1941 से 2021 – अनिरुद्ध कर्मकार से राजबली विश्वकर्मा

गणदेवता – ताराशंकर बंद्योपाध्याय

“गणदेवता” (सन 1941-46 के बीच लिखा कालजयी उपन्यास। लेखक ताराशंकर बंद्योपाध्याय) के प्रारम्भ में आते हैंं पात्र – अनिरुद्ध कर्मकार लुहार और गिरीश सूत्रधार बढ़ई। पंचग्राम (पांच गांवों का समूह) के गांव वालों के सभी लुहार/बढ़ई के काम ये करते हैं। ये दोनों बेगारी और बिना पैसा दिये काम कराने की गांव की व्यवस्था के खिलाफ उठ खड़े होते हैं। उपन्यास का समय बंगाल और भारत के नवजागरण काल का है। ताराबाबू उपन्यास के हिंदी अनुवाद की भूमिका में लिखते हैं –

बंगाल के ग्राम्य जीवन का जो चित्र इस उपन्यास का आधार है, वह केवल बंगाल का होने के बावजूद भी, उसमें सम्पूर्ण भारत के ग्राम्यजीवन का न्यूनाधिक प्रतिबिम्ब मिलेगा। बंगाल के गांव का खेतिहर-महाजन श्रीहरि घोष, संघर्षरत आदर्शवादी युवक देबू घोष, अथवा जीविकाहीन-भूमिहीन अनिरुद्ध लुहार केवल बंगाल के ही निवासी नहीं हैं। इनमें भारत के उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम – सब दिशाओं के भिन्न भिन्न राज्यों के ग्रामीण मनुष्यों का चेहरा खोजने पर प्रतिबिम्बित मिल जायेगा। बंगाल के श्रीहरि, देबू या अनिरुद्ध ने दूसरे प्रांतों में जा कर सिर्फ नाम ही बदला है, पेशे और चरित्र में वे लोग भिन्न नहीं हैं।

राजबली विश्वकर्मा की लोहा तपाने की भट्ठी। बांयी ओर धौंकनी (bellow) दिख रही है। भट्ठी के सामने कूट (anvil) है।

मैंं मचिया मिशन के संदर्भ में आसपास के लुहार – खाती/बढ़ई लोगों से मिला हूं। द्वारिकापुर के भोला विश्वकर्मा और कटका पड़ाव के राजबली विश्वकर्मा से कई बार मिला हूं। राजबली के साथ उनके घर-कम-वर्कशॉप पर पीढ़ा और कुर्सी पर बैठ कर उनसे बात की है। उनके घर की तीन पीढ़ी से मेरा परिचय है। हर एक के गुणों, बदलावों और बदलते जीवन मूल्यों को मैंने महसूस किया है। मैंने यह भी विश्लेषण करने का यत्न किया है कि भोला विश्वकर्मा ने कई बार चक्कर लगाने और उसके द्वारा मांगी गयी कीमत पर सहमत होने के बावजूद भी क्यों नहीं बनाया मचिया का फ्रेम? लीक से अलग काम करना क्यों नहीं चाहता आम गंवई कारीगर? उसके उलट राजबली ने अपने कहे को निभाया। राजबली की इज्जत, प्रतिष्ठा और जीवन मूल्य क्या हैं?

राजबली का पोता ईश्वरचंद्र मुझे भट्ठी की कार्यविधि समझाते हुये।

समाज में, विशेषकर कारीगर समाज कैसा है और उसके जीवन में क्या परिवर्तन हुये पिछले पचास साठ साल में – वह जानना और दर्ज करना मुझे एक चैलेंज लगता है।

गणदेवता को तो ज्ञानपीठ पुरस्कार ही मिला। मेरे ख्याल से उससे कई कमतर पुस्तकों को नोबेल मिल चुका है। मैं उस पुस्तक जैसे किसी दस्तावेज सृजन का स्वप्न तो नहीं देखता; पर अपने जीवन की दूसरी पारी में गांव में रहने के कारण यह तो मन में है कि पचास साल से हुये ग्रामीण बदलाव को महसूस किया जाये और लेखन में (भले ही ब्लॉग पर ही हो) दर्ज किया जाये।

भट्ठी पर गलीचा बुनकर के औजार को तपाते और धार देते राजबली।

राजबली का जीवन बंगाल के अनिरुद्ध कर्मकार जैसा तो नहीं दिखता। उनके बेटे शिवकुमार ने बताया कि उनके घर में अभाव जैसा कुछ नहीं था। औराई से गडौली तक पांच-छ कोस के इलाके में सारी खेती किसानी उन्ही के द्वारा बनाये गये औजारों-हलों पर निर्भर थी। लोगों के पास पैसे नहीं होते थे और पैसे की बजाय बनी-मजूरी का प्रचलन था। उनके घर में इतना अनाज आता था कि मौसम से इतर उसे खरीदने वाले भीड़ लगाये रहते थे। यह सब उनकी कारीगरी के बल पर ही था। अब भी काम मिलने की समस्या नहीं है। हुनर के लिये ग्राहक हैं ही। यह जरूर है कि समय के साथ काम का स्वरूप/प्रकार बदला है। पहले जिन चीजों की जरूरत होती थी, आज उनकी मांग नहीं है।

शिवकुमार जो बता रहे थे, वह मेरी सामान्य सोच और “गणदेवता” में पढ़े बदलते समय के द्वंद्व से अलग, एक खुशनुमा रोमाण्टिक कथा जैसा लगा। किसी बदलते समय की क्राइसिस जैसा नहीं। क्या ऐसा है? क्या ऐसा इसलिये है कि राजबली ने अपने और अपने परिवार के लिये नैतिक चरित्र के प्रतिमान बना दिये हैं और उनका पालन करते हैं? क्या ऐसा अगर वास्तव में है तो वह इसलिये कि उनके परिवार की जरूरतें संयमित थीं/हैं? या सामान्यत: कारीगर वर्ग दलित या खेत मजदूरों की अपेक्षा हमेशा बेहतर रहा और उसे अपने हाथ के हुनर के बल पर कभी आर्थिक समस्या नहीं आयी?

मेरे घर पर शिवकुमार अपने पिताजी (राजबली) के बारे में बताते हुये।

मैं शिवकुमार से कहता हूं कि उनके पिताजी के पास मुझे फुर्सत में समय गुजार कर उनके जीवन की गाथा सुननी और नोट करनी है। कुछ दिनों में मौसम सुधरे तो यह किया जाना है। शिवकुमार ने बताया कि राजबली सवेरे तीन बजे उठ कर शौच-स्नान-पूजा-पाठ में समय व्यतीत करते हैं। उनहत्तर साल के हो गये हैं पर दिनचर्या के नियम पूरी कड़ाई से पालन करते हैं। अपनी जिंदगी अपने उसूलों के अनुसार चलाते हैं और उसमें किसी की दखल नहीं होती! शिवकुमार अपने पिता के बारे में जो भी बताये, उसके अनुसार राजबली के पास फुर्सत के समय में मिलने की इच्छा बलवती हो गयी है। अभी तो जब भी उनसे मिला हूं, वे काम में लगे मिले हैं। कभी खड़ाऊं बनाते, कभी भट्टी पर लुहार का काम करते पाया है।

‘गणदेवता’ के अनिरुद्ध कर्मकार के समांतर राजबली विश्वकर्मा को रख कर तुलना करना रोचक होगा। उन दोनो का जीवन अब तक ज्ञात जानकारी के अनुसार बहुत अलग नजर आता है।

देखें; राजबली से विस्तृत मुलाकात कब होती है!


Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring village life. Past - managed train operations of IRlys in various senior posts. Spent idle time at River Ganges. Now reverse migrated to a village Vikrampur (Katka), Bhadohi, UP. Blog: https://gyandutt.com/ Facebook, Instagram and Twitter IDs: gyandutt Facebook Page: gyanfb

2 thoughts on “1941 से 2021 – अनिरुद्ध कर्मकार से राजबली विश्वकर्मा

  1. गणदेवता पर शायद DD पर.एक धारावाहिक भी आया था।
    गणदेवता पढ़ने की ईच्छा बलवती हुई।
    जानकर अच्छा लगाकि गंगा दोआब के करीगर बदल रहे हैं मगर बगैर क्राइसिस के।

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