेत, घूरे पर सवेरे की बटोरन ले कर जाती महिला, बासी भात थाली में उंडेलती महिला, स्कूल जाते बच्चे – यह सब ठहर कर देखता। पर वाहन पर बैठ गुजरते हुये देखना भी खराब नहीं था। कार की एक खिड़की मैंने और दूसरी पत्नीजी ने सम्भाल ली थी। देखते हुये इतना अच्छा लग रहा था कि बात करना बंद हो गया।

गंगा तट के करार से नीचे उतरती पत्नीजी।

वाहन पार्क कर हम गंगा तट की ओर चले। घाट पर कोहरा इतना था कि जल या कोई गतिविधि दिख नहीं रही थी। अगर हमें पहले से गंगा तट की जानकारी न होती तो दिखाई न देने के कारण हम नीचे उतरते ही नहीं। बहुत पास जाने पर एक खाट पड़ी दिखी। शायद पिछले दिन मौनी अमावस्या स्नान के लिये घाट पर किसी पण्डा ने बिछाई होगी और रात में उसे वापस नहीं ले गया होगा। तीन चार महिलायें स्नान कर रही थीं। उसके आगे तीन बालू ढोने वाली बड़ी नावें किनारे लगीं थीं। एक नाव में रहने का कमरा था, उसमें से निकल कर नाविक चाय पी रहा था। एक आदमी अण्डरवियर पहने साबुन लगा कर गंगा में डुबकी लगाने वाला था। पत्नीजी ने कहा – उसपर तो कैमरा मत साधो!

घाट के किनारे बबूल के वृक्ष भी शांत थे। कोहरे का कम्बल ओढ़े।

सब कुछ शांत, सब कुछ सुंदर, सब कुछ पहले का देखा होने पर भी नया। हम दोनो के हाथ में मोबाइल थे और उसमें फोटो कैद करने के लिये खूब यत्न कर रहे थे हम। दस पंद्रह मिनट थे वहां हम। आनंद ही आनंद था वहा!

महिलायें स्नान कर लौटने लगीं तो मेरी पत्नीजी ने उनसे बात की। एक महिला करहर (तीन किलोमीटर दूर गांव) की थी। पैर सूजे थे। फाईलेरिया था। पर वह सालों से नियमित गंगास्नान को आती है। बाकी महिलायें इसी गांव – द्वारिकापुर की थीं। उनके पास नित्य गंगा स्नान एक धर्म, व्यवहार, आनंद और प्रसन्नता की आदत है। वैसी ही आदतें हमें अपने में विकसित करनी हैं। और उसके लिये पूरी तरह से प्रयासरत हैं हम दोनो।

घर वापस आने पर प्रसन्नता का प्रभाव दिन भर बना रहा। वही ध्येय भी था!

हमारा वाहन चालक अशोक। उसे मोबाइल से चित्र लेना भी सिखाना होगा, अगर कार भ्रमण नियमित होता है, तो!

शिवकुटी घाट पर अमौसा के दिन


मैं नहीं हूं शिवकुटी, प्रयागराज में। पर मेरे बहू-बेटा-पोती अब वहां रहने चले गये हैं। उनके माध्यम से शिवकुटी घाट का गंगा भ्रमण हो जाया करेगा; यदा कदा।

शिवकुटी और वहां के गंगा तट ने मेरे ब्लॉग को बहुत समृद्ध किया है। बहू-बेटा-पोती के वहां रहने के कारण आगे भी शिवकुटी की पोस्टें आती रहेंगी। आप शिवकुटी पर क्लिक कर पुरानी सभी पोस्टें देख सकते हैं।

कल मौनी अमावस्या थी। प्रयाग में बड़ा मेला। मेरे बहू-बेटा-पोती वहां होने के कारण शिवकुटी के गंगा तट पर गये। यह पोस्ट उन्ही के भ्रमण का विवरण है। कथ्य और चित्र बहू बबिता पाण्डेय के हैं –


दिन माघ की अमावस्या का था, और यह माघ मेले का सबसे महत्वपूर्ण दिन था। पर हम लोग देर से गये। दिन के दो बजे थे। शिवकुटी के घाट पर गंगा बहुत पीछे चली गयी थीं। कुछ लोग जाल डाल कर मछली पकड़ने में लगे थे। उनके अलावा कुछ ही लोग थे। भीड़ नहीं थी। शायद सवेरे नहा कर जा चुकी थी।

हमने (चीनी/पद्मजा, भैया जी और मैंने) गंगा जी में हाथ पैर धोया। सिर पर जल छिड़का। वापस लौटने लगे तो लगा कि फोटो तो लिये ही नहीं! वापस तट पर गये।

दो उम्रदराज महिलायें वहां पूजन कर रही थीं। आपस में बात कर रही थींं- हमने पूजा तो ठीक से कर ली। अब गंगा मईया में फूल कैसे विसर्जित करें?

मेरे (बबिता के) हाथ में फूल दोनो ने एक साथ रखे, मेरा हाथ थामे थामे पांच बार गंगा माई का जयकारा किया। चित्र पद्मजा द्वारा।

गंगा किनारे फिसलन थी। उन महिलाओं को उसी का भय था। मैंने उन्हें कहा कि अगर आपको आपत्ति न हो तो मैं गंगाजी को आपके फूल चढ़ा सकती हूं। यह सुन दोनो महिलायें बहुत प्रसन्न हुईं। मेरे हाथ में फूल दोनो ने एक साथ रखे, मेरा हाथ थामे थामे पांच बार गंगा माई का जयकारा किया। उसके बाद मैंने विसर्जन किया। महिलाओं ने स्वत: कहा कि वे गोविंदपुर चौराहे से आयी हैं। उनका हमारी सहायता से सारा पूजन विधिवत हो गया।

महिलायें मेरी दादी सास के उम्र की थीं। हम सब ने उनके चरण स्पर्श किये। उनका आशीर्वाद और प्रसाद के लड्डू हमें मिले। बहुत आनंद आया इस अनुभव से।

वापसी में घाट के पण्डाजी से भैया जी ने तिलक लगवाया।

वापसी में घाट के पण्डाजी से भैया जी ने तिलक लगवाया। दक्षिणा दी। पिताजी (ज्ञानदत्त पाण्डेय) का हालचाल पूछा पण्डाजी ने। हमने बताया कि हम अब चीनी की पढ़ाई के लिये शिवकुटी में रहने आ गये हैं।

कोटेश्वर महादेव और हनूमान जी के दर्शन के बाद हम घर वापस आये। उन दो वृद्ध महिलाओं की सहायता से मन प्रसन्न था।

चीनी (पद्मजा) भैया जी (ज्ञानेंद्र पाण्डेय) और बबिता। गंगा तट पर।

बेल पके से चिरई के का लाभ?


गांव में होने का यह लाभ तो है कि दूध अच्छा मिल जाता है। पांच साल से ज्यादा हो गया मन्ना से दूध लेते लेते।

मन्ना के यहां से रोज दूध लेने मेरा बेटा जाता था। कल उसका परिवार शिवकुटी, प्रयागराज शिफ्ट कर दिया।


चिन्ना पांड़े (मेरी पोती) अब साढ़े सात साल की हो गयी है। उसकी पढ़ाई का विचार मन में था। कोरोना संक्रमण काल में मैंने उसे पढ़ाने के प्रयोग किये। पर लोगों ने कहा कि एक अच्छे स्कूल का कोई विकल्प नहीं। उसे मिलने वाले वातावरण की भरपाई बाबा-पोती का इण्टरेक्शन नहीं कर सकता। काफी चर्चा हुई घर में। अंतत: मैंने अपने प्रयोग करने की बजाय लड़के-बहू और चिन्ना (पद्मजा) को शिवकुटी (प्रयागराज) शिफ्ट कर दिया। स्कूल का अगला सत्र वहां ज्वाइन होगा।

चिड़ियाँ गांव से उड़ गयीं। हम लोग – मेरी पत्नी और मैं, अब अपने को गांव में अपने हिसाब से व्यवस्थित करेंगे। गांव से प्रयागराज जाते आते रहेंगे। महीने में एक दो चक्कर लगेंगे ही।

Wood Apple Fruit
बेल फल। Wood Apple. By Seisfeldt at English Wikipedia https://commons.wikimedia.org/w/index.php?curid=8711348

ज्ञानेंद्र (मेरा बेटा) अपने परिवार के साथ अब प्रयागराज चला गया है तो आज दूध लेने मैं गया। जब तक भुजाली (डेयरी में काम करने वाला भृत्य) दूध दे रहा था; देवेंद्र भाई (मन्ना दुबे के सबसे बड़े भाई साहब) से इधर उधर की बात हुई। उन्होने एक कहावत कही – “अब यह तो है कि बेल पके से चिरई को क्या लाभ?”

बेल (wood apple) का फल अंदर से तो मीठा होता है पर उसका खोल बहुत कड़ा होता है। चिड़िया के ठोर मारने से उसमें सुराख नहीं हो सकता। कठफोड़वा शायद सुराख कर सके; पर कठफोड़वा तो कीड़े खाता है, फल नहीं।

चिन्ना और उसके माता पिता चिड़िया हैं। बेल गांव है। बेल में बहुत गुण हैं। मीठा है, शीतलता है। स्वास्थ्य के लिये आयुर्वेद बहुत कुछ बताता है बेल में। पर चिड़िया को बेल से क्या लाभ?

पांच साल से परिवार गांव में एक जगह था। बहुत अच्छा समय था। पर समय सदा स्थिर तो नहीं रहता। बदला समय और अच्छा होगा; यह सोचा जाना चाहिये। अनेकानेक फल हैं इस सुंदर दुनियाँ में। चिड़ियों को वे फल मिलने चाहियें। केवल बेल का लालच दिखा कर उन्हें रोके रहना उचित नहीं।

आज पहला डेल्हिया खिला है। पद्मजा यहां होती तो देख बहुत खुश होती।

आज घर में पहला डेल्हिया खिला है। पद्मजा यहां होती तो देख बहुत खुश होती। अभी तो वह फोन पर कह रही है – दादी-बाबा, अपना ख्याल रखना!

सच है, बेल पक भी जाये तो चिड़िया के किस काम का?!


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