जंगर चोरई नहींं करता मैं – रामसेवक


रामसेवक 51 साल के हैं। उनकी बेटी की शादी हो गयी है। दो लड़के हैं, जो गांव में ही अपने अपने हिसाब से काम करते हैं। कोचिंग करना, जूते चप्पल की दुकान रखना और सब्जी का धंधा करना उनके व्यवसाय हैं। बड़े लड़के की शादी हो गयी है। उसकी पत्नी भी सिलाई कर अर्जन करती है। पूरे परिवार में कोई दुर्गुण नहीं है। अपने काम से काम रखने वाला परिवार। घर के सभी लोग काम में लगे हैं तो (अपेक्षाकृत) सम्पन्नता भी है। रहन सहन और पास पड़ोस से बेहतर है।

Ramsevak gardener
“मेरा शरीर पतला है, इसलिये मेहनत करने में दिक्कत नहीं होती।” – रामसेवक

रामसेवक खुद रोज बनारस जाते हैं। कई बंगलों और फ्लैट्स में बागवानी का काम देखते हैं। हर घर से समय तय है। नियत समय पर वहां पंहुचते हैं और पूरे समय काम में लगे रहते हैं। सवेरे आठ बजे के आसपास घर से निकल कर बस या ऑटो पकड़ने के लिये हाईवे की ओर जाते देखता हूं बहुधा। शाम के समय तीन साढ़े तीन बजे बनारस से वापस निकल देते हैं। पहले जब हाईवे पर फ्लाईओवर के काम चल रहे थे तो दो दो घण्टे जाम में लग जाते थे। अब, वाराणसी-प्रयाग नेशनल हाईवे का काम पूरा हो जाने के बाद, समय पर सांझ होने के पहले घर वापस आ जाते हैं।

रामसेवक हमारे घर रविवार की सुबह दो-तीन घण्टे बागवानी का काम देखते हैं। उनके आने से घर के पौधे जीवंत हो उठे हैं। अभी कोहरे के कारण फूल कुछ दब गये हैं, पर वैसे हमारी बगिया चमक गयी है।

रामसेवक हमारे लिये खुशियाँ लाते हैं!

छरहरे बदन के रामसेवक जब से आते हैं, काम में ही लगे रहते हैं। एक काम निपटाते ही दूसरा पकड़ लेते हैं। शायद मन में सोच कर रखते हैं कि यह करना है और उसके बाद इस चीज का नम्बर है। घर परिसर में एक जगह से दूसरी पर जाना हो तो फुर्ती से जाते आते हैं। जैसे कैसियस क्ले (मुहम्मद अली) को बॉक्सिंग का बटरफ्लाई कहा जाता था, रामसेवक बागवानी के बटरफ्लाई हैं।

“उन्होने काम जांचने को सीसीटीवी कैमरे लगा रखे हैं। दफ्तर से आने के बाद अपने कम्यूटर पर देख लेते होंगे कि कहां क्या काम हुआ है। वर्ना उनसे ज्यादा बातचीत नहीं होती। अपने हिसाब से काम करता रहता हूं। समय पूरा देता हूं। जंगर चोरई नहीं करता।”

“बनारस में लोग, जिनके यहां आप काम करते हैं, आपके काम में साथ साथ रहते हैं?”

“नहीं। उनके पास समय ही नहीं है। बाग बगीचे की जानकारी है। यह जानते और बता देते हैं कि क्या कहां लगना चाहिये। पर साथ साथ लगने के लिये समय नहीं है। उन्होने सीसीटीवी कैमरे लगा रखे हैं। दफ्तर से आने के बाद अपने कम्यूटर पर देख लेते होंगे कि कहां क्या काम हुआ है। वर्ना ज्यादा बातचीत नहीं होती। अपने हिसाब से काम करता रहता हूं। समय पूरा देता हूं। जंगर चोरई (जांगर – पौरुष/श्रमशीलता। जंगर चोरई – काम से जी चुराने की आदत) नहीं करता।” रामसेवक बताते हैं। “मेरा शरीर पतला है, इसलिये मेहनत करने में दिक्कत नहीं होती।”

“मेरे ख्याल से इसके उलट बात है। आप काम में लगे रहते हैं। काहिली नहीं दिखाते। इसी लिये शरीर इकहरा है। नहीं तो शरीर पर चर्बी चढ़ जाती और काम करने में फुर्ती नहीं रहती।”

जैसे कैसियस क्ले (मुहम्मद अली) को बॉक्सिंग का बटरफ्लाई कहा जाता था, रामसेवक बागवानी के बटरफ्लाई हैं।

लम्बा अर्सा हो गया, रामसेवक की पत्नी के देहावसान को। “तब बच्चे छोटे छोटे थे। मैंने सोचा कि अगर दूसरा विवाह किया तो इन बच्चों की जिंदगी बरबाद हो जायेगी। इसलिये मैंने अपना ध्यान काम करने और बच्चों को पालने में लगाया। पहले मैं यहीं गांव में कोचिंग करता था। फिर बनारस जा कर साइकिल पर टोकरी में ले कर गली गली पौधे बेचना शुरू किया। लोग पौधों के बारे में और उन्हे कैसे लगाया जाये, इसके बारे में पूछते थे। कुछ लोगों ने कहा कि उनके बगीचे में काम कर उसे ठीक करूं। वह मुझे ज्यादा रुचा। तब टोकरी में पौधे ले कर गली गली बेचने की बजाय यह काम शुरू किया जो आज कर रहा हूं।”

रामसेवक के बारे में मैंने सबसे पहले 13 जुलाई 2020 को लिखा था –

आज राम सेवक जी से संपर्क किया। गांव में मेरे पड़ोसी हैं। वाराणसी में बंगलों पर माली का काम करते हैं। ट्रेनें नहीं चल रहीं तो साइकिल से आते जाते हैं। रविवार ही गांव में बिता पाते हैं।
उन्होंने मान लिया है कि रविवार को समय दे कर मेरे अरण्य को मेनिक्योर करेंगे।
#गांवदेहात

13 जुलाई 2020 को लिखे के साथ चित्र।

तब से अब तक छ महीने हो गये हैं। अरण्य अब उपवन बन गया है। उपवन से बेहतर उपवन की दिशा में कार्यरत हैं रामसेवक। वे अपने हिसाब से बनारस से खरीद लाते हैं फूलों के पौधे, गमले या अन्य उपकरण। मेरी पत्नीजी उनके साथ लगी रहती हैं। पौधों, वृक्षों को पानी देना, धूप में रखना या बचाना आदि नियमित करती हैं। मेरी पोती चिन्ना पांड़े भी रामसेवक अंकल से पूछने के लिये अपने सवाल तैयार रखती है। “जब वे रविवार को आयेंगे तो उनसे ये सब पूछना है।” रामसेवक अंकल को अपना मित्र समझती है।

मैंने रामसेवक जी के बैंक अकाउण्ट का विवरण ले रखा है। मेरा बागवानी में योगदान केवल रामसेवक जी के अकाउण्ट में उनका महीने का पेमेण्ट और उनके लाये सामान का पैसा देना भर है। यदाकदा उनके चित्र लेता हूं और उनसे बात करता हूं। वे मेरे ब्लॉग के काम के हैं।

रामसेवक के आने के बाद अरण्य अब उपवन बन गया है।

मुझे यकीन है कि रामसेवक जी से हमारा सम्बंध चिरस्थायी होगा।


दूसरी पारी – माधोसिंह रेलवे स्टेशन पर ट्रांजिट


अक्तूबर 2015 के पहले दिन मैं रिटायर होने के बाद पहले दिन, सपरिवार, माधोसिंह रेलवे स्टेशन के रेस्ट हाउस पंहुचा।

हम माधोसिंह के रेस्ट हाउस में आ गये थे। गांव में रहने के जो सपने बुने थे, वे पहले ही दिन से धूमिल होने लगे। माधोसिंह स्टेशन पर मुझे जो मिले वे रेलवे के ही लोग थे। स्टेशन मास्टर साहब, उनके चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी और टी आई भोलाराम जी। उन सब ने बड़ी फुर्ती से हमारा सामान उतरवाया और हमें रेस्ट हाउस ले कर गये। कोई लोकल, कोई गांव वाला, कोई संबंधी नहीं थे। यह स्वप्न था कि गांव हमें बांहे फैला कर स्वागत करेगा, वैसा कुछ नहीं था वास्तविकता में। भविष्य एक जीर्ण शीर्ण ताल सा लगा, जिसमें काई की मोटी परत थी और जिसे हमें दोनो हाथ से हटा कर पानी चीरते हुये अपना रास्ता बनाना था।

हमने वैसे ही किया।

और, सोचने पर लगता है कि सारी जिंदगी रेल को समर्पित कर अपनी गांव-देस, नाते रिश्ते, सम्बंध सब को ठेंगे पर रख कर काटने के बाद अगर मैं अपेक्षा करता था कि गांव हमें “बांहे फैला कर स्वागत” करेगा; तो वह एक निहायत मूर्खतापूर्ण आशावाद था। हम पूरी नौकरी में दोनो हाथ पैसा पीटे होते और सम्पन्नता में सगे सम्बंधियों को “पाले” होते, तब भी शायद लोग आगे की आशा में आपके आगे पीछे घूमते। हमने तो दशकों से न सामाजिकता निभाई थी, न सम्पन्नता अर्जित की थी। हमें तो आगे भी अपना जीवन, अपना रास्ता, अपने तरीके से जीने की जद्दोजहद करनी थी। दूसरी पारी में रिटायरमेण्ट का रोमाण्टिसिज्म नहीं था, एक ठोस यथार्थ आगे था, जिसे हमें फेस करना था और अपनी शर्तों पर, अपने तरीके से गांव में रहना था।

दो दिन बाद हमने अपने सम्बंधियों – मूलत: अपने तीनों साले साहब और उनके परिवार को माधोसिंह रेस्ट हाउस में आमंत्रित किया। वे सभी आये। हमने रेस्ट हाउस में भोजन का इंतजाम किया। लगभग चार पांच घण्टे उन्होने हमारे साथ व्यतीत किये। मेरी बिटिया-दामाद-नाती और बेटा-बहू-पोती भी पंहुचे। अकेले होने की जो मायूसी पहले दिन हुई थी, वह काफी हद तक दूर हुई।

दो अक्तूबर – रेस्ट हाउस में एकत्र परिवार की महिलायें और बच्चे।

माधोसिंह से कटका पिछला ब्लॉक स्टेशन है। सड़क से जुड़ा हुआ। स्टेशन से 300 कदम पर वह जगह है जहां हमारा मकान बन रहा था। हमें वहां रोज बनते मकान को देखने जाना था। कोई वाहन नहीं था। अंतत: एक ऑटो वाले से बात की। हर रोज का भाड़ा तय किया। वह हमें माधोसिंह से कटका के हमारे मकान तक ले जाने और वापस रेस्ट हाउस में लाने वाला था। बड़ा भला नौजवान था वह। ऑटो में आना जाना भी एक अनुभव था। दशकों से कार या रेलवे के व्यक्तिगत सैलून की प्राइवेसी के अभ्यस्त हो गए थे, तो रोज ऑटो की यात्रा परिवर्तन की शुरुआत थी।

autorickshaw at madhosingh railway station
इसी तरह का ऑटो रिक्शा रोज के किराये पर तय किया हमने। कार और रेलवे सैलून से बिल्कुल अलग तरह का साधन।

हम लोग सवेरे रेस्ट हाउस में नाश्ता कर निकलते थे। दोपहर का भोजन – पराठां सब्जी साथ में टिफन में ले जाते थे। और शाम चार बजे वापस रेस्ट हाउस आ जाते थे। हमारे जाने से मकान बनने की गति बेहतर हो गयी थी – या कम से कम हमें वैसा लगा।

वहां पहले दिन जाते हुये गांव की सड़क पर एक मोटा सा सांप दिखा। धीरे धीरे चलता हुआ। ऑटो रोक कर उसे ध्यान से देखा। डर भी लग रहा था कि गांव का जीवन भी क्या विकट है। पहले ही दिन सांप के दर्शन हुये, वह भी सड़क पर सरेआम घूमते। खैर, वह सांप क्या, गूंगी थी। सैण्ड बोआ। निरीह सांप। लोगों ने बताया कि उसका दिखना शुभ शकुन है। धन सम्पदा की वृद्धि होती है। इसी में हम प्रसन्न हुये! अन्यथा एकबारगी लगा कि किस अरण्य में अपनी रिहायश बना ली है। उसके बाद सांप बहुत बार दिखे और भयानक लगने वाले भी। ऐसा नहीं कि रेल सेवा के दौरान सांप न दिखे हों, पर अब उनके दिखने की आवृत्ति बढ़ गई थी।

रोज रोज कटका/विक्रमपुर आना और बनते हुये मकान को देखना शुरू में अच्छा लगा। फिर तो एक रुटीन सा हो गया। मानो दफ्तर जाना और वहां से लौटना हो। कटका की बजाय माधोसिन्ह स्टेशन का जीवन ज्यादा रसमय था। सवेरे साइकिल ले कर मैं स्टेशन प्लेटफार्म की तीन चार चक्कर लगाता था। एक चाय की ट्रेन में वेण्डिंग करने वाले व्यक्ति हरिहर से मुलाकात हुई। स्टेशन के दूसरी ओर किसी रेलवे क्वार्टर में वह चाय बनाता था। चौरी चौरा एक्स्प्रेस के समय पर प्लेटफार्म पर आता था और उसी ट्रेन में इलाहाबाद सिटी तक जा कर रास्ते भर चाय बेचता था।

harihar tea vendor
Harihar, tea vendor

पहले दिन मुझे देख कर वह चौंका। एक अपरिचित, बाहरी व्यक्ति लगा। फोटो खींचते देख उसे यह भी लगा कि मैं किसी मुसीबत में डाल सकता हूं, उसको। उसने प्रतिवाद भी किया। पर बाद में और लोगों से मेरे बारे में पूछा होगा। अगले दिन उसने नमस्कार कर मुझे एक कुल्हड़ चाय भी पिलाई। मुझे उस चाय का पैसा देने में भी दिक्कत हुई। वह ले नहीं रहा था।

वह मेरा मित्र बन गया। रोज सवेरे तैयारी से आता था। साफ सफेद कुर्ता-पायजामा और एक जैकेट। जेब में करीब 200 रुपये की रेजगारी। एक कुल्हड़ की डालिया और एक चाय का टोंटी लगा ड्रम – यह उसका किट होता था। एक दिन वह चाय का ड्रम और कुल्हड़ के बिना प्लेटफार्म पर दिखा तो पता चला कि दो किलो दूध की चाय बना रहा था पर दूध फट गया। बड़ा ‘नुस्कान’ हो गया। उसके नुक्सान से मुझे भी मायूसी हुई।

अब पांच साल बाद भी मन होता है माधोसिंह स्टेशन जा कर हरिहर के बारे में तहकीकात करूँ और मुलाकात करूँ।

harihar and gyan dutt pandey
हरिहर के साथ मैं

माधोसिंह कालोनी के एक अंत पर मुझे एक टर्नटेबल के अवशेष दिखे। यहां चील्ह से माधोसिन्ह तक एक नैरो गेज की रेल लाइन हुआ करती थी। उसका स्टीम इंजन यहां आ कर टर्न हुआ करता था। चील्ह से गंगा उसपार मिर्जापुर बिंध्याचल से यात्री माधोसिंह आया करते थे। यहां उन्हें मुख्य लाइन की इलाहाबाद और मऊ या गोरखपुर अथवा बलिया/गाजीपुर की ओर जाने को गाड़ियां मिलती थीं। उसके अलावा मिर्जापुर से तांबे या पीतल के बर्तन भी आया करते थे। उनका माधोसिंह में यानांतरण (Transshipment) होता था।

माधोसिंह-चील्ह रेल लाइन के इंजन को टर्न करने के लिये यहां टर्न-टेबल थी। स्टीम इंजन यहां घूम कर अपनी दिशा बदलता था।

उस रेल लाइन की अपनी संस्कृति थी, अपना अर्थशास्त्र। रेलवे के लिये वह यातायात, बदलते समय के साथ मिर्जापुर का शास्त्री पुल बनने, पीतल का उद्योग खत्म हो जाने और सड़क यातायात विकसित होने से घाटे का सौदा हो गया और वह लाइन कालांतर में खत्म कर दी गयी। ध्यान से देखने पर मुझे माधोसिंह मेंन प्लेटफार्म की बगल में एक बे-प्लेटफार्म (bay-platform) की जगह और कोचों में पानी भरने के लिये लगे वाटर फिलिंग कॉलम भी दिखे। अभी भी कुछ अवशेष बचे थे पुराने सिस्टम के।

पुराना, परित्यक्त पम्प हाउस

पहले, जब चील्ह तक की रेल लाइन थी और बहुत सा पार्सल यातायात भी था, माधोसिंह की रेल कॉलोनी निश्चय ही आज से बड़ी रही होगी। यहां ट्रेन ड्राइवर, गार्ड और ट्रेन परीक्षण के कर्मचारी भी रहते होंगे। ट्रेनों को और कॉलोनी को बिजली पानी की कहीं अधिक आवश्यकता होती होगी। स्टीम इंजन यहां वाटर कॉलम पर पानी लेते होंगे और उसके कारण ट्रेनें यहां 15-20 मिनट रुकती होंगी। उस समय बहुत से चाय-भजिया-पकौड़े समोसे या भोजन की दुकानें/स्टॉल भी होते होंगे। आज तो स्टेशन उस उजड़े चमन का कंकाल भर ही रह गया है। मुझे वहां एक भूतिया पम्पहाउस का अवशेष भी दिखा। उसमें स्टीम इंजन के जमाने के स्टाफ की आत्मायें जरूर निवास करती होंगी, जिन्हे स्वर्ग की जिंदगी की बजाय रेल का वातावरण पसंद आता होगा! और ऐसे बहुत से लौकिक पारलौकिक जीव होंगे यह मैं शर्तिया कह सकता हूं। :-)

माधोसिंह प्लेटफार्म की बगल में कोच फिलिंग के पाइप का कॉलम जो चील्ह की रेल लाइन को सर्व करता होगा। ऐसे कई कॉलम थे वहां जो तब तक कायम थे।

करीब दो तीन हफ्ते हम लोग वहां रहे। इस दौरान बहुत बारीकी से मैंने स्टेशन और कॉलोनी को रेलकर्मी की निगाह से और एक बाहरी की निगाह से – दोनो प्रकार से देखा। दिन प्रति दिन मैं रेल अधिकारी से आम नागरिक बनता जा रहा था। रेल का खोल उतरता जा रहा था। और वह उतरना मुझे परेशान नहीं कर रहा था।

अक्तूबर के महीने में भी गर्मी काफी थी। बिजली बहुत जाया करती थी। हमने स्टेशन के जनरेटर पर अपनी निर्भरता अपने इनवर्टर को कमीशन कर समाप्त कर ली थी। इसके लिये स्टेशन के बिजली विभाग के कर्मी ने ही काम किया। शायद इरफान नाम था उसका। कुल मिला कर हम वहां इतने सहज और सुविधा संपन्न हो गये थे कि वहां से निकल कर अपने गांव के घर में (जहांं सुविधायें हमें बनानी पड़तीं) जाने का विशेष मन नहीं हो रहा था।

फिर भी हम जल्दी मचा रहे थे कि हमारा घर बन कर तैयार हो और हम उसमें शिफ्ट कर सकें। अखिर एक दिन वहां शिफ्ट होना ही था।


उज्जैन के रेलवे गुड्स यार्ड की यादें


सन 1985-86 का समय। रेलवे पच्चीस तीस प्रतिशत यातायात वैगन लोड में लदान करती थी और उसे पटरी पर पूरे रेक के रूप में चलाने के लिये बहुत मेहनत करनी पड़ती थी। गुड्स शण्टिंग यार्ड जिंदा थे। रेलवे की प्रोबेशनरी ट्रेनिंग में मैंने बहुत सा समय रेलवे गुड्स यार्डों की कार्यप्रणाली समझने में लगाया था। देश के पूर्वी भाग में अण्डाल, और धनबाद से जुडी रेल कोल लोडिंग साइडिंग्स, कोट्टवालसा – किरंदुल रेल खण्ड की यात्रा और बछेली यार्ड आदि अनुभव अभी भी दिमाग में हैं। उनका मस्तिष्क में दर्ज समय गड्डमड्ड हो सकता है। मेरे नोट्स जो काफी सालों तक मेरे सामान में रहे; तबादलों के दौरान कालांतर में कहीं इधर उधर हो गये हैं। अन्यथा बेहतर तरीके से उनके बारे में लिख सकता।

कोट्ट्वालसा – किरंदुल रेल लाइन, चित्र विकीपेडिया से

मेरा मूल रेलवे पश्चिम रेलवे है; अत: वहां कई यार्ड देखे और ट्रेनिंग में काफी घिसाई की। कोटा रेल मण्डल में ट्रेनिग करते हुये मैंने दिल्ली का तुगलकाबाद यार्ड चार-छ दिन घूम घूम कर देखा। मुझे अब भी याद है कि दिन भर ट्रेनिंग के बाद जब चीफ यार्ड मास्टर वेद प्रकाश जी (आशा है, उनका नाम ठीक से ले रहा हूं) यार्ड ऑफिस में एक कप चाय और एक बालूशाही के साथ आधे घण्टे अपने अनुभव सुनाते थे तो अपना रेलवे के साथ जुड़ाव मजबूत होते पाता था! मैंने उस मण्डल की ट्रेनिंग में आगरा ईस्ट बैंक, जमुना ब्रिज, ईदगाह, गंगापुर और सवाई माधोपुर यार्ड एक कोने से दूसरे कोने तक घूम घूम कर देखे और उनकी शंटिंग का अनुभव किया। शंटिंग इंजनों – स्टीम और छोटे डीजल शंटिंग इंजनों पर भी चढ़ा। शौकिया तौर पर बॉयलर में कोयला भी झोंका। कालांतर में जब मैं कोटा मण्डल का वरिष्ठ परिचालन प्रबंधक बना तो वह पुरानी ट्रेनिंग मेरे बहुत काम आयी।


Header Photo by Neelkamal Deka on Unsplash


पर मेरी पहली पोस्टिंग रतलाम मण्डल में सहायक परिचालन अधीक्षक के रूप में हुई थी। रहने को रतलाम स्टेशन पर एक पुराना सैलून मिला था। उसका फायदा यह था कि एक अटेण्डेण्ट मिल गया था जो (अपनी भयंकर दारू पीने की आदत के बावजूद) अच्छे से मेरे मन माफिक सादा भोजन बनाता था और जब तब तलब लगने पर चाय पिलाया करता था।

नौकरी ज्वाइन करने के बाद दूसरे या तीसरे दिन मुझे उज्जैन यार्ड जाने को कहा गया। 111 नम्बर सवारी गाड़ी में मेरा चार पहिये का सैलून लगा। जो चार पहिये और पुरानी तरह की स्प्रिंग के कारण बहुत हिलता था। उसमें यात्रा करना एक सजा की तरह होता था। रात की यात्रा में सैलून में हिलते डुलते मैं उज्जैन पंहुचा। नींद अच्छे से आयी नहीं थी।

नयी नौकरी में अपने आप को “प्रमाणित” करने का जोश इतना था कि मैं बहुत जल्दी ही गुड्स यार्ड में पंहुच गया। उज्जैन स्टेशन के पूर्वी किनारे पर बना वह यार्ड पच्चीस लाइनों का था, और वैगनों से भरा था। मुश्किल से दो चार रेल लाइनें खाली थीं। इंजन को एक ओर से दूसरी ओर ले जाने के लिये भी एक ही लाइन खाली थी!

यार्ड का मुख्य काम भोपाल की ओर से आने वाली तीस बॉक्स वैगन की कोयले की ट्रेनों को यार्ड में ले कर चालीस वैगनों की ट्रेन बना कर रवाना करना था। इसके अलावा दिन भर में पांच छ मिक्स्ड लोड (फुटकर लदान के वैगनों से बनी ट्रेनें) यार्ड में आते थे, जिनकी छ्न्टाई कर अलग अलग दिशाओं की ट्रेनें बनानी पड़ती थीं। मुझे जल्दी ही समझ आ गया कि अच्छे (और मेहनती) यार्ड मास्टर, मूवमेण्ट इंस्पेक्टर आदि की टीम के बावजूद यार्ड बहुत अच्छी तरह काम नहीं कर रहा था। शण्टिंग की अधिकता, वैगनों के कैरिज-वैगन परीक्षण में लगने वाला समय और उसमें वैगनों का ‘सिक’ किया जाना, अन्य विभागों से तालमेल और मण्डल के परिचालन की समस्याओं के प्रभाव यार्ड की वर्किंग पर थे। महीने में एक या दो बार ऐसा अवसर आता था कि यार्ड वैगनों-ट्रेनों से ‘पैक’ हो जाता था और उसकी सहायता के लिये माल गाड़ियां यार्ड में लेने की बजाय बाई-पास करनी होती थीं।

दो मूवमेण्ट इंस्पेक्टर/चीफ यार्ड मास्टर मुझे अब भी परिवार के अंग की तरह याद हैं। आर एस सोढ़ी सिक्ख थे और अय्यर दक्षिण भारतीय होने के बावजूद बहुत अच्छी हिंदी बोलते थे। इन दोनो से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। महीने में पांच छ दिन तो मैं वहां पंहुचा ही रहता था। मैं अपने को यार्ड का अंग सा मानने लगा था।

यार्ड में बहुत समय व्यतीत करने के कारण मैं उज्जैन यार्ड का ‘एक्सपर्ट’ जैसा हो गया था। मुझे अच्छी तरह याद है कि ई. श्रीधरन (कोंकण और मैट्रो रेलवे ख्याति वाले) बतौर पश्चिम रेलवे के महाप्रबंधक उज्जैन यार्ड आये थे और यार्ड ऑफिस की दीवार पर बहुत ऊंचे टंगे यार्ड डायग्राम के आधार पर यार्ड कार्यप्रणाली समझाने के लिये मैंने एक लम्बी लकड़ी हाथ में प्वाइण्टर की तरह ली थी। श्रीधरन बहुत बारीकी से किसी भी विषय को समझा करते थे। उस प्वाइण्टर से यार्ड की पच्चीस लाइनों को अपने कद (पांच फुट साढ़े तीन इंच) और डायग्राम की ऊंचाई के कारण मैं अलग अलग चिन्हित नहीं कर पा रहा था। लिहाजा मैंने बिना झिझक जूते उतारे और यार्ड ऑफिस की टेबल पर खड़े हो कर दस पंद्रह मिनट का प्रेजेण्टेशन यार्ड वर्किंग के बारे में महाप्रबंधक महोदय को दिया। नौजवान था मैं। जोश था और महाप्रबंधक जैसे शीर्षस्थ अधिकारी का भय नहीं था मुझमें। अन्यथा, कोई भी अन्य अधिकारी इस तरह की “भदेस” प्रेजेंटेशन तकनीक की कल्पना नहीं कर सकता था। :-)

पर श्रीधरन जी ने मेरी प्रशंसा की और बाद में मण्डल रेल प्रबंधक महोदय ने भी कहा – जीडी, बहुत बढ़िया किया तुमने!

उज्जैन गुड्स यार्ड, जिसे एन सी यार्ड कहा जाता था, ने मुझे रेलवे संस्कृति के बारे में बहुत कुछ सिखाया। एन सी यार्ड का मतलब था Newly Constructed Yard. नया बना होगा।

पर बहुत जल्दी रेलवे का फुटकर लदान का युग खत्म हो गया। कोयला लदान के वैगन भी बेहतर बनने लगे। ट्रेनें तीस बॉक्स वैगनों की बजाय पहले चालीस और फिर 56-58 बॉक्स-एन वैगनों की होने लगीं, जिनकी यार्ड में ले कर चालीस या पैंतालीस डिब्बों की ट्रेन बनाने की आवश्यकता ही नहीं रही। और उज्जैन यार्ड अप्रासंगिक हो गया। उज्जैन ही नहीं; पूरी रेलवे के यार्ड अपनी महत्ता खो बैठे। सबसे दयनीय दशा तो मुगल सराय यार्ड की सुनने में आती थी जो एक तरफ बना और दूसरी तरफ बनते ही अप्रासंगिक होने लगा था!

मेरे रतलाम मण्डल में जाने के बाद एक दशक भर लगा यह परिवर्तन होने में।

अनेकानेक यादें जुड़ी हैं उज्जैन गुड्स यार्ड और रतलाम-उज्जैन की लगभग नियमित यात्राओं की। और वे सब एक ब्लॉग पोस्ट में समेटी नहीं जा सकतीं।

(उस जमाने में डिजिटल कैमरा नहीं था। मेरे पास चित्र नहीं हैं। जो चित्र पोस्ट पर लगे हैं वे इधर उधर से प्रतीकात्मक रूप से लगाये गये हैं।)


Design a site like this with WordPress.com
Get started