अयोध्या का पहला ऑर्कियॉलॉजिकल उत्खनन बनारस हिंदू विश्वविद्यालय ने किया था


प्रोफेसर अशोक कुमार सिंह, से मैं अगियाबीर के पुरातात्विक उत्खनन के समय से परिचित हूं। उनके अगियाबीर के उत्खनन की ट्वीट्स का रिकार्ड आप इन मोमेण्ट्स में देख सकते हैं।

डा. अशोक कुमार सिंह

सन 2018 से प्रोफेसर सिंह मेरे अभिन्न मित्र बन चुके हैं। कल उन्होने बातों बातों में बताया कि अयोध्या का पहला पुरातात्विक उत्खनन 1969-70 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के उनके विभाग ने किया था। उस उत्खनन में स्थान की प्राचीनता के स्पष्ट प्रमाण मिले थे। तीन अलग अलग स्थानों पर की गयी खुदाई में 600 बीसीई से ले कर मध्यकाल तक की बसावट के साक्ष्य उसमें मिले थे।

इस उत्खनन की संक्षिप्त रिपोर्ट इण्डियन ऑर्कियॉलॉजी रिव्यू 1969-70 (पेज 40-41); में उस समय छपी थी। उस रिपोर्ट को नीचे स्लाइड्स में देखा जा सकता है।

अत: जब डा. अशोक सिंह ने मुझे सन 1969-70 के उत्खनन के बारे में बताया तो मुझे बहुत हर्ष मिश्रित आश्चर्य हुआ। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की शेयर वैल्यू मेरी निगाह में और भी बढ़ गयी! :-D

अब मैं और मेरे जैसे लगभग सभी आम जन जो अयोध्या के उत्खनन को आर्कियॉलॉजिकल सर्वे के तत्वावधान में डा. बीबी लाल और उनकी टीम द्वारा 1976-77 में किये अनुसंधान से मान कर चलते हैं और जिसके बारे में मैंने डा. लाल की पुस्तक “राम – हिज हिस्टॉरिसिटी, आर्कियॉलॉजी एण्ड अदर साइंसेज” के दूसरे अध्याय (पेज 54-68) से विस्तृत परिचय पाया है; वे बी.एच.यू. के इस योगदान से अपरिचित रहे हैं।

अत: जब डा. अशोक सिंह ने मुझे सन 1969-70 के उत्खनन के बारे में बताया तो मुझे बहुत हर्ष मिश्रित आश्चर्य हुआ। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की शेयर वैल्यू मेरी निगाह में और भी बढ़ गयी! :-D

डा. अशोक सिंह ने कहा कि उस उत्खनन को करने वाले तीनों दिग्गज पुरातत्वविद – प्रोफेसर एके नारायण, श्री टी.एन. रॉय और डा. पुरुषोत्तम सिंह – इस समय दिवंगत हो चुके हैं। डा. पुरुषोत्तम सिंह, जिन्हे डा. अशोक सिंह अपना गुरू मानते हैं और जिनके साथ पहले पहल उन्होने अगियाबीर का उत्खनन-अनुसंधान किया था; का देहांत पिछले साल ही हुआ है।

सन 1969-70 के उत्खनन की विस्तृत रिपोर्ट उस समय नहीं बन सकी थी। सम्भवत: पुरातत्वविदों की वह टीम अन्य स्थानों के अकादमिक और उत्खनन अध्ययन में व्यस्त हो गयी थी। पर अयोध्या की प्राचीनता के प्रति जिज्ञासा जगाने का प्रारम्भिक कार्य तो उन्होने किया ही था! डा. सिंह के अनुसार डा. बीबी लाल ने भी अपने उत्खनन के पहले बी.एच.यू. के किये उत्खनन को भी स्वीकारा और उसके महत्व को ‘एक्नॉलेज’ किया है।

अब उपलब्ध साक्ष्य-सामग्री के आधार पर; मूल अयोध्या उत्खनन करने वालों के न होने की स्थिति में बी.एच.यू. के पुरातत्व और प्राचीन इतिहास विभाग के प्रमुख और डा. अशोक सिंह की टीम ने उस उत्खनन के पचास साल होने के समय विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने का संकल्प किया है।

इस उत्खनन में अयोध्या के विस्तृत क्षेत्र के सांस्कृतिक सीक्वेंस को समझने के लिये बी.एच.यू. की टीम नें तीन स्थानों – जैन घाट, लक्ष्मण टेकरी और नल टीला – पर छोटे हिस्सों में खुदाई की थी।

इसके अलावा, जैसा कि इण्डियन ऑर्कियॉलॉजी रिव्यू 1969-70 की संक्षिप्त रिपोर्ट में कहा गया है, बी.एच.यू. की टीम ने अलेक्जेण्डर कनिंघम (1862-63 में भारत के ऑर्कियॉलॉजिकल सर्वेयर) द्वारा वर्णित कुबेर टीला क्षेत्र का भी अध्ययन किया था। आशा है उस अध्ययन पर भी अगले महीने बी.एच.यू. द्वारा तैयार की जाने वाली रिपोर्ट प्रकाश डालेगी। डा. अशोक सिंह ने मुझे कनिंघम रिपोर्ट का अयोध्या का एक नक्शा भी भेजा है, जो नीचे प्रस्तुत है –

अलेक्जेण्डर कनिंघम का अजुध्या (अयोध्या) का नक्शा। इसमें घाघरा/सरयू का पुराना बहाव मार्ग देखा जा सकता है।

बी.एच.यू. के पुरातत्व विभाग ने अपने पुराने संग्रह से सभी उपयुक्त सामग्री चिन्हित कर एकत्र कर ली है। डा. अशोक कुमार सिंह कहना था कि वे लोग एक महीने में यह विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर लेंगे। राम मंदिर और अयोध्या इस काल खण्ड में जन मानस का प्रिय है। उस अवसर पर; वे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का उसके अनुसन्धान का जो पायोनियर कार्य किया था; उसे प्रतिष्ठित करना अपना अकादमिक दायित्व मानते हैं।

मैं तो पुरातत्व का ताजा ताजा जिज्ञासु भर हूं। अर्कियॉलॉजी का फुट-सोल्जर तक भी नहीं हूं। पर मुझे भी यह जान कर बी.एच.यू. की विस्तृत रिपोर्ट जानने की जिज्ञासा प्रबल हो गयी है। आशा है उनकी रिपोर्ट जल्दी ही तैयार हो जायेगी और उसके कुछ अंश मुझ जैसे को भी ज्ञात हो सकेंगे।


2 मचिया बन गये अंतत:


मैंने राजबली विश्वकर्मा जी से मिल कर तय किया था कि वे दो मचिया के फ्रेम बनायेंगे।

अपने कहे के पक्के निकले राजबली जी। वे सोमवार को मुझे बना कर देने का वायदा किये थे, पर रविवार को ही उन्होने सूचना दी कि उनका काम पूरा हो गया है। मैंने जा कर देखा तो उनके बनाये फ्रेम को संतोषजनक पाया। उसी दिन शाम को उनका पोता ईश्वरचंद्र मेरे घर पर दोनो मचिये के फ्रेम दे गया। शायद उन्हे मेहनताना लेने की जल्दी थी। पर निश्चय ही, राजबली पहले वाले खाती भोला विश्वकर्मा से बेहतर – बहुत बेहतर साबित हुये। व्यक्ति के रूप में भी और कारीगरी के रूप में भी।

2 मचिया पूर्णत: बनने के बाद सेण्टर टेबल पर रखे हुये।

फ्रेम बनने के बाद हमें यकीन हो गया कि अब मचिया बन ही जायेंगे। अब मेरी पत्नीजी के मन में यही चलने लगा कि कैसे उत्कृष्ट मचिया बन सके। वे आजकल अपने बगीचे के साथ बहुत प्रयोग करती हैं। घर के बेकार प्लास्टिक के डिब्बे – बोतल काट कर उन पर पेण्ट कर कई खूबसूरत गमले उन्होने बनाये हैं। पेड़ पर पुराने जूते भी टांगें हैं कि कोई चिड़िया उसमें अपना घोंसला बना ले। कार के टायर बदलने के बाद पुराने टायर फैंके नहीं गये। उनके साथ भी मुड्ढ़ा, या सेण्टर टेबल या कोई हैंगिंग गमला बनने जा रहा है। इस सब करने में वे अपने को दिन भर व्यस्त रखती हैं।

मचिया के फ्रेम से उन्हे एक और रचनात्मक काम मिल गया। हम ह्वाइट प्राइमर, ब्राउन पेण्ट, तारपीन का तेल, सैण्डपेपर और ब्रश आदि ले कर आये। एक कागज पर मचिया का फ्रेम रख कर वे अकेले पोर्टिको में बैठ गयीं। मैं बार बार जा कर उन्हे तन्मयता से पेण्ट करते देखता रहा। बहुत कुछ ऐसा भाव था उनके मन में जैसे कोई महिला एक शिशु को दुलार रही हो।

सर्दी में ठण्डी हवा में बाहर पोर्टिको में बैठ मचिया पेण्ट करती रीता पाण्डेय

एक मचिये पर उन्होने पेण्ट किया। उसके बाद हमारे वाहन चालक अशोक को भी जोश आया। दूसरे पर अशोक ने पेण्ट किया। और बढ़िया काम किया उन्होने।

मचिया बीनने के लिये हमारे माली रामसेवक जी ने अपनी सेवायें दीं। उन्होने बताया कि वे चारपाई तो बुनते हैं, पर मचिया बीने बहुत अर्सा हो गया। अब मचिया का प्रचलन नहीं है तो बुनना भी नहीं होता। हम मचिया की जरूरत भर की मोटी सुतली महराजगंज बाजार से खरीद लाये। लोग आजकल सुतली का भी प्रयोग नहीं करते। इसलिये, सुतली मिल तो गयी, पर आशा से ज्यादा रेट लगा। खैर, प्रयोग करते समय एक अच्छी मचिया बनाना ध्येय था, कीमत नहीं! :-D

फ्रेम का पेण्ट कल तक सूख गया था। सवेरे बहुत कोहरा था। रामसेवक बनारस जाते हैं काम करने। घने कोहरे के कारण नहीं जा पाये। सो गांव में उनके पास समय था और दिन भर में उन्होने मचिया ही बुन डाले।

पहली मचिया अपने घर पर बुन कर रामसेवक लाये तो मन मुग्ध हो गया।

बहुत सुंदर मचिया की बुनावट थी रामसेवक की। मेरे मित्र गुन्नीलाल पांड़े, जो कल आये थे, ने देख कर कहा कि “मचिया खूब गझिन बुनी है। आम तौर पर इतनी बढ़िया बुनावट देखने में नहीं आती। पहले कभी कदा कोई ऐसी बुनता था। अब तो कोई बुनता भी है तो सीधी सपाट बुनाई करता है। आपके बुनने वाले ने शानदार काम किया है।”

गुन्नी पांड़े, जो पूरी जिंदगी गांव में रहे हैं, अगर ऐसा कहते हैं तो मचिया की बुनावट वास्तव में उत्कृष्ट मानी जानी चाहिये। यही ध्येय मेरी पत्नीजी का था। इस ‘गझिन, तीन लेयर की बुनावट में’ सामान्य से दुगनी सुतली लगी। पर मचिया मजबूत बनी है।

रामसेवक मचिया बुनते हुये।

कल मचिया का चित्र ट्विटर पर पोस्ट किया तो सबसे पहले मेरी बिटिया वाणी ने कहा कि उसे यह चाहिये। उसे बताया गया कि यह तो रघुनाथ जी के लिये बनी है। अगली बार उसका नम्बर लगेगा।

रघुनाथ जी ने टिप्पणी की कि ऐसी ही मचिया की कल्पना उन्होने की थी – “रस्सी से बुनी हुई।” और उन्हे बेसब्री से इंतजार है मचिया का!

छतीसगढ़ से सुरभि तिवारी का कहना था – “वाव भैया मुझे ये बहुत पसंद है। आप, पास में होते तो मैं अपने लिए भी बनवाने का आग्रह करती।” भारतीय रेलवे के अधिकारी संतोष मिश्र जी ने कहा – “वाह, मजबूत और सुंदर। इस पर बैठ कर कौड़ा तापने का मजा आ जाएगा। मेरे लिए भी ऑर्डर करवा दीजिये।”

अब “ऑर्डर करवाने” का तो कोई विकल्प है ही नहीं। इसको बनाने में हम न केवल फेसिलिटेटर थे, वरन सक्रिय रूप से बनाने में जुटे भी थे। आगे भी अगर बनाना/बनवाना होगा तो मशक्कत हमें ही करनी होगी। :-)

अभी रघुनाथ जी के लिये ये मचिए पैक कर कुरियर करना बाकी है। मौसम बहुत खराब है। कोहरा है और गलन भी। कुरियर करने में तो एक दो दिन लगेंगे। यह रघुनाथ जी को मैंने बताया। रघुनाथ जी का कहना है –

“Gyan ji you (people – my wife included) are facilitators. A very viable and trusted facilitator with offering them (the villagers) e-commerce arrangement. You are An aggregator of different craftsmen from your village who look up to you as patron. For instance, you have brought carpenter, thread seller, weaver, painter and courier together. This carpenter displayed keen interest in creating the frame in no time. The others you aggregated. If these segments get steady traffic on your trust equity, you could create earning opportunity for all of them.”

मैंने कभी इस कोण से सोचा नहीं था, जिसकी बात ऊपर रघुनाथ जी ने की है। मेरे विचार में था कि किसी भी प्रकार का बिजनेस करने या प्रोमोट करने में लोग यही सोचेंगे कि यह बंदा प्रॉफिट कमाने के लिये उद्यम कर रहा है! एक शुद्ध ब्यूरोक्रेट दिमाग में वह सोच जमती नहीं। सरकार अगर पेंशन न दे रही होती तो जरूर इस दिशा में सोच कर अब तक कुछ असफल/सफल प्रयास कर चुका होता। पर जो रघुनाथ जी कह रहे हैं; मैं गांव वालों को जीविका में कुछ वृद्धि करने की सम्भावनायें दे सकता हूं। उस दिशा में मुझे सोचना या प्रयास करना चाहिये।

फिलहाल तो मचिया देख कर आनंदित हो रहे हैं मेरी पत्नीजी और मैं। आशा है चित्र में आपको भी अच्छे लग रहे होंगे, मचिये!


जेठ की तेज बारिश और मठल्लू यादव की मड़ई


परसों और कल तापमान 46 डिग्री तक था। कल तो उमस भी थी और लेटने पर बिस्तर मानो जल रहा था। आधी रात में हवा चली और आज सवेरे पांच बजे जब साइकिल-सैर के लिये तैयार हो रहा था तो हल्की बारिश थी।

चार किलोमीटर बटोही के साथ चलने पर जब अगियाबीर टीले की तलहटी में गंगा तट पर पंहुचा, तब भी यह अन्देशा नहीं था कि इतनी तेज बारिश होगी।

आसमान बादलों से भरा जरूर था, पर लगता था कि तेज पुरवाई बहेगी और उन्हें उड़ा ले जायेगी। पर अचानक हवा का रुख बदला। तेज पुरवाई पछुआ में तब्दील हो गयी। और लाई तेज/घनी बारिश।

अगियाबीर में गंगा किनारे यह दृष्य था। बादल घिरे थे। हवा चंचल थी। यदाकदा बिजली चमक जाती थी।

हम (राजन भाई और मै) ने टीले के खड़ंजे के किनारे साइकिलें खड़ी कर दीं। पेड़ के नीचे खड़े हो गये। तब भी आशा थी कि बारिश रुक जायेगी। वह बढ़ती ही गयी। मुझे अपने से ज्यादा अपने कैमरे और मोबाइल की फिक्र होने लगी। अगर उनमें पानी चला गया और वे खराब हो गये तो 20-25 हजार का चूना लग जायेगा। एक क्षण मैने निर्णय लिया – यह नहीं देखा कि राजन भाई कहां खड़े हैं; बटोही को बबूल के तने के साथ अधलेटा किया; अपना कैमरे/मोबाइल का थैला लिया और टीले पर तेजी से चढ़ गया। सामने एक मड़ई थी। एक औरत उसमें अपना सामान रख रही थी। उसे कहा कि कुछ देर मड़ई में रुकूंगा मैं। चिरौरी वाले अंदाज में कहता तो सम्भावना (भले ही बहुत कम) थी कि वह मना कर देती। अत: लगभग निश्चयात्मक अंदाज में मैने कहा।

मठल्लू की मड़ई।
मठल्लू ने अपने नाती को हमारे बारे में अपनी ओर से बताया – ये लोग अमीर हैं। इन्हे काम करने की जरूरत नहीं। अपने आनन्द के लिये टहल-घूम रहे हैं। मठल्लू के लिये हम अमीर थे (उनके यह कहने में कोई व्यंग नहीं था)।

खैर, उस महिला ने बिना झिझक मुझे आने दिया। मड़ई छोटी थी। दो खाट की जगह। पांच लोग उसमें थे। छठा मैं। किसान (नाम पता चला – मठल्लू यादव) ने अपने लड़के को भेजा, राजन भाई को ढूंढ कर लिवा लाने को। करीब दस-पन्द्रह मिनट हम वहां रुके, जब तक बारिश तेज रही।

मठल्लू मेरी उम्र के निकले। मैने बताया कि रेलवे में नौकरी करता था मैं और रिटायर हो कर गंगा किनारे गांव-देस देख रहा हूं। राजन भाई ने भी बताया कि वे कालीन के एक्स्पोर्ट का काम करते थे।

मठल्लू ने अपने नाती को हमारे बारे में अपनी ओर से बताया – मठल्लू ने अपने नाती को हमारे बारे में अपनी ओर से बताया – ए पचे अमीर हयें। एनके काम करई क जरूरत नाहीं बा। मजे के लिये घूमत-टहरत हयें (ये लोग अमीर हैं। इन्हे काम करने की जरूरत नहीं। अपने आनन्द के लिये टहल-घूम रहे हैं।)

मठल्लू यादव और छबीले। मड़ई के अन्दर।

मठल्लू के लिये हम अमीर थे (उनके यह कहने में कोई व्यंग नहीं था)। हमारे लिये टाटा-बिड़ला-अम्बानी-अडानी अमीर हैं। दूसरे, यह भी नहीं है कि अमीर को काम नहीं करना पड़ता। इन अमीरों को दिन में 10-12 घण्टे काम तो करना ही पड़ता है। रतन टाटा तो पचहत्तर के होने पर भी रोज साइरस मिस्त्री से तलवार भांजने को बाध्य हैं! … एक बार मुझे लगा कि मैं मठल्लू का प्रतिवाद करूं। कहूं कि चालीस साल बहुत खटा हूं काम करते करते। अब भी पढना-लिखना अगर काम हो तो दिन में 5 घण्टे तो कर ही रहा हूं। पर कुछ सोच चुप रह गया। इस मड़ई में बैठे किसान से क्या प्रतिवाद करूं? न वे मेरा काम समझ सकते हैं, न मैं उनका।

पढ़ने की आवश्यकता पर उन्होने एक बात कही। “आपके बड़ी जातियों में आज से चालीस साल पहले लड़के इस लिये पढ़ाये जाते थे कि बिना पढ़े उनकी शादी नहीं हो सकती थी। अब लड़कियां इसलिये पढ़ाई जाती हैं कि बिना पढ़े उनकी शादी नहीं हो सकती।”

मठल्लू का नाती था छबीले। दर्जा सात में पढ़ता है गडौली के सरकारी स्कूल में। बहुत बढ़िया नहीं है पढ़ने में। उसका फोटो खींचा मैने तो वह तन गया। मैने कहा – जरा हंस कर फोटो खिंचाओ। सो दूसरी बार खींचा। फोटो खींचते ही उसे देखने की जिज्ञासा हुई। सो दिखाये भी।

प्रीति, मठल्लू की नातिन। तीसरी कक्षा में पढ़ती है। घर का काम भी करती है।

नातिन थी प्रीति। तीसरी क्लास में पढ़ती है। मठल्लू ने बताया कि पठने में ठीक ही है। वर्ना उसे घर का काम करना होता है।

पढ़ने की आवश्यकता पर उन्होने एक बात कही। पढ़ने की आवश्यकता पर उन्होने एक बात कही। “आपके बड़ी जातियों में आज से चालीस साल पहले लड़के इस लिये पढ़ाये जाते थे कि बिना पढ़े उनकी शादी नहीं हो सकती थी। अब लड़कियां इसलिये पढ़ाई जाती हैं कि बिना पढ़े उनकी शादी नहीं हो सकती।”

गांव के परिवेश के लिये यह मुझे बहुत गूढ़ वक्तव्य लगा। शिक्षा का मूल ध्येय रोजगार या जागरूकता नहीं, शादी हो या न हो पाना है!

हम अमीर शायद नहीं हैं; पर मठल्लू गरीब हैं। थोड़ी खेती है और कुछ गोरू। अरहर होती है इस टीले पर। इसलिये कि टीले पर बारिश का पानी रुकता नहीं। सब्जी नहीं उगाते वे। मैने पूछा – मक्का नहीं उगाते? “नहीं। नीलगाय मक्का बरबाद कर देती है। इसके अलावा साही भी हैं। वे पहले पेड़ को खोद कर तोड़ देते हैं, उसके बाद मक्का के नरम दाने खा जाते हैं। टीले पर सियार भी हैं। दिन में भी घूमते हैं। मक्के को बरबाद करना उन्हे भी पसन्द है।”

एक लड़का बम्बई गया है रोजगार के लिये; मठल्लू ने बताया।

पानी का बरसना कुछ कम हुआ था। हमने रिस्क लिया निकल चलने का। मठल्लू के लडके/नाती लोग – कुलदीप और छबीले पेड़ के नीचे लिटाई हमारी साइकलें ले आये। कुलदीप ने हमें सहारा दिया ताकि गीली मिट्टी में बिना फिसले टीले की ढलान उतर सकें। हमने उन सब का धन्यवाद किया और मैने दोनो से हाथ मिलाया। उनका घर ऐसी जगह पर है कि नदी किनारे जाते समय उनके घर पर कभी न कभी रुकूंगा जरूर।

लौटते समय मैं सोच रहा था – चालीस साल इस तरह के अनुभव कभी नहीं हुये। सवेरे साइकिल भ्रमण। बारिश में फंसना। मड़ई में शरण और एक किसान से इस तरह मुलाकात/बातचीत! कितने अफसर यह अनुभव ले पाते होंगे? नौकरी में या उसके बाद।

लौटते समय मठल्लू यादव जी की मड़ई को एक बार फिर निहार कर देखा मैने।

यह फेसबुक नोट्स से ब्लॉग पर सहेजी पोस्ट है। फेसबुक ने अपने नोट्स को फेज आउट कर दिया, इसलिये पोस्ट्स वहां से हटा कर यहांं रखनी पड़ीं। नोट्स में यह पोस्ट जून 2017 की है।


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