जमुना मोची से चप्पल खरीदी, और सीखा भी!


कुछ दिन पहले जमुना की गुमटी पर गया था, चप्पल चमकवाने। उस समय जमुना से फरमाइश की थी एक नये चप्पल की। जमुना ने बताया था कि वह पटना जा रहा है और तीन चार दिन में नया स्टाक ले कर आयेगा। तब उपलब्ध होगी चप्पल।

जमुना के बारे में 25 मार्च की ट्वीट

होली के बिहान से महराजगंज कस्बे की ओर साइकिल मुड़ गयी। अपेक्षा नहीं थी कि जमुना की गुमटी खुली होगी। पर जमुना काम पर बैठा मिला सवेरे साढ़े सात बजे। वह ब्लॉग का एक सशक्त चरित्र है। अपनेे गांव (छपरा जिला में हैै गांव) हो कर आया था। नाते रिश्ते वाले वहां जूता चप्पल बनाते हैं। उन्ही से सामान ला कर बेचता है।

जमुना

“खुद क्यों नहीं बनाते नये जूते, चप्पल?”

“अभी आंख का ऑपरेशन कराया है। दो महीने तो सारा काम बंद था। अब नजर कमजोर होने से लगता है कि नया जूता बनाना हो नहीं पायेगा। यहां घर पर जूता बनाने की सब मशीन और औजार हैं। पर नया काम करना बंद कर दिया है। लड़के भी वह करने में रुचि नहीं रखते। अब छपरा से ला कर यहां बेचने में ज्यादा ठीक लगता है।” – जमुना ने बताया।

“कितने का सामान लाये हो छपरा से?”

“करीब चालीस हजार का। कुछ यहां गुमटी में है पर ज्यादा तो घर पर रखा है।”

जमुना ने बताया कि उनकी पैदाइश सन 1942 की है। अर्थात उम्र 78 साल की तो हो गयी। मुझसे बारह साल बड़े हैं जमुना और फिर भी इतना काम करते हैं! अभी आठ दस घण्टा गुमटी पर मरम्मत की काम में लगे रहते हैं। उनके काम करने के तरीके या उनकी आवाज में उद्वेग नहीं है। बोलते धीरे धीरे हैं और उसी तरह काम में स्थिर भाव से लगे रहते हैं। कोई हड़बड़ाहट या जल्दीबाजी नहीं। संत रैदास भी शायद इसी स्थिर और एकाग्र भाव से काम करते रहे होंगे।

उनके चार लड़के हैं। एक तो पास में जूता चप्पल मरम्मत का काम करता है। एक और बाजार में जूते की दुकान पर काम करता है। सभी बच्चे कमाते हैं पर रहते एक ही घर में हैं। चूल्हा एक ही जलता है।

जमुना बताते हैं कि उन्हे जोड़े रहने के लिये भाईचारे के अलावा पैसे की मजबूती चाहिये। अभी उनमें पौरुष है। पैसा उनके हाथ में है, जिससे परिवार एक साथ है।

“कितने साल और काम करने का इरादा है?”

जमुना ने दायें हाथ की तर्जनी ऊपर दिखा कर कहा – “जितना ईश्वर करायें।”

मैंने फिर भी पूछा – अपने हिसाब से कितना सोचते हैं कि कर पायेंगे?

“अपने दम खम से तो चाहूंगा कि बीस साल और ऐसे ही काम करूं।” – जमुना ने कहा। मैं आश्चर्य चकित रह गया। हम लोग दुनियां के पांच सात ब्लू-जोंस की बात पढ़ते हैं, जहां लोग 95-100 की उम्र के आसपास प्रसन्न और कर्मरत रहते हैं। इकीगाई (Ikigai) नामक पुस्तक में ओकीनावा (जापान), सार्डीना (इटली), लोमा लिण्डा (केलीफोर्निया), निकोया पेनिंसुला (कोस्टारिका) और इकारिया (ग्रीस) का नाम लिया गया है जहां लोग सौ साल से ज्यादा जीते हैं। और यहां पास में कस्बे में यह 78 साल का मोची दिन में काम में लगा रहता है और सम भाव से जीते हुये बीस साल और काम में लगे रहने की कल्पना करता है। उसे अपना इकीगाई (जीवनोद्येष्य) भी स्पष्ट है – अपने परिवार को अपनी आर्थिक कीली पर साधते हुये एकजुट रखना।

Ikigai पुस्तक से एक हाइलाइट किया अंश

दीर्घ जीवन (जिसकी हम सब कामना करते हैं) के लिये आवश्यक तत्व हैं – भोजन, व्यायाम, जीवन का ध्येय तलाशना और परिवार तथा समाज में पक्का जुड़ाव। और इनमें से बहुत कुछ तो जमुना की लाइफ-स्टाइल में नजर आता है।

मैं जमुना से यह सुन कर इतना प्रसन्न हुआ कि उनके कंधे अपने हाथों में ले कर हल्के से दबाये। अगर जमुना अपनी गुमटी की सीट पर बैठे नहीं होते तो उन्हें गले से लगा लेता; फिर भले गांवदेहात के लोग वर्णव्यवस्था की कसौटी पर मुझे घटिया बताते रहते। एक व्यक्ति अगर 98 साल में इसी तरह कार्यरत रहने की सोच रखता है, तो वह मेरा गुरु सरीखा हुआ। बहुत कुछ सीखना होगा जमुना से। पहला तो यही सीखना है कि रोज 6-8 घण्टा काम करने का रुटीन बनाया जाये। अपना शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य सही रखा जाये और जमुना की तरह जीवन का एक ध्येय तलाशा जाये!

सम भाव से काम में जुटे रहते हैं जमुना। उम्र 78 साल।

ऐसा नहीं है कि जमुना के जीवन में तनाव नहीं हैं। चार बेटों के परिवार को एक जगह रखने के प्रयत्न में कभी कभी तनाव होता है। अभी मई महीने में नातिन की शादी पड़ी है। उसमें, बकौल जमुना, कम से कम चार लाख खर्च होगा ही। उसके इंतजाम का तनाव है। पर वे अपनी दिनचर्या बताते हैं। तीन-चार बजे के बीच उठ जाते हैं। सुरती खा कर शौच के बाद नहा लेते हैं। पूजा पाठ के लिये उन्होने अपनी गुमटी में लगी भक्त रैदास महराज का चित्र दिखाया। सवेरे अपनी गुमटी में बैठने के पहले सैर करते हैं। उसके बाद गुमटी पर बैठने के बाद उठना नहीं होता। “ग्राहक आते जाते रहते हैं, तो कैसे उठ सकता हूं।”

जमुना का सबसे बड़ा लड़का टेण्ट हाउस और जूता चप्पल की दुकान पर काम करता है। दूसरा लड़का बम्बई में है। तीसरा सहदेव गुमटी पर साथ बैठता है और चौथा भी यही काम करता है।

जमुना का लड़का सहदेव और जमुना, गुमटी पर

जमुना ने मुझे चप्पल दिखाये। मेरे नाप के चप्पल को एक बार और साफ किया और पॉलिश रगड़ा। एक पॉलीथीन में रख कर मुझे दिया। मैंने बिना मोलभाव के जितना जमुना ने मांगा, उतना दाम दिया। उन्होने बताया – “पहले आप 250 में ले कर गये थे चप्पल। अब दाम बढ़ गये हैं। अब आप बीस रुपया ज्यादा कर दे दीजिये।”

जमुना से खरीदी चप्पल

दो सौ सत्तर में चमड़े की चप्पल और दीर्घायु के बारे में जमुना के एक प्रत्यक्ष उदाहरण से सीख – सौदा बुरा कत्तई नहीं रहा। गर्मी के मौसम में जूता पहनने की बजाय चप्पल पहनना ज्यादा सहूलियत वाला होता है और पुरानी चप्पल दस साल चल चुकी थी।


नन्हकी


सवेरे घूम कर घर लौटा तो देखा वह बैठी थी। बुढ़िया है। लाठी टेकती आती है। पास के गांव पठखौली की है। उसे दिखता भी कम है और सुनाई तो लगभग पड़ता ही नहीं। इन दोनो कमियों की भरपाई वह अनवरत बोल कर करती है।

होली के बिहान से नन्हकी आयी थी

दो-तीन महीने में एक बार चली आती है। कुछ अनाज और पैसे की मांग करती है। उससे पूछना कठिन है – सुनती नहीं।

वह हर बार मेरी पत्नीजी को यह बताती है कि बचपन में उन्हें गोद में खिला रखा है। वह अपना हाथ उठा कर बताती है – “तूं हेतना बड़ क रहू, तब से खेलाये हई (तुम इतनी बड़ी थी, तब से खिलाया है)।”

“तूं हेतना बड़ क रहू, तब से खेलाये हई (तुम इतनी बड़ी थी, तब से खिलाया है)।”

पत्नीजी को उसकी कोई पुरानी स्मृति नहीं है। पर उसके कहे को वे सच मान लेती हैं। उसे कुछ न कुछ देती हैं। पर नन्हकी संतोषी जीव नहीं है। जो उसे मिलता है, उसे हमेशा कम बताती है। कुछ और या किसी और चीज की मांग करती है। जल्दी हिलती नहीं। हार कर उसे “कुछ और” दिया जाता है। कई बार फिर भी वह नहीं जाती तो उसकी उपेक्षा की जाती है। अंतत: चली जाती है। मांगने में जिस धैर्य और जिस पर्सिस्टेंस (persistence) की जरूरत होती है, वह उसमें है। नन्हकी एक कुशल मंन्गन (भीख मांगने वाली) है।

नोट खतम हो गये थे तो उसे चिल्लर में दिये। वे पैसे उसने ध्यान से गिने।

आज उसे होली की गुझिया दी। साथ में पच्चीस रुपये। घर में छोटे नोट खतम हो गये थे तो उसे चिल्लर में दिये। वे पैसे उसने ध्यान से गिने। एक रुपये और दो रुपये के सिक्के एक जैसे होते हैं। उन्हे ध्यान से देखना होता है। नन्हकी ने वह भी किया। यह स्पष्ट हुआ कि पैसे गिनना और जोड़ना उसे बखूबी आता है।

पैसे गिनने पर उसने असंतोष व्यक्त किया। अंतत: उसे दस रुपये और दिये गये। फिर उसने दाल की मांग की। उस मांग को अनसुना किया गया। बताया गया कि अभी दाल नहीं है। फिर कभी आना। यह उसने सुना नहीं। पर समझ आ गया कि आज जितना मिला है, उससे ज्यादा मिलने वाला नहीं।

नन्हकी

उसके बारे में पता किया। घर बार है उसका। वह “राधे की माई” है। बच्चे हैं। कमाते हैं, वैसे ही जैसे गांवदेहात के और दलित कमाते हैं। घर की आर्थिक दशा खराब नहीं है। कमजोर है – पर उतनी जितनी औरों की है। पेंशन आदि पाती होगी। अभी उसका प्रधानमंत्री आवास योजना में आवास स्वीकृत हुआ है और मकान बन भी रहा है।

नन्हकी दबंग है। अपनी और औरों की समस्या ले कर तहसील, बैंक आदि जगह चली जाती है। किसी अधिकारी या पुलीस वाले से बात करने में उसे कोई हिचक नहीं। “दरोगा हमार का कई ले (पुलीस मेरा क्या कर लेगी?!)।” – ऐसा कहती है (लोगों ने बताया)।


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राजकुमार (मेरे घर में काम करने वाली कुसुम का पति) बताता है कि ‘नन्हकी मावा’ को मांगने की जरूरत नहीं है। वह मांगती इसलिये है कि मांगना उसकी आदत बन गयी है।

नन्हकी जैसे चरित्र गांवदेहात में (और शहरों में भी) बहुत हैं। भारत भिक्षा प्रधान देश है। मांगने और देने वाले अभी तो प्रचुर संख्या में हैं, बावजूद इसके कि सामाजिकता की कसौटियां बड़ी तेजी से बदल रही हैं।

जो धर्म कर्म शेष है, उससे नन्हकी जैसों की जिंदगी तो कट ही जायेगी।


ट्विटर पर टिप्पणी –



Shef जी ने टिप्पणी में और जोड़ा – + heartening to know govt schemes r reaching ppl like her – kahin to tax payer money theek se use hua

पिछला साल प्रसन्नता के लिये कैसा रहा?


देशों की प्रसन्नता की रैंकिंग का समय है। आप 2021 की रिपोर्ट यहां से डाउनलोड कर सकते हैं।

प्रसन्नता जीवन का अनिवार्य घटक है। शायद समृद्धि से अधिक चाह प्रसन्नता की होती है। एक सीमा तक समृद्धि प्रसन्नता को बढ़ाती है या विपन्नता मनुष्य को अप्रसन्न करती है; पर उससे आगे, समृद्धि और प्रसन्नता में सीधा समीकरण नहीं रहता। पिछले एक साल में बहुत उथल-पुथल रही। शायद ज्ञात इतिहास में सबसे अलग रहा यह साल। कोरोना संक्रमण की व्यापकता और उससे निपटने के नये तरीकों से अर्थव्यवस्था, समाज और व्यक्ति बहुत प्रभावित हुये। इस दौरान कई देश बुरी तरह लड़खड़ाये। कई – या सभी – अर्थव्यवस्थायें सिकुड़ीं। कई देशों में लोग दुखी हुये और कई में प्रसन्नता का स्तर बढ़ा भी।

प्रसन्नता की इस रिपोर्ट के आधार पर द इकॉनॉमिस्ट में एक लेख है – इट माइट सीम क्रेजी। उसमें यह बताया गया है कि आंकड़े बताते हैं विश्व कोरोना काल में भी लगभग उतना ही प्रसन्न रहा, जितना पहले था। 0-10 के स्केल में प्रसन्नता का स्तर विश्व में 2017-19 में 5.81 था जो मामूली सा बढ़ कर 5.85 बन गया 2020 में। कोरोना काल में उम्रदराज लोग ज्यादा सुखी बने और कुछ राष्ट्रों में प्रसन्नता कम हुयी पर कुछ अन्य में बढ़ी।

द इकॉनॉमिस्ट का एक अंश का स्क्रींशॉट
प्रसन्नता और अप्रसन्नता वाले देश

आंकड़ों में डेनमार्क, स्वीडन, ब्रिटेन, मैक्सिको, दक्षिण कोरिया, कोलम्बिया, रूस, जिम्बाब्वे और ब्राजील में प्रसन्नता 2017-19 की तुलना में 2020 वर्ष में कम हुई। फिनलैण्ड, आईसलैण्ड, जर्मनी, अमेरिका, ताईवान, स्पेन, जापान, चीन, दक्षिण अफ्रीका, भारत और तंजानिया में प्रसन्नता में वृद्धि दर्ज हुई।

अधिक प्रसन्न देशों में प्रसन्नता इस बात से रही कि वहां कोरोना संक्रमण अपेक्षाकृत कम प्रभाव डाल पाया या कोरोना के कम प्रभाव में प्रसन्नता भी एक कारक है? यह किसी अध्ययन का हिस्सा नहीं रहा। पर मोटे तौर पर यह तो माना ही जा सकता है कि कम तनाव वाले लोग, अधिक प्रसन्न रहने वाले लोग किसी भी आपदा, किसी भी संक्रमण से कहीं अधिक सफलता से निपट सकते हैं।

[…]

उस दिन मेरे अलावा चार लोग एक कमरे में बैठे थे। मेरी पत्नी (61वर्ष), बिटिया (37वर्ष), नाती (12 वर्ष) और मेरी सलहज (48वर्ष)। क्रमश: रीता पाण्डेय, वाणी पाण्डेय, विवस्वान पाण्डेय और निधि दुबे। मैंने उन चारों से लॉकडाउन के दौरान उनकी प्रसन्नता को ले कर सवाल किये। उत्तर विविध प्रकार के मिले –

निधि दुबे
निधि दुबे

लॉकडाउन में हमारी प्रसन्नता तो बहुत ज्यादा बढ़ी। सब एक साथ रहे। घर पर रहे। घर में अच्छा बनाये और अच्छा (स्वास्थ्यवर्धक, सुस्वादु) खाये। बाहर के खाने से जो रुग्णता (पेट में दर्द, अपच आदि) होती थी, वह नहीं रही। खर्चा कम हुआ। भागमभाग नहीं थी जिंदगी में। घर के हर एक मेम्बर में साफसफाई की आदत पड़ी। “मेरा तो मानना है कि हर साल कम से कम दस दिन का लॉकडाउन घोषित होना ही चाहिये।”

विवस्वान पाण्डेय
विवस्वान पाण्डेय

विवस्वान ने कहा कि वह बहुत दुखी रहा। बाहर निकल ही नहीं पाया। घर में बंद बंद। न मॉल जा पाया, न किसी रेस्तराँ में। यह अच्छा था कि स्कूल बंद थे। घर पर ऑनलाइन पढ़ाई बेहतर है स्कूल की क्लास में बैठने की बजाय। पर बाहर निकलने पर मनाही बहुत खराब बात रही।

वाणी पाण्डेय
रीता पाण्डेय (बांये) और वाणी पाण्डेय

वाणी पाण्डेय के अनुसार यह बहुत शानदार अनुभव था। कोई ‘बंद-बंद’ जैसा अहसास नहीं। पानी जब स्थिर हो जाता है तो उसकी तलहटी तक सब साफ साफ दिखता है। वैसी स्वच्छता का अहसास मिला लॉकडाउन काल में। अपनी सिचयुयेशन, अपनी क्षमता, अपनी औकात समझ आयी। फालतू की भागमभाग से निजात मिली। गरीबों को, जरूरतमंदों को खूब खिलाया और खूब बांटा। यह समझ में आ गया है कि जिंदगी की प्राथमिकतायें बदलनी चाहियें!

अच्छा-बुरा दोनो रहा यह काल। कई अनुभव हुये। “रानी (नौकरानी) हमारी सब तरह की मदद के बावजूद छोड़ कर चली गयी, जब हमें बहुत जरूरत थी। और बाद में अपने से वापस भी आयी।” यह महसूस हुआ कि लोगों को समझने परखने में सावधानी बरतनी चाहिये और जरूरी लोगों के साथ समय व्यतीत करना चाहिये।

रीता पाण्डेय

अभूतपूर्व रहा यह समय। याद रहेगा। कोई प्रदूषण नहीं था। हवा साफ थी। धूल का नामनिशान नहीं था। गंगाजी का पानी निर्मल हो गया था। रुटीन सेट हो गया था। घर में नये नये प्रयोग किये। अपनी बगिया को व्यवस्थित किया। नयी नयी हॉबी बनाई और उनपर समय दिया। मन की व्यग्रता कम हुई। गांव में थे तो कोरोना के प्रति सतर्कता जरूर थी; पर उतना भय नहीं था जितना शहरों में था। गांव की जिंदगी तो लगभग सामान्य चली।


इस प्रकार की प्रतिक्रियायें हर व्यक्ति, हर परिवार से मिल सकती हैं। मुझे तो निधि की बात सबसे अच्छी लगी – हर साल में दस दिन का कम्पल्सरी लॉकडाउन तो होना ही चाहिये। यह लॉकडाउन जरूरी नहीं कि सरकार व्यापक तौर पर जारी करे। व्यक्ति या परिवार अपने स्तर पर एकांतवास या अरण्य में समय व्यतीत करने का अनुभव तो कर ही सकता है। अपने आप को ‘एनुअल रीचार्ज’ करने के लिये वैयक्तिक लॉकडाउन का प्रयोग बहुत उपयोगी साबित हो सकता है।

Photo by Jonathan Borba on Pexels.com

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