स्वास्थ्य समस्याओं में मक्का (मकई) से निदान



55 यह श्री पंकज अवधिया, वनस्पति और कृषि शास्त्री की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट है। आज वे सामान्य तौर पर सुलभता से पायी जाने वाली वनस्पति – मक्का के स्वास्थ्य सम्बन्धी प्रयोगों पर चर्चा कर रहे हैं। मेरे ब्लॉग पर उनके पिछले लेख आप पंकज अवधिया लेबल पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

आप उनका हिन्दी में लेखन उनके ब्लॉग मेरी कविता और हमारा पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान पर पढ़ भी पढ़ सकते हैं। दूसरे ब्लॉग पर तो आपको विभिन्न चिकित्सकीय विषयों पर उनके लेखों के ढ़ेरों लिंक मिलेंगे।   


प्रश्न: मै अमेरिका मे रहता हूँ और यहाँ आपकी पोस्ट पर बतायी वनस्पतियाँ नही मिलती हैं। मै शराब पीने का आदी हूँ और लीवर व फेफडे की समस्याओ के अलावा पाइल्स और दूसरी समस्याएं भी है। कुछ उपयोगी जानकारी यदि आपके पास हो तो बतायें।

उत्तर: चूँकि मैने भारतीय वनस्पतियो पर शोध किया है अत: इन्ही से सम्बन्धित जानकारियाँ ही आपको दे सकता हूँ। मै साधारण प्रयोगों पर लिखना पसन्द करता हूँ। जटिल रोगों के लिये आप विशेषज्ञ से परामर्श ले तो अच्छा होगा। कुछ वर्षो पहले एक विदेशी वनस्पति विशेषज्ञ से मक्के के विषय मे रोचक जानकारियाँ प्राप्त हुई थी। मक्का तो आपके देश मे आसानी से मिलता है। अत: आप चाहें तो इस ज्ञान का लाभ उठा सकते है।corn_on_the_cob

जैसे श्वांस सम्बन्धी रोगो के लिये हम केले की पत्तियो की राख का प्रयोग करते है वैसे ही मक्के का प्रयोग होता है। इसके काँब (भुट्टे) के बीच के भाग को जलाकर राख एकत्र कर ली जाती है। फिर इस राख मे काला नमक मिलाकर चाटा जाता है। इससे खाँसी विशेषकर कुक्कुर खाँसी मे बड़ी राहत मिलती है। हमारे देश मे केला की पत्तियो की राख का प्रयोग इस तरह से होता है।

मक्के के छोटे पौधे को एकत्रकर इसे पानी मे उबालकर काढ़ा तैयार कर लिया जाता है। फिर इस काढ़े को टब मे भरकर उसमे बैठने से बवासिर (पाइल्स) के दर्द में लाभ पहुँचता है। इसका अधिक समय तक प्रयोग बवासिर को ठीक भी करता है।

corn_on_the_cob_1 मक्के के बाल (सिल्क) का उपयोग पथरी रोगों की चिकित्सा मे होता है। पथरी से बचाव के लिये रात भर सिल्क को पानी मे भिगोकर सुबह सिल्क हटाकर पानी पीने से लाभ होता है। पथरी के उपचार मे सिल्क को पानी में उबालकर बनाये गये काढ़े का प्रयोग होता है।

जैसा आपने बताया कि आपको लीवर से सम्बन्धित समस्या है। यदि आप गेहूँ के आटे का उपयोग करते हैं तो उसके स्थान पर मक्के के आटे का प्रयोग करें। यह लीवर के लिये अधिक लाभकारी है।

भारत मे शहरों मे जैविक खेती से तैयार मक्का नही मिलती है पर इन प्रयोगों के लिये आप जैविक मक्के का प्रयोग करें तो अधिक लाभ होगा।

उन विदेशी विशेषज्ञ नें यह भी बताया कि किसी बडे फोड़े को बिठाने के लिये मक्के की जड़ के पास से एकत्र की गयी मिट्टी का प्रयोग किया जाता है। हमारे देश मे पीपल के पास से एकत्र की गयी मिट्टी का इस तरह बाहरी प्रयोग होता है।

इस उत्तर को पढ़ रहे पाठक अब जब भी भुने हुये भुट्टे खायें तो पहले दानो को खाकर बचे हिस्से को फेकें नही बल्कि उसे बीच से दो टुकडो मे तोड़ लें और फिर अंदर वाले भाग को सूंघे। विदेशी विशेषज्ञ के अनुसार इससे दाने जल्दी से पच जाते हैं। फिर उन टुकडो को जलाकर राख जमा कर लें और आवश्यकतानुसार श्वांस रोगों मे प्रयोग करें।

वनस्पतियो से सम्बन्धित तरह-तरह के सरल प्रयोग मुझे अचरज मे डाल देते हैं। मै गौरवांवित महसूस करता हूँ मानव के अपार ज्ञान के विषय मे जानकर। आप क्या कहते हैं?

पंकज अवधिया

© लेख पंकज अवधिया के स्वत्वाधिकार में। चित्र wpclipart से लिये गये हैं।


Tata car बिजनेस वीक के इस लेख और उसमें छपे इस चित्र का अवलोकन करें। यह सज्जन शीघ्र ही कार में अपग्रेड करेंगे अपनी मोटर साइकल को! »

लेख में कहा गया है कि टाटा मोटर्स एक नयी डिस्ट्रीब्यूशन स्ट्रेटेजी से कार की कीमत कम करेगी। कम्पनी डीलरों को किट सप्लाई करेगी और असेम्बली डीलरों के स्तर पर होने से कीमत कम होगी। अर्थात टाटा की कार फेक्टरी में नहीं, वर्कशॉपों में बनेगी। है न नया फण्डा!   


जोड़ों के दर्द में लाभप्रद वनस्पतीय प्रयोग



55 यह श्री पंकज अवधिया, वनस्पति और कृषि शास्त्री की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट है। आप उनका हिन्दी में लेखन उनके ब्लॉग मेरी कविता और हमारा पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान पर पढ़ सकते हैं। आज वे जोड़ों के दर्द पर वनस्पतीय प्रयोग की चर्चा कर रहे हैं। मेरे ब्लॉग पर उनके लेख आप पंकज अवधिया लेबल पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।  


प्रश्न: जोड़ों के दर्द से परेशान हूँ। कई उपाय किये पर सफलता कम ही मिली। ऐसी वनस्पति सुझायें जिसे कि भोजन के रूप मे या भोजन के साथ प्रयोग किया जा सके।

उत्तर: आपके प्रश्न के लिये धन्यवाद। हमारी पारम्परिक चिकित्सा प्रणालियो मे जोड़ों के दर्द के लिये बहुत सी वनस्पतियाँ सुझायी गयी है। पर इन सब का प्रयोग उतना आसान नही है जितना कि लगता है। यही कारण है कि जब हम अपने मर्जी या अकुशल विशेषज्ञ के मार्गदर्शन मे इनका प्रयोग करते है तो सफलता नही मिलती है। फिर हमारे मन की चंचलता भी प्रेरित करती है कि हम जल्दी-जल्दी दवा बदलें। किसी भी दवा के प्रयोग मे जल्दी का रवैया नुकसान दायक हो सकता है।

Hadjod1 आपने तो सुना ही होगा कि वनस्पतियाँ बोलती हैं। जी, आपने बिल्कुल सही पढ़ा। वनस्पतियाँ बोलती हैं और स्वयम बताती हैं कि वे किस रोग मे उपयोगी हैं। वनस्पतियाँ विशेष लोगो से नही बोलती हैं। सभी उनको सुन सकते हैं यदि सुनना चाहें तो। हड़जोड़ नामक वनस्पति भी बोलती है। आप पोस्ट पर प्रस्तुत दोनो चित्र देखे। इसके माँसल तने आपको मानव अस्थि की तरह दिखेंगे। यह वनस्पति इन माँसल तनों के माध्यम से यह बताती है कि अस्थि और जोड़ सम्बन्धी रोगो में इसकी उपयोगिता है। Hadjod2 रोग की जटिल अवस्था में इसके प्रयोग के लिये विशेषज्ञ की सलाह चाहिये पर आरम्भिक अवस्था मे इसके साधारण प्रयोग से जोड़ों के दर्द से न केवल मुक्ति पायी जा सकती है बल्कि इससे बचा भी जा सकता है। प्रयोग आसान है।

आप सब ने चावल से बना चीला तो खाया ही होगा। देश के अलग-अलग हिस्सो मे अलग-अलग प्रकार का चीला बनता है। आपको किसी भी प्रकार के चीले को बनाते समय इसके तने की दो सन्धियो के बीच के आधे भाग को कुचलकर घोल मे मिला लेना है और फिर यह विशेष चीला बनाकर खाना है। चलिये यदि आपके लिये चीला नया शब्द है तो इसके टुकडो को सूजी (रवे) या आटे के हलवे मे मिला कर उपयोग कर ले। सप्ताह मे छुट्टी के दिन एक बार इसे खायें। यह निश्चित ही लाभ करेगा। रोज या दिन मे कई बार मन से खाने का प्रयोग न करें।

देश के वे पारम्परिक चिकित्सक जो कि टूटी हड्डियो को जोड़ने मे माहिर हैं वे अन्य वनस्पतियों के साथ इसका बाहरी प्रयोग करते हैं। आधुनिक अनुसन्धान बताते हैं कि इसमे कैल्शियम की मात्रा अधिक होती है। पर इसके अलावा भी इसमें बहुत कुछ ऐसा होता है जिसके बारे मे आधुनिक विज्ञान जानने की कोशिश कर रहा है। हाल ही मे इसके एक अनोखे ग़ुण के आधार पर एक अमेरीकी पेटेण्ट सामने आया है। विशेषज्ञों ने पाया है कि यदि आप मनमर्जी वसा (फैट) खाने के बाद इसके विशेष तत्व को खा लें तो वसा शरीर मे रूके बिना मल के साथ बाहर निकल जाता है। यह तो मोटे और पेटू लोगों के लिये वरदान से कम नही है। भारत के पारम्परिक चिकित्सक इस बात को पहले से जानते थे पर जब हमारे देश में उनकी ही कद्र नही है तो उनके ज्ञान की कद्र कौन करेगा? नतीजा यह कि अब हमारे ज्ञान के लिये हमे पैसे खर्चने होंगे।

आप इस वनस्पति को आसानी से बागीचे मे लगा सकते हैं। मैने अपने घर मे आम के पेड के सहारे इसे लगाया है। यह प्रश्न का उत्तर लम्बा होता जा रहा है। पर कुछ दिनो पहले हड़जोड़ पर मैने लगातार आठ घंटे का व्याख्यान दिया। आप इससे अन्दाज लगा ही सकते है इसके विषय मे हमारे देश मे उपलब्ध समृध्द ज्ञान का।

हड़जोड़ विषयक इकोपोर्ट पर मेरे लेख आप इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

पंकज अवधिया

© इस पोस्ट के लेख और चित्रों पर कॉपीराइट पंकज अवधिया का है।


1. पंकज अवधिया जी की फोटो और नाम उनके द्वारा दिये हड़जोड़ के चित्रों पर बतौर वाटर मार्क लगाये हैं। फ्री ऑफलाइन जुगाड़मेण्ट है यह सॉफ्टवेयर। इण्टरनेट से डाउनलोड किया हुआ। आपको मालूम है यह जुगाड़?!Wave Vivek Sahai

2.  श्री विवेक सहाय, उत्तर-मध्य रेलवे के नये महाप्रबंधक आज सवेरे इलाहाबाद पंहुच जायेंगे। मैने पिछले कई दिनों से सनसनी देखी है – उत्तर-मध्य रेलवे के अधिकारियों के बीच। श्री सहाय से इण्टरेक्शन की प्रक्रिया, जो आज प्रारम्भ होगी, स्पष्ट करेगी कि लोग अपनी बेल्ट कितनी कसेंगे। कसेंगे जरूर। पिछले नवम्बर माह में वे इलाहाबाद आये थे तो उतरते ही पॉवर केबिन के निरीक्षण को बड़ी तेजी से चल कर गये थे। उस समय कुछ अधिकारी उनके साथ कदम मिलाने में अपनी सांस फुला बैठे थे! 


रक्त की शुद्धता के लिये ग्वार पाठा (एलो वेरा)



यह श्री पंकज अवधिया की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट है। श्री अवधिया वनस्पति जगत के औषधीय गुणों से सम्बंधित एक पोस्ट मेरे ब्लॉग के लिये लिख कर मेरे ब्लॉग को एक महत्वपूर्ण आयाम दे रहे हैं। आप यह एलो वेरा (ग्वार-पाठा) के गुणों से सम्बंधित पोस्ट पढ़ें:


प्रश्न: आप तो जानते ही है कि रक्त की अशुद्धि को ज्यादातर रोगो की जड़ माना जाता है। इसके लिये रोग होने पर विशेष दवा लेने की बजाय यदि ऐसा कुछ उपाय मिल जाये जिसे अपनाने से साल-दर-साल शुद्धता बनी रहे और रोगों से बचाव होता रहे।
उत्तर: यह तो आप सही कह रहे हैं कि रक्त की अशुद्धता ज्यादातर रोगो के लिये उत्तरदायी है। आज का हमारा रहन-सहन और खान-पान कई तरह के दोषों को उत्पन्न कर रहा है और हम चाह कर भी इससे नहीं बच पा रहे हैं। मै एक सरल पर प्रभावी उपाय बता रहा हूँ। यदि बन पडे़ तो इसे अपनायें और लाभांवित हों।

Pankaj Oudhiyaश्री पंकज अवधिया

आप लोकप्रिय वनस्पति ग्वार पाठा को तो जानते ही होंगे। इसे घीक्वाँर भी कहा जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम एलो वेरा है। वही एलो वेरा जिसका नाम प्रसाधन सामग्रियों के विज्ञापन मे आप रोज सुनते हैं। सम्भव हो तो अपने बगीचे मे आठ-दस पौधे लगा लें। प्रयोग के लिये पत्तियों के ताजे गूदे की आवश्यकता है।
ताजा गूदा लेकर उसे जमीन पर रख दें फिर उसे नंगे पाँव कुचलें। कुचलना तब तक जारी रखें जब तक कि आपका मुँह कड़वाहट से न भर जाये। पैरो से कुचलने पर भला मुँह कड़वाहट से कैसे भरेगा? प्रश्न जायज है पर जब यह करेंगे तो आपको यकीन हो जायेगा। शुरू के दिनो में 15-20 मिनट लगेंगे फिर 2-3 मिनट मे ही कड़वाहट का अहसास होने लगेगा। जैसे ही यह अहसास हो आप एक ग्लास कुनकुना पानी पी लीजिये। पाँच मिनट बाद एक चम्मच हल्दी कुनकुने पानी के साथ फाँक लीजिये। ऐसा आपको सप्ताह मे एक बार करना है। ऐसा आप लम्बे समय तक कर सकते हैं। आप नयी स्फूर्ति का अनुभव तो उसी समय से करेंगे पर दो-तीन बार इसे करने से आपको गहरा असर दिखने लगेगा।

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एलो वेरा के चित्र  
यह त्वचा के मलहम में बहुतायत से प्रयोग किया जाता है – त्वचा के दर्द, जख्म और जलन में लाभ प्रद है। यह सौन्दर्य प्रसाधनों और अन्य कई औषधियों में इस्तेमाल होता है।  
यह औषधि सूखे और कम जलीय स्थानों पर सरलता से पनपती है।

एलो का इस तरह प्रयोग अलग-अलग तरीकों से भी होता है। श्वेत कुष्ठ (ल्यूकोडर्मा) से प्रभावित रोगियों को तो दवाओ के आँतरिक सेवन के साथ इसे दिन मे दो से तीन बार करने को कहा जाता है।
एलो की तरह ही 600 से अधिक वनौषधीयों का प्रयोग इस अनोखे ढंग से होता है। एलो के पौधे आसानी से मिल जाते है। वैसे देश के बहुत से भागों में यह माना जाता है कि इसे घर मे लगाने से पारिवारिक क्लेश बढ़ जाता है। यदि इस विश्वास का वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाय तो कंटीले होने के कारण सम्भवत: बच्चों को हानि पहुँचने के भय से इसे न लगाने की सलाह दी गयी होगी। यह भी देखा गया है कि गर्मी के दिनो मे ठंडक की तलाश मे साँप जैसे जीव इनके पास आ जाते हैं। इसलिये भी शायद इसे घर मे न लगाने की बात कही गयी होगी। मैं तो यही सलाह देता हूँ कि इसे पड़ोसी की दीवार के पास लगाये ताकि झगड़ा हो भी तो उधर ही हो।Smile
एलो की बहुत अधिक देखभाल न करें। पानी तो कम ही डालें। जंगल मे वनस्पतियाँ बिना देखभाल के उगती हैं, और फिर भी दिव्य गुणों से युक्त होती है। जब मनुष्य खूब देखभाल कर इसे खेतों या बागीचो मे लगाता है तो वैसे गुण नही मिल पाते हैं। आधुनिक अनुसन्धानो से भी यह पता चल चुका है कि ‘स्ट्रेस’ दिव्य औषधीय गुणो के लिये जरूरी है। यही कारण है कि बहुत सी औषधीय फसलो की खेती मे कुछ समय तक सिंचाई रोक दी जाती है।
एलो वेरा पर मेरा ईकोपोर्ट पर लेख यहां देखें।
पंकज अवधिया


पंकज जी की अतिथि पोस्ट के चित्र के लिये पड़ोस से ग्वार पाठा का गमला १० मिनट के लिये मंगवाया गया। भरतलाल भूत की पोस्ट से जोश में हैं। लाते समय पूरी गली को एनाउंस करते आये कि इस गमले का फोटो कम्प्यूटर में लगेगा और दुनियां में दिखेगा।
मेरे पर-बाबा पं. आदित्यप्रसाद पाण्डेय आयुर्वेदाचार्य थे और अपनी औषधियां सामान्यत: स्वयम बनाते थे। वे घीक्वांर(ग्वारपाठा) से औषधि बनाया करते थे। 


दांतों की देखभाल – हल्दी के साथ अन्य वनस्पतियां



यह श्री पंकज अवधिया की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट है। पंकज जी ने अठाईस नवम्बर को "दांतों की देखभाल – हल्दी का प्रयोग" नामक पोस्ट इस ब्लॉग पर लिखी थी। वह प्रयोग सरल और प्रभावी होने की बात मेरी पत्नीजी भी करती हैं। वे उस प्रयोग में नियमित हैं। कई अन्य पाठक भी कर रहे होंगे यह उपयोग। उनमें से किसी के प्रश्न पर पंकज जी ने प्रयोग को और प्रभावी बनाने की युक्ति बताई है। आप पढ़ें:   


प्रश्न: हल्दी के उपयोग से जो आपने दाँतो की देखभाल के विषय मे लिखा था उसे पढ़कर हम अपना रहे है और लाभ भी हो रहा है। क्या इसे और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है जैसे दाँतो की सड़न आदि विशेष समस्याओ के लिये? यदि हाँ, तो इस विषय मे बतायें।

उत्तर: आपके प्रश्न के लिये धन्यवाद। यह जानकर असीम संतोष हुआ कि आपको मेरे ज्ञान से लाभ हो रहा है। आमतौर पर पारम्परिक चिकित्सक हल्दी के इस सरल प्रयोग की बात ही कहते हैं। पर विशेष समस्या जैसा कि आपने पूछा है, होने पर वे इसमे नाना प्रकार की वनस्पतियो और उनके सत्व मिलाकर हल्दी के गुणो को बढाने का प्रयास करते हैं। वानस्पतिक सर्वेक्षणो के आधार पर मेरे पास हल्दी के साथ प्रयोग की जाने वाली वनस्पतियो की लम्बी सूची है। इनमे से एक सरल प्रयोग मै प्रस्तुत कर रहा हूँ।

जैसा कि मैने पहली पोस्ट मे लिखा है हल्दी का प्रयोग दाँतो के लिये रात में ही करे। आप एक महीने तक यह प्रयोग करें फिर सात दिनों तक प्रतिदिन हल्दी के साथ विभिन्न पत्तियों का रस मिलाकर प्रयोग करें। पहले दिन आप नीम की ताजी पत्तियाँ ले आयें और फिर रस निकालकर प्रयोग के तुरंत पहले हल्दी मे मिलाकर उसी तरह प्रयोग करें। दूसरे दिन मुनगा (जिसे हम सहजन के नाम से भी जानते हैं) की पत्तियो का ऐसा ही प्रयोग करें। तीसरे दिन आम की, चौथे दिन जामुन की, पाँचवें दिन तुलसी की, छठवें दिन अमरूद की और सातवें दिन फिर नीम की पत्तियों का प्रयोग करें। इस विशेष सप्ताह के बाद फिर एक महीने हल्दी का सरल प्रयोग करें। इस तरह इसे अपने दिनचर्या का नियमित हिस्सा बना लें।

पारम्परिक चिकित्सक यह जानते हैं कि आम लोग विशेषकर शहरी लोग जल्दी से किसी भी उपाय से ऊब जाते हैं और फिर उसे अपनाना छोड देते हैं। यही कारण है कि बदल-बदल कर उसी औषधि को कम और अधिक शक्तिशाली रूप मे प्रयोग करने की सलाह दी जाती है। इन वनस्पतियो के साथ हल्दी के प्रयोग के अपने फायदे तो हैं ही।

Sahnjhan « सहजन (Drumstick) का वृक्ष।

"भले ही यह अटपटा लगे पर मन से वनस्पति को एक बार धन्यवाद अवश्य दे दें।"

 

पिछले दिनो मैने इकोपोर्ट पर एक अंग्रेजी आलेख लिखा कि क्या दाँतो को दोबारा उगाया जा सकता है? ज्ञान जी ने इसे पढा है। छत्तीसगढ के पारम्परिक चिकित्सक इसके लिये जिन वनौषधियों का प्रयोग करते है उनका प्रयोग हल्दी के साथ ही किया जाता है। एक वर्ष या इससे भी अधिक समय तक रोज कई बार हल्दी का प्रयोग अलग-अलग वनौषधियो के साथ किया जाता है। नीम, सहजन, आम, जामुन, अमरूद और तुलसी की पत्तियाँ इसमे सम्मलित हैं। बाकी वनस्पतियों का प्रयोग कुशल पारम्परिक चिकित्सकों के मार्गदर्शन मे होता है। अत: विशेष सप्ताह के दौरान आप इन दिव्य गुणयुक्त वनस्पतियों का प्रयोग कर पायें तो यह सोने मे सुहागा वाली बात होगी।Guava

अमरूद का वृक्ष » 

घबरायें नही; न कर पायें तो हल्दी का साधारण प्रयोग ही जारी रखे। पर यदि आप कर पाये तो इन पत्तियों एकत्रण के समय ये सावधानियाँ बरतें:

  1. पुराने पेड़ों का चुनाव करें।
  2. एक ही डाल से बहुत अधिक पत्तियाँ न तोडे।
  3. ताजे रस का प्रयोग करें। एक बार रस निकालकर फ्रिज मे रखने की भूल कर इस प्रयोग को विकृत न करें।
  4. कीट या रोग से प्रभावित वनस्पति का चुनाव न करें।
  5. पत्तियों के एकत्रण के बाद हल्दी के तनु घोल को उस डाल पर डाल दे जिससे आपने इन्हे एकत्र किया है।
  6. भले ही यह अटपटा लगे पर मन से वनस्पति को एक बार धन्यवाद अवश्य दे दें।

पंकज अवधिया


question_mark_purple स्टैटकाउण्ट को सही माना जाये तो पंकज अवधिया और मेरी इस ब्लॉग मे जुगलबन्दी बहुत जम रही है। उनकी अतिथि पोस्ट होने के बावजूद भी मैं रविवार को एक छुट्टी मार रहा हूं दो बार से। अगर अतिथि पोस्ट दो दिन – बुधवार और रविवार लिखने को अनुरोध किया जाये तो कैसा रहे?!


पर्यावरण के मुद्दे ॥ नीलगाय अभी भी है शहर में



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टेराग्रीन (Terragreen) पत्रिका का नया अंक »

इस वर्ष इण्टरगवर्नमेण्टल पेनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) और अल-गोर को संयुक्त रूप से नोबल शांति पुरस्कार दिये जाने के कारण पर्यावरण का मुद्दा लाइमलाइट में आ गया है।  कल मैने टेराग्रीन (Terragreen) नामक मैगजीन का एक अंक ४० रुपये खर्च कर खरीद लिया। यह पत्रिका श्री आर.के पचौरी सम्पादित करते है। श्री पचौरी आइ.पी.सी.सी.के चेयरपर्सन भी हैं- और उनके संस्थान को नोबल पुरस्कार मिलने पर भारत में निश्चय ही हर्ष का माहौल है। मेरे ख्याल से टेराग्रीन का यह अंक अखबार की दुकान पर इसी माहौल के चलते दिखा भी होगा – यद्यपि यह पत्रिका अपने पांचवे वर्ष के प्रकाशन में है। पत्रिका के दिसम्बर-जनवरी के इस अंक में श्री पचौरी का एक साक्षात्कार भी छपा है।

इस अंक में एक लेख भोजन में एडिटिव्स पर भी है। और वह मुझे काफ़ी क्षुब्ध/व्यथित करता है। जिन तत्वों की बात हो रही है, उनका मैं पर्याप्त प्रयोग करता हूं। यह टेबल उनका विवरण देगी: 

खाद्य पदार्थ रसायन खतरे
अप्राकृतिक स्वीटनर (ईक्वल, सुगर-फ्री) जिनका मैं बहुत प्रयोग करता हूं – कैलोरी कम रखने के चक्कर में। एसपार्टेम फीनाइल्केटोन्यूरिया और मानसिक क्षमता में कमी (Phenylketoneuria and mental retardation)
चिकन बर्गर मोनो सोडियम ग्लूटामेट या अजीनोमोटो अस्थमा, ग्लाकोमा औए डायबिटीज
सॉसेज और फास्ट फ़ूड (नूडल्स आदि) मोनो सोडियम ग्लूटामेट या अजीनोमोटो अस्थमा, ग्लाकोमा औए डायबिटीज
केचप सेलीसिलेट्स (salicylates) जिंक की कमी वाले लोगों में श्रवण शक्ति का क्षरण
जैम सेलीसिलेट्स (salicylates) जिंक की कमी वाले लोगों में श्रवण शक्ति का क्षरण
मिण्ट फ्लेवर्ड च्यूइंग-गम और माउथ फ्रेशनर   सेलीसिलेट्स (salicylates) जिंक की कमी वाले लोगों में श्रवण शक्ति का क्षरण
मुझे तो सबसे ज्यादा फिक्र आर्टीफीशियल स्वीटनर की है। इसका प्रयोग बीच बीच में वजन कम करने का जोश आने पर काफी समय तक करता रहा हूं। टेराग्रीन की सुनें तो इससे मानसिक हलचल ही कुंद हो जायेगी!
पर क्या खाया जाये मित्र? चीनी बेकार, नमक बेकार, वसा बेकार। ज्यादा उत्पादन के लिये प्रयुक्त खाद और कीटनाशकों के चलते अन्न जहरीला। दूध मिलावटी। दवाओं और एडिटिव्स के भीषण साइड इफेक्ट्स!
टेराग्रीन जैसी पत्रिकायें किसी को तो नोबेल पुरस्कार दिलाती हैं और किसी को वातावरण में जहर घुला होने का अवसाद बांटती हैं।Confused
अगला अंक मैं खरीदने वाला नहीं!

शहर में नीलगाय

नील गाय की चर्चा पर्यावरण से जुड़ा मुद्दा है।

अपनी ब्लॉगरी की शुरुआत में मैने मार्च’२००७ में एक पोस्ट लिखी थी – शहर में रहती है नीलगाय। मेरे घर के पास नारायण आश्रम की हरित पट्टी में आश्रम वालों ने गाये पाली हैं। उनके साथ एक नीलगाय दिखी थी इस वर्ष मार्च के महीने में। वह कुछ समय तक दिखती रही थी पर फिर दिखना बंद हो गया। अब अचानक फ़िर वह पालतू पशुओं से थोड़ी अलग चरती दिखी। मुझे सुकून आया कि वह यहीं है।

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यह चित्र मोबाइल के कैमरे से उतना साफ नहीं आया है। वह कुछ दूरी पर थी और मौसम भी कुछ साफ कम था।

मैने मार्च में लिखा था कि नीलगायों की संख्या कम हो रही है। पर वह सही नहीं है। दशकों से बाढ़ नहीं आयी है गंगा नदी में और उसके कारण नीलगाय जैसे जंगली पशुओं की संख्या बढ़ रही है जो कछार की जमीन पर उगने वाली वनस्पति पर जिन्दा रहते हैं।

[फोटो देख कर भरतलाल उवाच: अरे मोरि माई, ई त लीलगाय हौ। बहुत चोख-चोख लम्मा लम्मा सींघ हो थ एनकर। पेट में डारि क खड़बड़ाइ देइ त सब मालपानी बहरे आइ जाइ। (अरे मां! यह तो लीलगाय है। बड़े नुकीले और लम्बे सींग होते हैं इनके। किसी के पेट में भोंक कर खड़बड़ा दे तो पेट का सारा माल पानी बाहर आ जाये!) मैने पाया कि ग्रामीण परिवेश का होने के कारण वह अधिक जानता है नीलगाय के बारे में। वह यह भी जानता है कि यदा कदा रेबिड होने – पगलाने पर, नीलगाय किसानों की जिंदगी के लिये भी खतरा बन जाती है। यद्यपि सामान्यत: यह डरपोक प्राणी है।] 


अगर मैं कुछ दिनों में गूगल रीडर के स्क्रॉलिंग ब्लॉगरोल (हाइपर लिंक के पुच्छल्ले का अन्तिम आइटम) पर लिखूं तो मुख्य बात होगी कि आप गूगल रीडर का प्रयोग करते हैं या नहीं अपनी ब्लॉग व अन्य फ़ीड्स पढ़ने के लिये। अगर नहीं करते तो इस ट्यूटोरियल से वीडियो देख कर गूगल रीडर का परिचय प्राप्त करें। (बोलने वाली बड़ी तेज-फर्राटेदार अंग्रेजी बोलती है। जरा ध्यान से सुनियेगा।Happy)