दस दिवसीय दाह संस्कार क्वारेण्टाइन – शोक, परंपरा और रूढ़ियां



पिताजी का देहांत 11 अक्टूबर को हुआ था. अगले दिन रसूलाबाद, प्रयाग में दाह संस्कार. उसी दिन से यहां शिव कुटी में घण्ट स्थापना की. सुबह शाम वहां जल देने और दीपक जलाने का कर्म कर रहा हूं मैं.

शिव कुटी में गंगा किनारे इस पीपल पर बंधे घण्ट में जल देने और दीपक जलाने का नित्य कर्म कर रहा हूं मैं.

शोक है. रीति पालन की भावना भी है; पर कर्म कांड का रूढ़ निर्वहन नहीं हो रहा.

Continue reading “दस दिवसीय दाह संस्कार क्वारेण्टाइन – शोक, परंपरा और रूढ़ियां”

नंदू नाऊ का मोनोलॉग



नंदू नाऊ मुझे तरह तरह की सूचना और जानकारी देता है सवेरे और शाम की घण्ट यात्रा के दौरान. बताता है कि ज्ञान बालू वाले के पास उसका घर है. पंद्रह साल से घाट और घण्ट के दाह/श्राद्ध का नाऊ का काम कर रहा है. इतने समय में करीब 1500 दाह और घण्ट के अनुष्ठान करवा चुका है. अभी तो मरने का सीजन नहीं है. बरसात और उसके आसपास के मौसम में मौतें कम ही होती हैं. तेज सर्दी और गर्मी में उम्रदराज लोग ज्यादा जाते हैं. उस समय नंदू को कभी कभी दम मारने को फुर्सत नहीं होती.

रसूलाबाद श्मशान घाट. नंदू यहां दाह कर्म में सहायता करता है.

जब उम्र गुजार कर कोई जाता है तो परिवार को भले ही कष्ट होता है, पर वह इतना अखरता नहीं. पर जब बच्चा या जवान खत्म होता है तो मन छटपटाता है. कभी कभी एक सप्ताह शादी को हुआ और नौजवान चला गया. और कभी तो छोटे बच्चे जिसका जनेऊ हो जाने के कारण श्राद्ध कर्म करना होता है, का क्रिया कर्म भी कराया नंदू ने. वह तकलीफ देह था.

Continue reading “नंदू नाऊ का मोनोलॉग”

श्री कृष्ण अवतार पाण्डेय


कल मेरे पट्टीदार श्री कृष्ण अवतार पाण्डेय जी आए. पिताजी से पांच साल छोटे. पिताजी के देहावसान पर मुझे सांत्वना देना मुख्य ध्येय था उनके आने का.

अस्सी पार हैं वे. शिक्षा विभाग में राजपत्रित अधिकारी रह चुके थे और बहुत प्रखर आदर्शवादी थे/हैं.

पिताजी के लिए उन्होंने कहा कि वे उनके रोल मॉडल थे. उस समय प्रथम श्रेणी के इंटर पास किए थे. बताया कि उनके (मेरे पिताजी के) बारे में उस समय गांव देस के माँ बाप कहते थे – उनके जैसा बनो.

पर मेरे लिए तो कृष्ण अवतार जी रोल मॉडल हैं. धारा प्रवाह सुसंस्कृत अवधी. अनेक विषयों पर कमांड और पुस्तकों का लेखन. बुढ़ापे को सम्मानजनक रुप से काटने के लिए सजग और देश काल पर सूक्ष्म अवलोकन वाली दृष्टि. मुझे लगता है कि इस अवस्था में भी वे घोर पढ़ने वाले होंगे. वे कह रहे थे कि पठन सामग्री का तो विस्फोट है आजकल. जितना पढ़ो उससे कई गुना इन्टरनेट और सोशल मीडिया थमा देता है.

कृष्ण अवतार पाण्डेय जी

उनका अंश मात्र भी बन पाया तो सौभाग्य होगा मेरा.

गांव के बारे में बताने लगे – उस जमाने में दो तीन लोग कलकत्ता गए थे और एक बम्बई. अब तो अनेक बाहर हैं. अनेक शहरों में. देस में और परदेश में भी. भांति भांति की नौकरी कर रहे हैं बाहर जा कर नौजवान. देहात में बूढ़े और पुरनियां भर बचे हैं. गांव में अब भूत चुड़ैल भी कम हो गई हैं. उनको देखने और गढ़ने वाले भी अब उतने नहीं रह गए.

करीब घंटा भर रहे वे मेरे यहां और उनके जाने के बाद मुझे लगा कि धारा प्रवाह अवधी में बोल बतियाने का संक्रमण दे गए मुझे.

प्रेरणास्पद व्यक्तित्व! 🙏


Design a site like this with WordPress.com
Get started