कोदों का भात – करंजिया से गाड़ासरई


28 सितम्बर 2021 शाम –

आज तपती सड़क पर पैर जला। मैंने उनसे पूछा – सैण्डल लेने की नहीं सोची? बताये – “सोचा; पर भईया मन माना नहीं। आज लोगों ने बताया कि डिण्डौरी के रास्ते कहीं चट्टी (कपड़े का स्ट्रैप लगी खड़ाऊं) मिलती है। वह मिली तो खरीदूंगा।

आज गर्मी बहुत थी। सड़क तप रही थी। चलने में दिक्कत हुई। थकान भी ज्यादा। दूरी भी करीब चालीस किलोमीटर से ज्यादा। प्रेमसागर पांड़े सवेरे छ बजे निकल लिये थे करंजिया रेस्ट हाउस से पर शाम साढ़े सात बजे तक पंंहुचे गाड़ासरई। रास्ते में ज्यादा गांव मिले नहीं। गोरखपुर तक दो गांव और गोरखपुर के बाद गाड़ासरई तक तीन गांव। बस। “गांव रहे होंगे पर सड़क से दूर रहे होंगे।”

प्रेम सागर ऊर्जा के लिये दिन में चाय की दुकानों पर रुकते हैं। चाय के साथ एक दो बिस्कुट भी ले लेते हैं। आज चाय की दुकानें भी ज्यादा नहीं दिखीं। गोरखपुर के पहले एक और उसके बाद दो चाय की दुकानें। वहीं रुक कर थोड़ा सुस्ताना भी हो जाता है। “सड़क गर्म हो गयी थी, पर रास्ता ठीक था। ऊंचा नीचा था, पर ज्यादा नहीं। जंगल भी अधिक नहीं थे। पहाड़ियां दूर दूर दिखती थीं। दो नदियाँ और आठ नाले मिले। नदियों के नाम बताने वाले नहीं थे और उनपर कोई किनारे नाम भी लिखे नहीं दिखे।”

कोदों का भात खाये प्रेमसागर

गाड़ासरई रेस्ट हाउस आने पर पता चला कि इलाके में मोटे अन्न – कोदों, सांवा और तिन्नी के चावल की खेती होती है। प्रेम सागर ने अनुरोध किया कि कोदों का चावल बनाया जाये। “कोदों मैंने सुना था पर उसका भात पहले खाया नहीं था। खाया तो बहुत स्वादिष्ट लगा। कोदों का भात और 2-3 रोटी ली रात के खाने में। वहां के लोगों कह दिया है कि पांच किलो कोदों आपके लिये रख दें। इसी रास्ते लौटना हुआ तो आपके लिये लेता आऊंगा। शुगर के लिये ज्यादा फायदेमंद रहता है।”

प्रेम सागर के आगे अभी बहुत सी यात्रा शेष है। पर वे लौटानी की और डिण्डौरी-गाड़ासरई के मार्फत लौटानी की सोच ले रहे हैं। दूसरे मेरे बारे में फिक्र कर रहे हैं – यह देख कर सुखद अनुभूति हुई।

लोग अमृतलाल वेगड़ जी की नर्मदा यात्रा की तुलना इस यात्रा से करने लगते हैं। पर दोनो यात्राओं की मूल प्रकृति भिन्न है। वेगड़ जी, उनकी व्यक्तित्व की उत्कृष्टता को अलग रख दिया जाये; नर्मदा की परिक्रमा कर रहे थे। वे तीरे तीरे चल रहे थे। अमरकंटक से रवाना होने पर कपिलधारा के बाद उनके पास सड़क मार्ग से चलने का विकल्प था। पर उन्होने वन में छिपी नर्मदा के किनारे किनारे चलने का ‘जोखिम’ लिया। उनकी यात्राओं में स्थानीय लोगों से मेलजोल बातचीत खूब है। उनका नित्य ठहरने और भोजन बनाने का अनुष्ठान भी पाठकोंं को रसरंजित करता है। उनकी यात्रा धीरे धीरे बहती है। वे नर्मदा के सौंदर्य को देखते सूंघते परखते चलते हैं।

पर प्रेमसागर को नर्मदा माई की परिक्रमा नहीं करनी है। उनको द्वादश ज्योतिर्लिंग दर्शन करने हैं और उन्हें जल चढ़ाना है। उनके साथ लोगों की टोली नहीं है। ‘एकला चालो’ का भाव है। नर्मदा उनके दांये डेढ़ दो किलोमीटर पर ही बह रही होंगी पर उनका रास्ता सड़क से हिलता नहीं – भले ही पांव डामर की सड़क पर तपते हैं। उनका ध्येय शाम तक नियत वन विभाग के पड़ाव तक पंहुचना होता है। कोई नदी नाला या नर्मदा मिल गयीं तो ठीक वर्ना उन्हें रोज के अपने चलने के किलोमीटर गिनने हैं।

रास्ते में मिली एक नदी। नाम बताने वाला कोई आसपास नहीं था

प्रेमसागर के साथ डिजिटल यात्रा करते हुये मैं उस यात्रा में ‘वेगड़त्व’ तलाशने का (असफल) प्रयास करता हूं। यात्रा के माधुर्य और सौंदर्य की बजाय मुझे संकल्प-शिव भक्ति-धर्म और परम्परा निर्वहन की सोचनी चाहिये। पर वह मैं कर नहीं पाता। महादेव ने शायद यात्रा वृत्तांत लिखने के लिये मुझ जैसे आदमी को गलत चुना। उन्हें ‘भदोहिया भुच्च’ की बजाय किसी काशी के पण्डित को चुनना चाहिये था। जिसकी विषेशज्ञता रुद्राष्टाध्यायी में होती!

और प्रेमसागर के चक्कर में मैं अपना इतना समय की-बोर्ड पर दे रहा हूं कि मेरी पत्नीजी आज उखड़ गयी हैं – “तुम्हारी चाय पड़े पड़े ठण्डी हो जाती है। तुम्हें मेरी कोई फिक्र ही नहीं। दिन रात प्रेमसागर-प्रेमसागर। एक अलग कमरा ले लो। साल दो साल जब तक यात्रा चलती है, तुम अलग ही धूनी रमाओ!” :lol:

आज की यात्रा के समाप्ति पर रेस्ट हाउस के लोगों के साथ का एक चित्र भेजा है। चित्र में वन विभाग के जो लोग हैं उनके नाम भी बताये हैं। रात में लिया चित्र बहुत साफ नहीं है। पर यात्रा में अपना योगदान देने वालों को ब्लॉग पर स्थान देना भी जरूरी है; इसलिये मैं चित्र लगा रहा हूं।

पुष्पेंद्र, प्रेमसागर, जगन्नाथ और महेंद्र पाठक

रास्ते में जो चित्र प्रेमसागर ने खींचे हैं, उनमें धान का खेत, एक टूरिस्ट लोगों को रहने का भव्य स्थान, एक नदी और गांव के छप्पर और एसबेस्टॉस शीटों की मिली जुली छत के मकान हैं। प्रेम सागर चलते ही चले गये होंगे। धान के खेत के पास रुक कर उसमें निकलती धान की बालों की गंध सूंघने का प्रयत्न तो नहीं किया होगा। उनकी यात्रा का ध्येय ही अलग प्रकार का है। मैं उनसे इस विषय में पूछता भी नहीं।

आज तपती सड़क पर पैर जला। मैंने उनसे पूछा – सैण्डल लेने की नहीं सोची? बताये – “सोचा; पर भईया मन माना नहीं। यहां लोगों ने बताया कि डिण्डौरी के रास्ते कहीं चट्टी (कपड़े का स्ट्रैप लगी खड़ाऊं) मिलती है। वह मिली तो खरीदूंगा। वैसे शायद आगे रबर वाली सैण्डल लेनी ही पड़े।” … परम्परा, धर्म, जरूरत और संकोच की कशमकश में हैं प्रेमसागर। मैंने उन्हें कहा कि अगर चट्टी मिले तो उस दुकान का फोटो ले लीजियेगा और चट्टी का भी।

उनका अगला पड़ाव डिण्डौरी है।

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29 सितम्बर 21, सवेरे –

दो घण्टा चलने के बाद, करीब तेरह किलोमीटर की यात्रा कर चुके हैं प्रेमसागर साढ़े आठ बजे तक। उन्होने रेस्ट हाउस के कुछ चित्र भेजे हैं। जगन्नाथ जी का चित्र है जिन्होने भोजन बनाया था –

जगन्नाथ जी

पुष्पेंद्र जी और उनकी पत्नीजी का चित्र है। “भईया, हम खास तौर से यह चित्र भेज रहे हैं; काहे कि ये मेरे मना करने पर भी हमें एक किलोमीटर तक साथ छोड़ने आये। और वह भी नंगे पांव!”

पुष्पेंद्र जी और उनकी पत्नी जी।

रास्ते में एक नदी दिखी उन्हें। नाम था ‘सुरसरी” शायद देव नदी मानते होंगे लोग। प्रेमसागर ने बताया कि एक खास बात नोट की आज उन्होने – “आज जो भी रास्ते में मिला – बच्चा भी; वह ‘नर्मदे हर, नर्मदे हर’ बोल रहा था मुझे देख कर। इसके पहले यह नहीं होता था। यह बहुत अच्छा लगा मुझे।”

सुरसरी नदी

अभी इतना ही। बाकी शाम को लिखा जायेगा। :-)

नर्मदे हर! हर हर महादेव! जय हो!


जंगल ही पड़ा – अमरकण्टक से करंजिया


27 सितम्बर 21 शाम –

… पर यह लग गया कि महिला के पास कोई कपड़ा था ही नहीं। प्रेमसागर ने उसे अपना छाता दे दिया। और मन द्रवित हुआ तो अपनी एक धोती भी निकाल कर उसे दे दी। महिला लेने में संकोच कर रही थी। तब प्रेम सागर ने कहा – “ले लो। तुम्हें यहां जंगल में कोई देने वाला नहीं आयेगा। मेरी फिक्र न करो, महादेव की कृपा रही हो बाद में मुझे कई छाता देने वाले मिल जायेंगे। माई, मना मत करो।”

अमरकंटक में लगता है कुछ दूर छोडने आये थे रमानिवास वर्मा जी। उनके मोबाइल से मिले कुछ चित्र प्रेमसागर ने फारवर्ड किये हैं। एक चित्र में उनकी कांवर का पूरा व्यू है। प्रेमसागर ने बताया कि करीब पैंतीस किलो वजन होगा। पैंतीस किलो वजन के साथ अमरकंटक से करंजिया की 22-25 किमी की पूरी तरह वन से गुजरती सड़क से पदयात्रा की प्रेम सागर ने। जैसा चित्र में दिखता है – पैर नंगे ही हैं। सेण्डल नहीं खरीदी उन्होने। रमानिवास जी के चित्रों में नेपथ्य में नर्मदा का जल है। शायद झील सी बनाई है नर्मदा ने। उसके आगे तो – जैसा प्रेमजी ने बताया – नर्मदा की चौड़ाई 10-15 फिट ही है। आदमी पैदल पार कर ले!

करंजिया तक के रास्ते में पेड़ ही थे वन के। मुश्किल से 12-15 लोग दिखे। चरवाहे। कोई बस्ती नहीं किसी भी तरफ। रास्ता ऊंचा नीचा था। शुरू में नर्मदा दूर दिखीं – कपिलधारा और कबीर आश्रम। उसके बाद तो बंदर ही थे। बहुत से बंदर थे – दो तीन सौ रहे होंगे। झुण्डों में। वह तो अच्छा था कि वर्माजी ने एक डण्डा दे दिया था, वर्ना वे आक्रमण भी कर सकते थे।

एक जगह एक 22 साल की महिला शिशु को लिये जा रही थी। अकेले। धूप तेज थी। गरीब दिखती थी महिला। प्रेम सागर ने उससे कहा कि धूप तेज है, कोई गमछा-कपड़ा उढ़ा दो बच्चे को। पर यह लग गया कि महिला के पास कोई कपड़ा था ही नहीं। प्रेमसागर ने उसे अपना छाता दे दिया। और मन द्रवित हुआ तो अपनी एक धोती भी निकाल कर उसे दे दी। महिला लेने में संकोच कर रही थी। तब प्रेम सागर ने कहा – “ले लो। तुम्हें यहां जंगल में कोई देने वाला नहीं आयेगा। मेरी फिक्र न करो, महादेव की कृपा रही हो बाद में मुझे कई छाता देने वाले मिल जायेंगे। माई, मना मत करो।”

वन विभाग के करंजिया रेस्ट हाउस में पंहुच कर वहां के दो लोगों के साथ एक चित्र भेजा। नाम लिखा – गणेश दुबे और एस के बर्मन। आज ज्यादा चलना नहीं हुआ, पर पैंतीस किलो वजन उठा कर चलना अपने आप में मेहनत का काम है और वह भी जब 1000 मीटर से 800 मीटर की ऊंचाई पर अमरकण्टक का पहाड़ पार किया जा रहा हो – ऊंचाई-नीचाई के साथ।

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गणेश दुबे (बांये) और एस के बर्मन (दांये) के साथ करंजिया रेस्ट हाउस में प्रेमसागर
28 सितम्बर 21, सवेरे –

कल प्रेमसागर से बात नहीं हो पाई। रास्ते भर फोन नहीं लगा। जंगल में शायद नेटवर्क नहीं काम करता। करंजिया में भी फोन तो लगा पर आवाज ऐसी नहीं थी कि बात हो सके। मैंने आज सवेरे सवेरे जल्दी ही उनसे बात की। उन्होने कल के यात्रा विवरण के साथ बताया कि रेस्ट हाउस में शारदा लाल यादव जी ने बड़े आग्रह से उन्हें सात आठ चपातियाँ खिला डालीं। चार तो सब्जी के साथ थी। उसके बाद तीन-चार दूध के साथ। “इतना ज्यादा कभी खाता नहीं था मैं”।

खाने के बाद मना करने के बावजूद उन्होने पैर भी दबाये और फिर सारे शरीर की मालिश भी कर दी। यह बताते हुये प्रेम सागर की आवाज में शायदा लाल जी के प्रति कृतज्ञता मिश्रित नमी झलक रही थी।

शारदा लाल यादव जी

प्रेम सागर जी ने बताया कि रेस्ट हाउस के आस पास बस्ती नहीं है। कुछ दूरी पर गांव शायद है।

बात सवेरे पांच बजे हुई थी। छ बजे उन्होने उजाला होने पर आसपास के चित्र भेजे। आज वे करंजिया से गाड़ासरई तक की यात्रा करेंगे। गूगल मैप के अनुसार रास्ता ऊंचा नीचा है। आठ सौ पैंतीस मीटर से 729 मीटर की ऊंचाई नीचाई है। आज चलना भी ज्यादा पड़ेगा – करीब चालीस किलोमीटर।

नर्मदे हर! हर हर महादेव! जय हो!

करंजिया से गदासराय


तीन तालियों पर मेरी पत्नीजी के विचार


सुटकहवा (पतला दुबला) तो बाकी दो हैवीवेट वालों को सम्भालने में ही हैरान परेशान दिखता है। है वो पढ़ा लिखा। चण्ट भी है। दोनो बाकी लोगों के दबाव में नहीं दिखता। पर उसका रोल जैसा है, उसके हिसाब से उसे बैलेंस बनाना पड़ता है।

[तीन ताल; आज तक रेडियो का एक साप्ताहिक पॉडकास्ट है। जिसने पिछले शनिवार को अपने पचास एपीसोड पूरे किये हैं। स्पोटीफाई पर यह पॉडकास्ट ‘कॉमेडी’ वर्ग में रखा गया है। कहा नहीं जा सकता कि यह वर्गीकरण तीन ताल वालों ने खुद किया है या यह उनके साथ मजाक किया गया है। इस पॉडकास्ट के बारे में तीन तालियों का सावधान करने का कथ्य है – ये पॉडकास्ट सबके लिए नहीं है। जो घर फूंके आपना, सो चले हमारे साथ। यानी वही लोग सुनें जिनका आहत होने का पैरामीटर ज़रा ऊंचा हो।]

अपनी टीआरपी के चक्कर में, या जो भी चक्कर रहा हो; इंजीनियरों को गरिया कर मेरी पत्नीजी की निगाह में अपनी स्टॉक वैल्यू धड़ाम से गिरा लिये थे पाणिनि पण्डित। “ये दाढ़ी-झोंटा बढ़ा कर अपने को ढेर विद्वान समझते हैं। ज्यादा बतियाने से कोई विद्वान थोड़े ही हो जाता है। थोड़ा बहुत कार्ल मार्क्स पढ़ के आदमी पगला जाता है और दूसरे को लण्ठ समझने का घमण्ड पाल लेता है।” – यह उनकी प्रतिक्रिया थी तीन ताल का नीचे वाला एपीसोड सुन कर।

पर पिछले एपीसोड में अपनी शेयर वैल्यू में वी ‘V’ शेप रिकवरी की पाणिनि आनंद ने। पहले तो तीन तालियों ने अपने पचासवें “श्रवण जयंती” एपीसोड के उपलक्ष में अलग अलग जगहों के लोगों को भी जूम पर जोड़ा। अहमदाबाद, बनारस, जम्मू कश्मीर और लंदन के श्रोता उसमें थे। कायदे से बनारस से मात्र चालीस किलोमीटर पर मैं हूं और इतनी पास पास का मनई लेने की बजाय कोई बिहार-झारखण्ड का होता तो बेहतर रहता जुगराफिये के हिसाब से; पर उन्होने एक भदोहिये को ही जोड़ लिया। किसी ‘विद्वान’ की बजाय “भदोहिया भुच्च” को। एक तो उन्होने मुझे जोड़ा अपनी जूम रिकार्डिंग में, दूसरे मुझे जामवंत की उपाधि दी (वैसे एक रीछ का प्रोफाइल चित्र बहुत फोटोजेनिक नहीं लगता, पर चलेगा। जामवंत का चरित्र भाजपा के मार्गदर्शक मण्डल की तरह निरीह टाइप नहीं है। वो एक्टिव पार्टीसिपेण्ट हैं लंका-विजय अभियान के!) – इन दोनो बातों से श्रीमती रीता पाण्डेय की रुचि तीन ताल में फिर से जग गयी। एपीसोड यह रहा –

दोपहर में रीता जी हेड फोन लगाये आंख मूंदे बिस्तर पर बहुत देर से लेटी थीं। मैंने कहा – नींद में हो या जाग रही हो। हेड फोन तो उतार दो।

दोपहर में रीता जी हेड फोन लगाये आंख मूंदे बिस्तर पर बहुत देर से लेटी थीं।

उन्होने उत्तर दिया – सो नहीं रही हूं। सुन रही हूं, तीन ताल वालों को।

पाणिनि आनंद। दो-दो अंगूठी पहने तांत्रिक टाइप बाबा लगते हैं।

तब मुझे लगा कि पाणिनि अपनी साख रिस्टोर कर पाने में सफल रहे हैं। पाणिनि पण्डित पर ताजा टिप्पणी थी उनकी – “नहीं, गड़बड़ नहीं है बंदा। धाराप्रवाह बोलते हैं, अच्छा बोलते हैं। बलबलाते नहीं। भड़भड़िया नहीं हैं। विचारों से सहमत होना, न होना अलग बात है।… अब इतना बोलते हैं तो कहीं कहीं फिसलना हो ही सकता है। पिन चुभोने के लिये इंजीनियर्स को निशाने पर लिया था, वह क्लियर दिखता है। बाकी, टीआरपी वाला चक्कर भी हो सकता है।” कुल मिला कर पाणिनि के बारे में विचार में वी शेप रिकवरी।

मैंने पूछा – बाकी दो लोगों (तीनतालियों) के बारे में क्या विचार है?

कुलदीप मिश्र। तीन ताल के सूत्रधार।

“सुटकहवा (पतला दुबला) तो बाकी दो हैवीवेट वालों को सम्भालने में ही हैरान परेशान दिखता है। है वो पढ़ा लिखा। चण्ट भी है। दोनो बाकी लोगों के दबाव में नहीं दिखता। पर उसका रोल जैसा है, उसके हिसाब से उसे बैलेंस बनाना पड़ता है। उतना खुल कर नहीं खेल पाता।”

“और कमलेश किशोर सिंह?”

“उनके बारे में तो सोच बनाने के लिये कुछ और सुनना पड़ेगा। नब्बे परसेण्ट तो पाणनियई हथिया लेते हैं। उनको ध्यान से सुनें तब ओपीनियन बनायें।” – उन्होने उत्तर दिया।

कमलेश किशोर सिंह। आजतक रेडियो के महंत।

कमलेश किशोर महंत हैं। उन्हे पाणिनि को नब्बे परसेण्ट से पचहत्तर परसेण्ट के कोटा पर सिमटने को कहना चाहिये। खाली हुये पंद्रह परसेण्ट में अपना आभा मण्डल बनाना चाहिये – यह मेरा नहीं, मेरी पत्नीजी का आशय है! :lol:

(तीनों तीन तालियों के चित्र जूम के स्क्रीन शॉट हैं।)


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