नंदू नाऊ के साथ घण्ट अनुष्ठान



वाचाल है नंदन (नंदू) नाऊ. थोड़े हल्के बाभन पंडित को, जो नौसिखिया हों, दबेड़ लेता है. पिताजी के दाह संस्कार के अवसर पर मेरे नाऊ का धर्म कर्म उसी ने किया था.

नंदू नाऊ

शिवकुटी में गंगा किनारे एक पार्क टाइप जगह है, जहां दो पीपल के वृक्ष हैं. वहीं पर दस दिन के श्राद्ध कार्यक्रम का घण्ट बंधता है. नंदन मुझे रोज सवेरे शाम वहां ले जाता है. सवेरे घंट में जल भरने के लिए और शाम के समय दीपक जलाने के लिए. वह सब मैं अकेले भी कर सकता हूं, पर नाऊ की उपस्थिति आवश्यक मानी जाती है.

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धनी कैसे व्यवहार करते हैं



रिच डैड, पूअर डैड नामक पुस्तक ने धनी व्यक्तियों के जीवन और उनके मैनरिज्म हम मध्यवर्गीय लोगों की कल्पना में अधिक स्पष्टता के साथ ला दिये हैं। इसके साथ जब भी किसी धनी व्यक्ति को हम देखते हैं; विशेषत: धनी और सेल्फ मेड व्यक्ति; तो उसको बड़ी सूक्ष्मता से देखने का प्रयास करते हैं। … कम से कम मैं तो करता ही हूं।

सूर्या ट्रॉमा सेण्टर और अस्पताल की फार्मेसी में काउण्टर पर बैठे सूर्यमणि जी

पिछले दिनों दो ऐसे व्यक्तियों से मिलना हुआ। एक तो श्री सूर्यमणि तिवारी हैं। उनके बारे में विगत एक महीने में ब्लॉग पर कई बार लिखा भी है मैने। दूसरे मेरे समधी श्री रवीन्द्र कुमार पाण्डेय जी हैं। पाण्डेय जी पांच बार लोक सभा सदस्य रह चुके हैं। इस बार वे खड़े नहीं हुये (क्षेत्रीय दल के साथ सीट समझौते के कारण पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया)। पर उनके व्यवसायिक और राजनैतिक समीकरण अभी भी पहले की तरह जीवन्त हैं। राजनैतिक परिदृष्य पर उन्हें स्पेण्ट-फोर्स मानने की भूल तो पार्टी (भाजपा) नहीं ही कर सकती। शायद वह उन्हें किसी और प्रकार से झारखण्ड के पोलिटिकल सीन में इस्तेमाल करने पर सोच रही है।

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अतिवृष्टि और गांव की क्राइसिस



आज अस्पताल से एक घंटे के लिए अपने घर जा कर आया. गांव में रहता हूं और अतिवृष्टि के कारण गांव बड़ी विपत्ति में है. फसलें (धान के अलावा) नष्ट हो गई हैं. रास्ता झील बन गया है. नयी रेल पटरी के फार्मेशन के ऊपर से घर पंहुचा. और बारिश हुई तो यह लिंक भी कट जाएगा.

पानी बरसना रुक ही नहीं रहा. रास्ते बंद हो गए हैं और गांव कट गए हैं. चित्र पुराना है. पर आज सप्ताह भर बाद हालत और भी खराब हुई है.

गांव में आधा दर्जन लोग प्रधानी का चुनाव लड़ने का ताल ठोंक रहे हैं. आए दिन लोगों को दाल बाटी खिलाते हैं. पर इस क्राइसिस के अवसर पर उनकी आवाज सुनने में नहीं आती. रास्ता खोलने के लिए कोई युक्ति, कोई पहल लेने वाला नहीं है.

आधी शताब्दी पहले गांव वाले खुद खड़े होते थे. कहीं मिट्टी काट कर पानी के लिए रास्ता बनाते थे और कहीं मिट्टी पत्थर अड़ा कर बंधा बना पानी रोकते थे. उपमन्यु भारत में ही पैदा हुआ था. पर अब सब सरकार को कोसने का खेल खेलते हैं… और सरकार पहले भी निकम्मी थी, अब भी है.

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