गाय, सुनील ओझा और गड़ौली धाम


दीर्घजीवन की सेंच्यूरी मारने की इच्छा शायद मेरे शहरी जीवन त्याग कर इस ग्रामीण अंचल में बसने के निर्णय के मूल में है। हो सकता यही चाह सुनील जी को गड़ौली धाम लाई हो। जो हो; इस शतकीय सोच की एक एक गेंद खेलना और लिखना है!

महुआ, हिंगुआ और गड़ौली धाम


हिंगुआ का चित्र लेने के लिये मैं घुटनों के बल जमीन पर बैठता हूं। मोबाइल को गिरने से बचाते हुये कठिनाई से चित्र ले पाता हूं। उम्र बढ़ रही है जीडी।
हिंगुआ का चित्र लेने के लिये झुकना – ज्यादा समय नहीं कर पाओगे!

पतझर, पत्तियां और भरसाँय


गांवदेहात रहेगा, पत्तियाँ झरेंगी, कोंहार का पेशा रहेगा और भरसांय रहेगी। चना, लावा, चिउरा, लाई भुनवाया जायेगा। बच्चे भले ही पॉमोलिन में तली पुपुली खाने पर स्विच कर गये हैं; भूंजा खाने का प्रचलन बना रहेगा।

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