धान की किस्में और उनसे रोगों की चिकित्सा



श्री पंकज अवधिया जी की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट है यह। आज वे विभिन्न प्रकार के धान की किस्मों के औषधीय गुणों के विषय में एक विहंगम दृष्टि प्रस्तुत कर रहे हैं। आप उनके पहले के लेख पंकज अवधिया वर्ग सर्च के द्वारा इस ब्लॉग पर देख सकते हैं।


Paddy आप कौन सा चावल खाते हैं ? यदि आपसे यह पूछा जाये तो आप झट से बोलेंगे कि बासमती चावल। आप ज्यादा आधुनिक होंगे तो उसमे जोड देंगे कि हम आर्गेनिक चावल खाते हैं । पर क्या आपने कभी मेडीसिनल राइस (औषधीय धान) खाया है? तो आप चौंक पडेंगे। हमारे देश के उन क्षेत्रों मे जहाँ धान की उत्पत्ति हुयी है आज भी सैकड़ों किस्म के औषधीय धान किसानों के पास हैं। बहुत से पारम्परिक चिकित्सक आज भी साधारण और जटिल दोनो ही प्रकार के रोगों की चिकित्सा मे इसका प्रयोग कर रहे हैं। समुचित प्रचार-प्रसार के अभाव मे सारा देश बासमती को ही सब कुछ मान बैठा है।

देश के पारम्परिक चिकित्सक वात रोगों से प्रभावित रोगियो को गठुवन नामक औषधीय धान के उपयोग की सलाह देते हैं । वे कहते हैं कि जिन क्षेत्रों मे पहले इसे खाया जाता था वहाँ इस रोग का नामो-निशान नहीं था। श्वाँस रोगो की चिकित्सा मे सहायक उपचार के रूप मे रोगी को नागकेसर नामक औषधीय धान प्रयोग करने की सलाह दी जाती है। आम तौर पर गरम भात के साथ जंगली हल्दी चूर्ण के रूप मे खाने को कहा जाता है।


करहनी नामक औषधीय धान का प्रयोग लकवा (पैरालीसिस) के रोगियो के लिये हितकर माना जाता है। नवजात शिशुओ को लाइचा नामक रोग से बचाने के लिये लाइचा नामक औषधीय धान के प्रयोग की सलाह माताओं को दी जाती है। इसी तरह नवजात शिशुओं मे छोटे फोड़ों को ठीक करने के लिये माताओ को आलचा

नामक औषधीय धान के उपयोग की राय दी जाती है।


प्रसव के बाद नयी ऊर्जा के लिये महराजी नामक धान माताओं के लिये उपयोगी होता है। आपको तो पता ही है कि मै इन दिनों मधुमेह से सम्बन्धित पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान का दस्तावेजीकरण कर रहा हूँ और एक विस्तृत रपट तैयार कर रहा हूँ। इस रपट में मैने एक अध्याय औषधीय धान पर रखा है। इसमे कंठी बाँको और उडन पखेरु जैसे नाना प्रकार के औषधीय धानों के मधुमेह मे प्रयोग की विधियाँ समझायी गयी हैं कैसर और हृदय रोगों पर आधारित रपटो में भी इ पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है।


चावल के अलावा धान के पौधो मे अन्य भागो मे भी औषधीय गुण होते हैं कालीमूंछ नामक औषधीय धान के पूरे पौधे से तैयार किया गया सत्व त्वचा रोगों को ठीक करता है। बायसूर नामक औषधीय धान की भूसी को जलाकर धुंए को सूंघने से माइग्रेन मे लाभ होता है।


पशु चिकित्सा मे भी औषधीय धान का प्रयोग देहाती इलाको मे होता है। गाय के जरायु (प्लेसेंटा) को बाहर निकलने से रोकने के लिये प्रसव के बाद अलसी और गु के साथ भेजरी नामक औषधीय धान खिलाया जाता है।


प्राचीन भारतीय चिकित्सा ग्रंथो मे साठिया नामक औषधीय धान का वर्णन मिलता है। साठिया माने साठ दिन मे पकने वाला धान। पूरे देश मे साठ दिन में पकने वाली बहुत सी औषधीय धान की किस्में है पर सही नाम न लिखे होने के कारण ग्रंथो पर आधारित चिकित्सा करने वाले विशेषज्ञो को परेशानी होती है। मैने अपने वानस्पतिक सर्वेक्षण के आधार पर जिन औषधीय धानों के विषय मे लिखा है उनका वर्णन प्राचीन चिकित्सा ग्रंथो मे नही मिलता है।


मैने औषधीय धान पर बहुत कुछ लिखा है और सम्भवत: विश्व मे इस पर सबसे अधिक शोध आलेख मैंने ही प्रकाशित किये हैं । पर अभी भी बहुत कुछ लिखना बाकी है। सबसे जरुरी तो यह है कि औषधीय धान को संरक्षित करने के कार्य शुरु हों और इसके विषय मे जानकारी रखने वालों को सम्मानित कर उनसे इन्हे बचाने के गुर सीखे जायें । आज रा सायनिक खेती के युग में हम चावल का स्वाद भूल चुके हैं । हमे पतले और सुगन्ध वाले चावल चाहियें , भले ही उसमे बिल्कुल भी औषधीय गुण न हों । आपने कभी अपने आप से पूछा है कि क्यो आपने चावल के लिये ऐसा नजरिया बना लिया है?


इतनी मूल्यवान निधि के होते हुये क्यों धान उत्पादक क्षेत्रो के किसान दुखी है? क्यों उनकी नयी पीढी पलायन के लिये मजबूर है? यह समझ से परे है। योजनाकारों को पहल कर अब औषधीय धान के विषय मे भी विचार-मंथन करना चाहिये।


औषधीय धान पर मेरे शोध आलेखो की कड़ियां:

1. गूगल सर्च की कडियां

2. ईकोपोर्ट की कड़ियां – 1

3. ईकोपोर्ट की कड़ियां – 2


पंकज अवधिया

© इस पोस्ट का सर्वाधिकार श्री पंकज अवधिया का है।


श्री अवधिया निश्चय ही बहुत अच्छे समय प्रबंधक होंगे। बहुत समय से बहुत सुस्पष्ट तरीके से अपने लेख मुझे मेल कर देते हैं। मुझे बस उनकी पोस्ट पर लगाने के लिये चित्रों के विषय में यत्न करना होता है। फ्री डोमेन के क्लिपार्ट या चित्रों का प्रयोग अथवा स्वयम के कैमरे पर निर्भरता उनकी सतत दी गयी सज्जन सलाह का ही परिणाम है। मैं अपने व्यक्तित्व में कई सकारात्मक परिवर्तनों का श्रेय उन्हें दूंगा।
(चित्र – घर में उगा एक छोटा सा फूल!)


पत्तलों के औषधीय गुण


 


यह श्री पंकज अवधिया जी की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट है – विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों के पत्तलों में भोजन करने के लाभ के विषय में। पढ़ने के लिये आप सीधे पोस्ट पर जायें। यदि आप उनके पहले के लेख पढ़ना चाहें तो कृपया पंकज अवधिया वर्ग पर क्लिक करें।


  कुछ वर्षो पूर्व मैं कोलकाता से आये एक धन्ना सेठ के मन्दबुद्धि बालक के साथ पारम्परिक चिकित्सकों से मिलने गया। पारम्परिक चिकित्सकों ने पूरी जाँच के बाद दवाए दीं और साथ ही कहा कि हर रविवार को पीपल के पत्तो से तैयार पत्तल मे खाना परोसा जाये। सबसे पहले गरम भात परोसा जाये और बालक उसे खाये। पीपल के पुराने वृक्ष से पत्तियाँ एकत्र करने को कहा गया। यह भी हिदायत दी गयी कि तालाबों के पास उग रहे पीपल से पत्तियाँ न लें। हर सप्ताह ताजी पत्तियो से बने पत्तल के उपयोग की बात कही गयी। बाद मे पारम्परिक चिकित्सको ने बताया कि पुराने रोग में वे इस प्रयोग को सहायक उपचार के रूप मे उपयोग करते हैं जबकि नये रोग में यह मुख्य उपचार के रूप मे उपयोग होता है।

 

आम तौर पर केले की पत्तियो मे खाना परोसा जाता है। प्राचीन ग्रंथों मे केले की पत्तियो पर परोसे गये भोजन को स्वास्थ्य के लिये लाभदायक बताया गया है। आजकल महंगे होटलों और रिसोर्ट मे भी केले की पत्तियो का यह प्रयोग होने लगा है। हाल ही मे मुम्बई के एक सात सितारा होटल मालिक के आमंत्रण पर मै वहाँ ठहरा। उन्होने बताया कि वे केला अपने फार्म मे उगाते हैं। सुबह-सुबह जब मै फार्म पहुँचा तो कर्मचारी कीटनाशक का छिडकाव कर रहे थे। मै दंग रह गया। इन्ही पत्तियो को कुछ दिनो मे भोजन परोसने के लिये उपयोग किया जाना था। मैने आपत्ति दर्ज करायी। आशा के विपरीत उन्होने गल्ती मानी और कीट नियंत्रण के लिये जैविक उपाय अपनाने का वचन दिया।

 

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि हमारे देश मे 2000 से अधिक वनस्पतियों की पत्तियों से तैयार किये जाने वाले पत्तलों और उनसे होने वाले लाभों के विषय मे पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान उपलब्ध है पर मुश्किल से पाँच प्रकार की वनस्पतियों का प्रयोग हम अपनी दिनचर्या मे करते है। शहरों मे तो लोग सा लों तक पत्तल मे भोजन नही करते हैं।

 

पीपल के अलावा बहुत सी वनस्पतियाँ है जिनसे तैयार पत्तल मे गरम भात खाने से लाभ होता है। रक्त की अशुद्धता   के कारण होने वाली बीमारियों के लिये पलाश से तैयार पत्तल को उपयोगी माना जाता है। पाचन तंत्र सम्बन्धी रोगों के लिये भी इसका उपयोग होता है। आम तौर पर लाल फूलो वाले पलाश को हम जानते हैं पर सफेद फूलों वाला पलाश भी उपलब्ध है। इस दुर्लभ पलाश से तैयार पत्तल को बवासिर (पाइल्स) के रोगियों के लिये उपयोगी माना जाता है।

 

जोडो के दर्द के लिये करंज की पत्तियों से तैयार पत्तल उपयोगी माना जाता है। पुरानी पत्तियों को नयी पत्तियों की तुलना मे अधिक उपयोगी माना जाता है। लकवा (पैरालिसिस) होने पर अमलतास की पत्तियों से तैयार पत्तलो को उपयोगी माना जाता है।

 

प्रतिवर्ष माहुल नामक वनस्पति से पत्तल बडे पैमाने पर वनवासियों द्वारा तैयार किये जाते है और फिर बड़ी मात्रा मे इसे दुनियां भर में बेचा जाता है। इस पत्तल की बडी माँग है। मेरा मानना है कि हम इस माँग का सही लाभ नही उठा पा रहे हैं। यदि पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान के आधार पर तैयार किये गये पत्तलो को उनके औषधीय गुणों की जानकारी के साथ बाजार मे लाया जाये तो पारम्परिक चिकित्सकों के अलावा वनवासियों को भी सही मायने मे बहुत लाभ मिल पायेगा। इससे देश का पारम्परिक ज्ञान भी बच जायेगा। मैने इस ज्ञान का दस्तावेजीकरण किया है पर अभी भी बहुत कुछ लिखना बाकी है।

 

सम्बन्धित आलेख:

Convert your food into medicine by serving it in Pattal of Indian state Chhattisgarh.

 

पंकज अवधिया

© इस लेख का सर्वाधिकार श्री पंकज अवधिया के पास सुरक्षित है।


क्या साहब!!! लोग सिल्वर स्पून ले कर पैदा होते हैं। चांदी-सोने के बर्तन में भोजन करते हैं। छींक आने पर डाक्टर आता है और उसकी सलाह पसन्द न हो तो सेकेण्ड/थर्ड ओपीनियन की भी कवायद होती है। और यह अवधिया जी हैं कि पत्तल में खिलाये बिना मानेंगे नहीं!

यह तो धनी लोगों के खिलाफ साम्यवादी साजिश लगती है। कि नहीं?!

वैसे आप ऊपर अंग्रेजी वाले लेख ले लिंक पर क्लिक कर पढ़ने का जोर लगायें; वहां बहुत जानकारी है।


वनस्पतियों पर आश्चर्यजनक जानकारियाँ



यह पंकज अवधिया जी की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट है। पंकज जी अपने व्यस्त वानस्पतिक अनुसंधान में समय निकाल कर प्रतिसप्ताह हिन्दी में हमारे लिये जानकारी उपलब्ध करा रहे हैं। उनके पिछले लेख आप पंकज अवधिया के लेबल पर क्लिक कर देख सकते है।

इस बार वे कुछ वनस्पतियों के कुछ विरोधाभासी गुणों पर रोचक और काम की जानकारी प्रस्तुत कर रहे हैं। आप पढ़ें –





इस बार मै आपको अपने वानस्पतिक सर्वेक्षणों के दौरान एकत्र की गयी कुछ अजीबो-गरीब पर उपयोगी जानकारियों के विषय मे बताने की कोशिश करूंगा।

 

आप सब अमलतास को तो जानते ही होंगे। जल्दी ही आप इसके स्वर्ण पुष्पों को देख पायेंगे। ऐसा लगेगा जैसे कि पूरा वृक्ष सोने से लदा हुआ है। यही कारण है कि इसे जंगल झरना, धनबहेर या धनबोहार भी कहा जाता है। इसके बीजों को खाने से पेट साफ होता है। पर अधिक मात्रा से दस्त होने लगते हैं। इस दस्त को रोकने के लिये उसी पेड की पत्तियो को भूनकर दिया जाता है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि जब (बीज के बिना) पत्तियों को इसी रूप मे खाया जाता है तो इससे दस्त होने लगते हैं। बीजो के प्रयोग के बाद इसके प्रयोग से दस्त का रूकना और सीधे इसके प्रयोग से दस्त का होना बडा ही अजीब करिश्मा है माँ प्रकृति का।


आपने केवाँच का नाम तो सुना ही होगा और बचपन मे हममे से कईयो ने तो होली मे खुजली के लिये शरारतपूर्वक इसका प्रयोग भी किया होगा। जंगल मे जब केवाँच के बीजो का एकत्रण किया जाता है तो पूरे पौधे को जला दिया जाता है और बीज एकत्र कर लिये जाते है पर इससे अधिक ताप के कारण बीजो को नुकसान पहुँच सकता है। पारम्परिक चिकित्सक दूसरा उपाय अपनाते हैं। वे कहते हैं कि जंगल में जहाँ केवाँच उगती है, वहाँ पर एक विशेष प्रकार की वनस्पति अवश्य उगती है। वे इसे स्थानीय भाषा मे ममीरा कहते है। यह असली ममीरा से अलग होती है। केवाँच के बीज एकत्र करने से पहले वे इस वनस्पति को चबा लेते है। आश्चर्यजनक रूप से इससे केवाँच से होने वाली खुजली नही होती है और वे सुगमतापूर्वक यह कार्य कर लेते है।


केवाँच के चित्रों की कड़ी


आप समय-समय पर यह पढते-सुनते रहते है कि सरसो के तेल मे मिलावट से ड्राप्सी नामक बीमारी हो गयी। यह मिलावट सत्यानाशी नामक वनस्पति के बीजों की होती है जो कि सरसो के समान दिखते हैं। यह वनस्पति बेकार जमीन मे अपने आप उगती है। यह कहा जाता है कि यह सरसो के खेत मे उगती है और यहीं पर इसके बीज अपने आप सरसो के साथ मिल जाते है पर वास्तव मे बडे पैमाने पर ग्रामीणों से इसका एकत्रण करवाया जाता है और फिर इसे सरसो मे मिलाया जाता है। देश के पारम्परिक चिकित्सक इस वनस्पति और इसके गलत प्रयोग दोनो ही को जानते हैं। पर वे इस वनस्पति के एक अनोखे गुण को भी जानतहैं। बीजो से निकलने वाले जिस तेल से ड्राप्सी होती है उसी ड्राप्सी को पत्तियो के प्रयोग से ठीक किया जा सकता है। है न विचित्र बात?


सत्यानाशी के चित्रों की कड़ी

 

सर्पगन्धा नामक भारतीय वनस्पति के दिव्य गुणों से प्रभावित होकर जब आधुनिक चिकित्सा शास्त्रियो ने उसकी जड़ से रिसर्पिन अलग कर हृदय रोगो मे उपयोग आरम्भ किया तो कई तरह के दुष्प्रभाव सामने आने लगे। ये दुष्प्रभाव उस समय नही होते जब पारम्परिक चिकित्सा मे इसका प्रयोग इन्ही रोगो की चिकित्सा मे होता है। यह पता लगाने के लिये अध्ययन किये गये तो राज खुला कि जड़ का जब प्रयोग किया जाता है तो उसमे रिसर्पिन के अलावा कई ऐसे प्राकृतिक रसायन होते है जो रिसर्पिन के दुष्प्रभावो को समाप्त कर देते हैं। जबकि अकेले रिसर्पिन नुकसानदायक सिद्ध होता है।


सर्पगन्धा के चित्रों की कड़ी

 

एक और उदाहरण। एलो वेरा की पत्तियों के आधार से एक पीला द्रव निकलता है। यह द्रव त्वचा रोग पैदा करता है। पर यदि पत्तियों के ऊपरी भाग के अन्दर का रस का प्रयोग किया जाये तो इस त्वचा रोग से मुक्ति मिल जाती है।

 

ये निश्चित ही माँ प्रकृति के चमत्कार है। पर मै तो उन देव पुरुषो को भी कम नही मानता हूँ जिन्होने इन गुणों का पता लगाया।

 

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पिछली पोस्ट मे मैने भोजन तालिकाओ की बात की थी। ये तालिकाएं कैसी होती है यह आप भी जानें। ये तालिकाए एक विशिष्टजन के लिये बनायी गयी हैं।

आप उदाहरण स्वरूप इन्हे इस कडी पर देख सकते है।

 

पंकज अवधिया

© इस लेख का सर्वाधिकार पंकज अवधिया जी का है।


कल मेरे घर पर “मीठा दिन” था। भरतलाल के जन्मदिन के अवसर पर नाश्ते में जलेबी मिली। भरत ने सभी बड़ों के पैर छू कर आशीर्वाद लिया।

दिन में मेरे ससुराल से सूरज पासवान नये गुड़ की पोटली लेकर आया। नया मीठा गुड़।

शाम को बिल्कुल सरप्राइज के रूप में भरतलाल एक अच्छा केक लाया। आनन फानन में एक खूबसूरत मोमबत्ती का इन्तजाम हुआ। भरत ने केक काटा। सब ने ताली बजाई। मां ने भरत को उपहार दिया। आप केक काटते भरत लाल की फोटो देखें।



हिन्दी ब्लॉगिंग क्या साहित्य का ऑफशूट है?



बहुत सी समस्यायें इस सोच के कारण हैं कि हिन्दी ब्लॉगिंग साहित्य का ऑफशूट है। जो व्यक्ति लम्बे समय से साहित्य साधना करते रहे हैं वे लेखन पर अपना वर्चस्व मानते हैं। दूसरा वर्चस्व मानने वाले पत्रकार लोग हैं। पहले पहल, शायद आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के युग में पत्रकारिता भी साहित्य का ऑफशूट थी। वह कालांतर में स्वतंत्र विधा बन गयी।

मुझे हिन्दी इतिहास की विशेष जानकारी नहीं है कि साहित्य और पत्रकारिता में घर्षण हुआ या नहीं। हिन्दी साहित्य में स्वयम में घर्षण सतत होता रहा है। अत: मेरा विचार है कि पत्रकारिता पर साहित्य ने वर्चस्व किसी न किसी समय में जताया जरूर होगा। मारपीट जरूर हुई होगी।

 

वही बात अब ब्लॉगरी के साथ भी देखने में आ रही है। पर जिस प्रकार की विधा ब्लॉगरी है अर्थात स्वतंत्र मनमौजी लेखन और परस्पर नेटवर्किंग से जुड़ने की वृत्ति पर आर्धारित – मुझे नहीं लगता कि समतल होते विश्व में साहित्य और पत्रकारिता इसके टक्कर में ठहरेंगे। और यह भी नहीं होगा कि कालजयी लेखन साहित्य के पाले में तथा इब्ने सफी गुलशन नन्दा छाप कलम घसीटी ब्लॉग जगत के पाले में जायेंगे।

चाहे साहित्य हो या पत्रकारिता या ब्लॉग-लेखन, पाठक उसे अंतत उत्कृष्टता पर ही मिलेंगे। ये विधायें कुछ कॉमन थ्रेड अवश्य रखती हैं। पर ब्लॉग-लेखन में स्वतंत्र विधा के रूप में सर्वाइव करने के गुण हैं। जैसा मैने पिछले कुछ महीनों में पाया है, ब्लॉगलेखन में हर व्यक्ति सेंस ऑफ अचीवमेण्ट तलाश रहा हैअपने आप से, और परस्पर, लड़ रहा है तो उसी सेंस ऑफ अचीवमेण्ट की खातिर। व्यक्तिगत वैमनस्य के मामले बहुत कम हैं। कोई सज्जन अन-प्रिण्टएबल शब्दों में गरिया भी रहे हैं तो अपने अभिव्यक्ति के इस माध्यम की मारक क्षमता या रेंज टेस्ट करने के लिये ही। और लगता है कि मारक क्षमता साहित्य-पत्रकारिता के कंवेंशनल वेपंस (conventional weapons) से ज्यादा है!

मैं यह पोस्ट (और यह विचार) मात्र चर्चा के लिये झोँक रहा हूं। और इसे डिफेण्ड करने का मेरा कोई इरादा नहीं है। वैसे भी अंतत: हिन्दी ब्लॉगरी में टिकने का अभी क्वासी-परमानेण्ट इरादा भी नहीं बना। और यह भी मुगालता नहीं है कि इसके एडसेंस के विज्ञापनों से जीविका चल जायेगी। पर यह विधा मन और आंखों में जगमगा जरूर रही है – बावजूद इसके कि उत्तरोत्तर लोग बर्दाश्त कम करने लगे हैं।

क्या सोच है आपकी? 


बालों की सेहत पर एक पोस्ट



यह श्री पंकज अवधिया की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट है। इस पोस्ट में अवधिया जी बालों के विषय में मुक्त चर्चा कर रहे हैं। आप वह पढ़ कर लाभान्वित हों। मैं उनके लिये स्थान छोड़ता हूं:


यूं तो पाठकों की समस्याओं पर आधारित दसियों सन्देश लगातार मिल रहे हैं पर चूँकि इसमे बालों की विभिन्न समस्याओं से सबन्धित सन्देश बहुत अधिक हैं, इसलिये इस बार इसी विषय पर चर्चा करते हैं।

आप कही भी बैठे हों; जैसे ही आपने बालो की समस्या की बात छेडी नहीं कि दसियों उपाय बताने की लोगो मे होड़ लग जाती है। आज हमारे पास ढेरो उत्पाद बाजार में उपलब्ध हैं – एक से बढकर एक दावों के साथ कि वे ही बालों की समस्या को दूर कर सकते हैं। बालों के लिये बहुत सारे घरेलू नुस्खे हैं, और आम लोग इन्हे जानते भी हैं। पर कभी आपने यह सोचा है कि फिर भी क्यों सभी बालो की समस्याओं से परेशान हैं? क्यो इतने सारे अनुसन्धान और उत्पाद जमीनी स्तर पर नाकाम साबित हो रहे हैं?

मै तो चिकित्सक नही हूँ। मै देश के विभिन्न भागों मे आम लोगों और विशेषकर पारम्परिक चिकित्सको के पास उपलब्ध पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान का दस्तावेजीकरण कर रहा हूँ। एक दशक से भी अधिक समय तक इन लोगों के साथ रहते हुये मैने हजारों वनस्पतियों और उन पर आधारित लाखों दवाओं के विषय मे जाना है। वनस्पति के संग्रहण से लेकर उसके उपयोग और फिर रोगी के ठीक होते तक मैने पूरी प्रक्रिया को देखा और फिर वैज्ञानिक भाषा मे उसका दस्तावेजीकरण किया है।

जब कोई रोगी बालों की समस्या लेकर पारम्परिक चिकित्सकों के पास पहुँचता है तो वे तुरत-फुरत उसे तेल नही देते हैं। वे उससे लम्बे समय तक बात करते हैं और इस समस्या के लिये उत्तरदायी कारणों का पता लगाते हैं। उसके बाद चिकित्सा आरम्भ होती है। चिकित्सा का मुख्य उद्देश्य रोग की जड तक जाना है। उनका मानना है कि रोग की ज़ड पकडने से मुख्य समस्या के साथ और भी कई प्रकार की समस्याओं का निराकरण हो जाता है। मैने अब तक 5000 से अधिक वनस्पतियो से तैयार किये जाने वाले केश तेलों का अध्ययन और दस्तावेजीकरण किया है। पारम्परिक चिकित्सकों का मानना है कि इन तेलो का चुनाव बडी टेढी खीर है। एक ही तेल अलग-अलग रोगियों पर अलग-अलग प्रभाव दिखा सकता है क्योकि सभी की एक ही समस्या के लिये एक ही तरह के कारक जिम्मेदार नही हैं। यह तो बडी गूढ़ बात लगती है पर आप आधुनिक चिकित्सा ग्रंथो या सन्दर्भ साहित्यों को पढ़ेंगे तो वे भी इस बात का समर्थन करते नजर आयेंगे। यदि यह सही है तो फिर बाजार मे बिकने वाला एक प्रकार का आँवला केश तेल कैसे करोडो लोगो को राहत पहुँचा सकता है? यह सोचने वाली बात है। आयुर्वेद दुनिया को भारत का उपहार है। पर जिस आयुर्वेद को आजकल हम उत्पादों मे खोजते है वह व्यवसायिक आयुर्वेद है। यह व्यवसायिक आयुर्वेद मूल आयुर्वेद के सामने कुछ नही है।

बालों की समस्या के लिये जब लोग मुझसे राय माँगते हैं तो वे सोचते है कि मै किसी केश तेल की बात करूंगा। पर मै उनसे “दिन भर वे क्या-क्या खाते है” – इसकी जानकारी माँगता हूँ। इससे मुझे पारम्परिक चिकित्सकों के सानिध्य से सीखे गुर के आधार पर रोग के कारण का अनुमान हो जाता है फिर बहुत ही सरल उपाय भोज्य सामग्री के रूप मे लोगों द्वारा दी गयी भोजन तालिका मे जोड देता हूँ। बाद मे लाभांवित होकर जब वे आते हैं तो उनसे पूछ लेता हूँ कि आपका बवासिर अब कैसा है? माइग्रेन के क्या हाल है? लोग आश्चर्यचकित हो जाते है कि ये तो बताया नही था फिर इन्हे कैसे पता? इसमे मेरा अपना कोई हुनर नही है। यह अपने देश का पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान है। कभी मै सोचता हूँ कि जीवन के कुछ वर्ष आधुनिक चिकित्सा की पढाई मे लगाये जायें और फिर आधुनिक और पारम्परिक चिकित्सा प्रणालियो के समन्वय से नयी चिकित्सा प्रणाली विकसित की जाये। पर दस्तावेजीकरण के कार्य से मुक्ति ही नहीं मिल पाती है।

आम तौर बालों के लिये जो आधुनिक रसायनों से युक्त उत्पाद हम आकर्षक विज्ञापनो से अभिभूत होकर उपयोग करते है वे ही हमारे लिये अभिशाप बन जाते हैं। केश तेलों का प्रयोग भी सावधानी से करने की जरुरत है। मै आपको छोटा सा उदाहरण देता हूँ। मेरी माताजी ने बाजार से एलो वेरा और कुछ आम वनस्पतियो से तैयार केश तेल लिया और उपयोग किया। आशातीत परिणाम नहीं मिले। मैने सभी वनस्पतियाँ एकत्र की और घर पर पारम्परिक तरीके से वही तेल बनाया। तेल बनाना कठिन नही है। सभी वनस्पतियो को लेकर ताजी अवस्था मे ही आधार तेल जो कि आमतौर पर तिल का तेल होता है, में डुबो कर सूरज के नीचे निश्चित अवधि तक रख दिया जाता है। आम तौर पर यह अवधि चालीस दिनों की होती है। फिर तेल को छानकर उपयोग कर लेते हैं। माताजी को घर पर बने तेल से अच्छे परिणाम मिले। कुछ वर्षो पहले एक वैज्ञानिक सम्मेलन मे एक बडी दवा कम्पनी के मुख्य विशेषज्ञ से मैने पूछा कि क्या आप धूप मे रखकर तेल बनाते हैं तो वे हँसे और बोले किसे फुर्सत है यह सब करने की। हम तो तेल को उबाल लेते हैं और आधे घंटे के अन्दर ही सारी प्रक्रिया पूरी हो जाती है। वे यह भी बोले कि जब अमिताभ बच्चन इसे बेचते है तो यह अपने आप असर करने लगता है। इन तेलो मे उपयोग होने वाली वनस्पतियों की गुणवत्ता पर भी ध्यान नही दिया जाता है। ये वनस्पतियाँ आपके आस-पास आसानी से मिल सकती हैं। भृंगराज का ही उदाहरण ले। सुनने मे तो यह कोई दुर्लभ वनस्पति लगती है पर आम धान के खेतो मे यह खरपतवार की तरह उगती है और किसान इसे उखाडते-उखाडते परेशान हो जाते हैं। यदि आपने गाँव के स्कूल मे पढाई की होगी तो ब्लैक बोर्ड को काला करने के लिये जिस पौधे को घिसा होगा वही तो भृंगराज है।

अत: मै आप सभी को यही सलाह दूंगा कि आप अपने दैनिक भोजन की तालिका भेजें। उसी आधार पर मै आपको नयी तालिका सरल प्रयोगो के साथ वापस लौटा दूंगा। आप आजमायें और लाभांवित हों।

पंकज अवधिया

© इस लेख का सर्वाधिकार पंकज अवधिया का है।


कल मैने अपने दफ्तर (जो सूबेदारगंज में है) की विद्युत व्यवस्था की बात की थी और यह भी बताया था कि छपरा स्टेशन पर भी ऐसी प्रकाश व्यवस्था की गयी है। कई लोगों ने इसे इलाहाबाद स्टेशन की व्यवस्था समझा और इन्द्र जी ने इसको स्पष्ट करने के लिये पूछा भी कि यह व्यवस्था कहां की है?

मैं इलाहाबाद स्टेशन पर या उत्तरमध्य रेलवे के अन्य मुख्य स्टेशनों की प्रकाश व्यवस्था, सौर ऊर्जा के प्रयोग आदि की जानकारी एकत्र कर बाद में बताऊंगा। यात्री सुविधाओं में व्यापक परिवर्तन हो रहे हैं और प्रकाश व्यवस्था उनका प्रमुख अंग है। रेल के प्रति लोगों की उत्सुकता मुझे बहुत सुखद लगती है! धन्यवाद।