मेरी रेलवे की यादों को कुरेदती फिल्म भुवन शोम


मैंने दूसरी पारी की शुरुआत के विषय में लिखना प्रारम्भ किया तो एक सजग किंतु अनाम पाठक ने ट्विटर पर टिप्पणी की –

एग्रेरियन महोदय ने कहा कि मैं समय निकाल कर भुवन शोम देखूं

मैंने फिल्में बहुत ही कम देखी हैं। कई बार तो दशकों बीत गये बिना किसी फिल्म को देखे। जब नौकरी ज्वाइन की थी तो इस तरह के किस्से सुने थे कि फलाने साहब सिनेमा देखने गये और बीच में ही अनाउंसमेण्ट कर उन्हें रेलवे की एमरजेंसी से निपटने के लिये सीधे कण्ट्रोल रूम में पंहुचने को कहा गया।

वह छोटा शहर (रतलाम) था। आपको ट्रेन कण्ट्रोल को बता कर जाना होता था कि कहां जा रहे हैं और आपको कैसे सम्पर्क किया जा सकता है। मोबाइल का जमाना नहीं था। बहुधा आप अगर रेलवे के तंत्र के बाहर हैं तो रेलवे नियंत्रण कक्ष से किसी न किसी को रवाना किया जाता था किसी भी एमरजेंसी की दशा में।

और वह मण्डल (रतलाम) ऐसा था कि एमरजेंसियाँ होती ही रहती थीं। ट्रेनों का पटरी से उतरना, वैगनों का ऊंचाई पर अन-कपल होना, रेलखण्ड का घण्टे भर से ज्यादा बिना सूचना के किसी अनहोनी से बंद रहना या फिर सीधे सीधे सवारी गाड़ी की दुर्घटना आम थे। दिल्ली और बम्बई से ट्रेने‍ सपाट रेल पर चलती चली आती थीं पर रतलाम – गोधरा खण्ड, जो सत्तर प्रतिशत गोलाई, टनल और ग्रेडियेण्ट पर था, वहां असली दिक्कत होती थी परिचालन की। … सो मैंने सिनेमा देखना ही बंद कर दिया। वही आदत अभी तक कायम है।

भुवन शोम में उत्पल दत्त

खैर, एग्रेरियन महोदय की सलाह पर मैंने “भुवन शोम” खोजी। किसी ओटीटी प्लेटफार्म पर नहीं मिली। यू-ट्यूब पर थी पूरी डेढ़ घण्टे की फिल्म। डाउन लोड की और देर रात तक देखी मोबाइल पर। काली-सफेद, 35 एमएम का पर्दा वाली फिल्म। धीरे चलने वाली। मारधाड़ विहीन। पर क्या गजब फिल्म! मृणाल सेन और उत्पल दत्त तो कालजयी हैं! बनफूल (बलाई चंद मुखोपाध्याय) की कहानी पर बहुत जानदार फिल्म बनाई है उन्होने।

भुवन शोम में पक्षियों की तलाश में गंवई पोशाक में उत्पल दत्त और गौरी (सुहासिनी मुळे)

और फिल्म भी मेरे पुराने विभाग, रेलवे के इर्दगिर्द है। रेल की सम्भवत: यातायात सेवा का अफसर है भुवन शोम (उत्पल दत्त)। काम के बोझ से उकता कर एकबार पक्षियों के शिकार पर निकलता है। छोटे से स्टेशन पर टिकेट कलेक्टर है साधू मेहर। उसकी चार्जशीट लगभग तय कर चुका है भुवन शोम। भ्रष्टाचरण के सिद्ध चार्ज में वह नौकरी से हाथ धो बैठेगा।

पक्षियों की तलाश में उत्पल दत्त जिस गांव में जाता है वहां उसकी सहायता को मिलती है लड़की गौरी (सुहासिनी मुळे), जिसका गौना साधू मेहर से होने वाला है। सरल, निश्छल गौरी उत्पल को बहुत प्रभावित करती है और वापस जा कर वह अधिकारी साधू मेहर को बुला कर डांट लगाता है, पर उसकी चार्जशीट रद्द कर देता है।

भयभीत, पर भ्रष्ट साधू मेहर। उसको उत्पल दत्त डांटता है, पर चार्जशीट रद्द कर देता है।

फिल्म सरकारी अफसर की मोनोटोनी, ऊब, मानवीय सम्वेदना और अपनी कड़े अफसर की ओढ़ी इमेज के अनुसार स्वयम को प्रमाणित करने की चाह (या जिद) को बखूबी दर्शाती है। उत्पल दत्त की जगह लगभग पूरे फिल्म के दौरान मैं अपने को देखता रहा। और उसने बहुत सी यादें कुरेद दीं। (बाई द वे; कुरेदना, सुरसुरी या गुदगुदी का एक प्रसंग भी फिल्म में है जिसमें गाड़ीवान बैलोंंको उनके पृष्ठ भाग में सुरसुराता-खोदता है जिससे वे तेज दौड़ें।)

शिकार करने गया उत्पल दत्त। उनकी गोली से कोई चिड़िया नहीं मरती!

मुझे याद हो आयीं अपने द्वारा दी गयी या निपटाई चार्जशीटें। जब मैंने असिस्टेण्ट डिविजनल ऑपरेशंस सुपरिण्टेण्डेण्ट (एओएस) के रूप में ज्वाइन किया था तो मेरी टेबल पर सौ से ज्यादा चार्जशीटें थीं; जिन्हे मेरे पहले वाले अफसर जारी कर गये थे और वे पेण्डिंग थीं। वे सभी चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों की चार्जशीटें थीं। नौकरी से गायब रहना, हुक्म न मानना, दारू पी कर ड्यूटी करना, मारपीट, एक से ज्यादा पत्नी होना, यात्रियों से अभद्र व्यवहार आदि अनेक विषय उनमें दर्ज थे।

ट्रेन ऑपरेशंस का जो बोझ था, उसके सामने इन चार्जशीटों का निपटारा करना अंतिम वरीयता रखता था। विभाग में मेरे ऊपर के अफसर इस बात की फिक्र नहीं करते थे कि कितनी चार्जशीटें मैंने निपटाईं। उनकी वरीयता ट्रेन का परिचालन थी। केवल एस्टेब्लिशमेण्ट अधिकारी के रिपोर्ट पर, जिसमें हर अफसर के नाम के आगे उनके पास पैण्डिंग चार्जशीटों के आंकड़े होते थे, मण्डल रेल प्रबंधक जरूर कहा करते थे। एक दो डिस्प्लेजर नोट भी दिये उन्होने। पर चूंकि व्यक्तिगत रूप से वे मुझे बहुत पसंद करते थे; उनके डिस्प्लेजर नोटों की ज्यादा फिक्र नहीं करता था मैं।

और फिक्र करता भी तो क्या? मेरे पास यातायात परिचालन की चौबीसों घण्टे की ड्यूटी के आगे समय ही नहीं बचता था कि चार्जशीटों का निपटारा करूं। मैंने काम के बोझ में अपने परिवार की ओर भी बहुत कम ध्यान दिया। उसका उलाहना मेरा परिवार अब भी देता है और वह अब भी मुझे कचोटता है।

दारू पी कर ड्यूटी करना मेरी निगाह में बहुत बड़ा गुनाह था। शायद इस लिये भी कि मैंने कभी शराब छुई नहीं। मैंने दो तीन कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया इस चार्ज पर। और बहुत हल्ला मचा। यूनियन वाले भी चिल्लाये। मेरे सीनियर (जो बहुत कुशल अधिकारी थे पर बहुत ज्यादा शराब के शौकीन भी थे) ने मुझसे कहा – “यार, तुम तो गजब अफसर हो। दारू पीने पर नौकरी ले लेते हो।” जाहिर है, उन्होने सभी मामलों में अपील पर नौकरी से निकालने की सजा रद्द कर दी, पर थोड़ा बहुत प्रसाद तो देना ही पड़ा कर्मचारियों को!

लेकिन मेरे व्यक्तित्व की प्रारम्भिक सालों की कड़ाई ज्यादा टिकी नहीं। मैं यह समझ गया कि चार्जशीट देना दुधारू तलवार है। उससे अपना भी काम बहुत बढ़ता है। चार्जशीट देने की बजाय मौके पर डांटना, फटकारना, फजीहत कर भूल जाना कहीं बेहतर है। और, इसके उलट कर्मचारियों को उनकी गलती बता कर सुधारना और भी बेहतर।

डांटने फटकारने के लिये मुझे “थानेदारी” भाषा सीखनी पड़ी। भीषण अपशब्द तो मेरी भाषा में नहीं आये, पर व्यंग और आवाज की पिच बढ़ाने से वह प्रभाव डालने में अधिकांशत: सफल रहा।

समय के साथ व्यक्तित्व के खुरदरे पत्थर घिस कर पर्याप्त चिकने बन गये। समय ने और मेरे बेटे की दुर्घटना ने मुझे बहुत सिखाया।

मेरे जूते उतारने के पौने दो साल पहले जब मैं गोरखपुर में परिचालन विभाग का अध्यक्ष बना तो मेरे पूर्ववर्तियों द्वारा अनुशासनात्मक प्रक्रिया के लगभग तीस अपील के मामले पेण्डिंग थे। पहले के कई विभागाध्यक्ष उन्हे बिना निपटाये चले गये थे। अपने गोपनीय सचिव रमेश चन्द्र श्रीवास्तव जी की विशेष सहायता से (उन्होने नियमों, धाराओं और पूर्व में निपटाये मामलों को बड़ी दक्षता से नत्थी कर मुझे निर्णय लेने में सहायता की) एक एक कर उन अपीलों का निपटारा किया। येे अपील कर्मचारी के लिये विभागीय सुप्रीम कोर्ट के समान थीं। मुझसे ऊपर कहीं सुनवाई उनके लिये सम्भव नहीं होती।

मैंने लगभग हर एक मामले में सहृदयता खुले दिल से दिखाई। कुछ उसी तरह, जिस तरह उत्पल दत्त ने साधू मेहर की चार्जशीट फाड़ कर दिखाई थी। मेरा यह कृत्य मेरे रेल के प्रारम्भिक दिनों से 180 डिग्री उलट था। मैं अपने में काफी बदलाव ला चुका था।

मुझे सहृदय बनाने के लिये कोई रेल के इतर घूमने और वहां किसी गौरी (सुहासिनी मुळे) से मिलने का अवसर नहीं मिला; पर समय के थपेड़ों ने वह काम बखूबी किया। हां, वह सब इतना धीरे धीरे हुआ कि मुझे पता भी न चला। रिटायर होने के बाद जब मैंने अपने व्यवहार का विश्लेषण किया तो पाया कि दो ढाई दशकों में वह बदलाव आया। वह ऐसे आया कि मैं अपने तनाव, शरीर और मन की उपेक्षा और रोज रोज की चिख चिख से अपने को असम्पृक्त नहीं कर सका। अगर वह सीख लेता – और उसके प्रति सचेत रहता – तो आज कहीं बेहतर शारीरिक/मानसिक दशा में होता। नींद के लिये दवाई लेने की आदत छूट चुकी होती। हाइपर टेंशन, मधुमेह आदि न होते और एक दशक में चार बार अस्पताल में भरती होने की नौबत न आती।

पर जो होना था, वह हुआ! अपनी गलतियां सुधार कर नये सिरे से दूसरी पारी खेली जा सकती है, पर पहली पारी फिर खेलने को तो नहीं मिलती, किसी को भी।

“अगर वह सीख लेता – और उसके प्रति सचेत रहता – तो आज कहीं बेहतर शारीरिक/मानसिक दशा में होता। नींद के लिये दवाई लेने की आदत छूट चुकी होती। हाइपर टेंशन, मधुमेह आदि न होते और एक दशक में चार बार अस्पताल में भरती होने की नौबत न आती।”

दउरी बनाने वालों का बाजार


बहुत दिनों बाद गिर्दबड़गांव की उस धईकार बस्ती की ओर गया था, जहां वे खांची, छिंटवा, दऊरी आदि बनाते हैं। उस बारे में कल ट्वीट थी –

9 जनवरी 2021 को ट्वीट। धईकार बस्ती की ओर जाने के बारे में।

मैं सोचा करता था कि उनकी बांस की बनी वस्तुओं में जो कलात्मकता है, उससे उनको व्यापक मार्केट मिल सकता है। मैंने उनसे छोटे कटोरे के आकार के बांस के बर्तन बनाने को कहा। वे बाउल जो पर्याप्त डिजाइन दार और चटक रंगों के हों। इस बात को बार बार कहने के लिये मैंने 2017 में उनकी बस्ती में कई चक्कर लगाये थे। उसी समय उनके बारे में मैंने पोस्ट भी लिखी थी – धईकार बस्ती का दऊरी कारीगर

मेरा विचार था कि लोग अपने डाइनिंग टेबल पर या ड्राइंग रूम में छोटे आकार के दऊरी का अपने अपने प्रकार से प्रयोग करना चाहेंगे। उसकी आकृति भी अर्ध गोलाकार की बजाय अगर चौकोर या दीर्घवृत्ताकार बन सके तो और सुंदर या विविध लगेगा। वह सब काफी कलात्मक होगा और उसे अमेजन जैसी साइट पर ऑनलाइन बेचना/कुरियर के माध्यम से भेजना भी सहज होगा। अगर नया उत्पाद पूरी तरह बांस का न हो तो उसमें लोहे या प्लास्टिक का छल्ला लगा कर अलग अलग आकृतियां बनाई जा सकती हैं बर्तन की।

बांस की दऊरी बिनने के बाद उसपर बांस का एक छल्ला लगता है। दऊरी की मजबूती उसी से आती है।

पर वे अपने काम को जिस ढंग से कर रहे थे, जो उनका मार्केट था, उसमें कोई बदलाव करना नहीं चाहते थे। उन्होने मुझे न भी नहीं किया, पर बनाया भी नहीं। मैंने उन्हे दो पीस छोटे बाउल बनाने के लिये उन्हे बयाना पैसा भी दिया। जो अंतत: मैंने उन्हे दिये “सहयोग” मान कर छोड़ दिया। वे नया कुछ बनाने को तैयार नहीं हुये।

शायद मेरे उन्हे प्रेरित करने के तरीके में कुछ कमी थी। मैं शायद रेलवे के अधिकारी छाप भाषा में बात कर रहा था; उनके बीच का कोई व्यक्ति बन कर नहीं।

या शायद जिस ढर्रे पर वे काम करते हैं, उसमें कोई बदलाव वे सोच ही नहीं पा रहे थे।

मकर संक्रांति के अवसर पर भरी-सजी दुकान

आज संक्रांति के अवसर पर हम लाई, चिवड़ा, गुड़ की पट्टी, तिलकुट, रेवड़ी, गुड़ का लेड़ुआ और गजक जैसी चीजें खरीदने के लिये महराजगंज बाजार गये थे। वहां गिर्दबड़गांव की धईकार बस्ती के संतोष दिखे। एक साइकिल पर बांस की दऊरी लटकाये थे। दुकान वाले को उन्होने वे दऊरियां बेंच दीं।

मैंने पूछा – कितने में बिकीं?

धईकार बस्ती के संतोष

“ढ़ाई सौ की एक। कुल नौ थीं।”

“कितने दिन लगे बनाने में?”

“दस ईग्यारह दिन। मेरे ही घर की बनी हैं। एक दिन में एक ही बन पाती है। कभी कभी वह भी नहीं।” संतोष ने बताया। उन्होने यह भी बताया कि वहां के आठ दस परिवार इसी तरह बना कर यहीं बाजार में बेचते हैं। इस पर दुकान वाला अपना पचास-सौ का मुनाफा जोड़ता होगा। मैंने दुकान वाले से उसका दऊरी का सेल प्राइस नहीं पूछा। किसी और दिन पता करूंगा। पर धईकार कारीगरों के मार्केट का मोटा अंदाज हो गया।

मैने पूछा उसके औजारों के बारे में। गंड़ासा नुमा औजार को उसने बताया – बांका।  उसका प्रयोग वह बांस काटने में करता है। उससे छोटी बांकी। बांकी से महीन काम करता है वह – बांस को छीलना, दऊरी की सींके बनाना आदि। दऊरी बुनने के बाद उसके ऊपर बांस का रिंग नुमा गोला लगाता है। उसी से दऊरी में मजबूती आती है। उसने बिनी दऊरी और गोला दिखाया मुझे।

धईकार बस्ती का दऊरी कारीगर सेे
अपनी 9 दऊरी साइकिल पर लिये महराजगंज मार्केट में संतोष

कस्बाई बाजार की हस्त निर्मित वस्तुओं की श्रम अनुसार वाजिब कीमत लगाने की क्षमता ही नहीं है। लोग बांस की इन चीजों की बजाय प्लास्टिक के टब से काम चला सकते हैं। धीरे धीरे स्थानीय शिल्प इसी प्रकार से हाशिये पर जाता और दम तोड़ता गया है। इनकी कलात्मकता की कीमत तो शहरी मध्य या उच्च-मध्य वर्ग ही सही सही लगा सकता है। पर उसके पास जाने के लिये प्रॉडक्ट में कुछ परिवर्तन करने होंगे। वही नहीं हो रहा है! :sad:

आप, जो पढ़ रहे हैं, इसमें कुछ पहल कर सकते हैं? इस बारे में बेहतर जानकारी के लिये तीन-चार साल पहले की पोस्ट धईकार बस्ती का दऊरी कारीगर और झिनकू का अवश्य अवलोकन करें।


संसाधनों की कमी से जूझते अगियाबीर के पुरातत्वविद


22 अप्रेल 2018 को फेसबुक नोट्स पर लिखी पोस्ट:-

अंगरेजों के समय में पुरातत्व अध्ययन में ईमानदारी थी, पर उनके ध्येय (शायद) भारतीय विरासत को योरोप से जोड़ने और/या उसे योरोपीय सभ्यता का कनिष्ठ अंग प्रमाणित करने के थे। आर्यों के योरोप से भारत में आगमन और सिंधु घाटी से गंगा घाटी में पलायन का सिद्धांत उसी का परिणाम प्रतीत होता है, जिसे हमारे साम्यवादी और समाजवादी/सेकुलर अभी भी गाते हैं। इससे सोच से आर्यावर्त की महत्ता कमतर होती है। और साम्यवादी वैसा ही चाहते हैं। उनकी निष्ठा देश से इतर है।


22 अप्रेल 2018 को फेसबुक नोट्स पर लिखी यह पोस्ट अब फेसबुक की नोट्स को गायब कर देने की नीति के कारण वहां से विलुप्त हो गयी है। अत: मेरे पास उसे और उस जैसी कई अन्य पोस्टों को खंगाल कर ब्लॉग पर संजोने के सिवाय कोई विकल्प नहीं बचा।

अगियाबीर विषयक कई पोस्टें इस ब्लॉग पर हैं और कुछ और आने वाली हैं, फेसबुक की नोट्स को समाप्त कर देने की नीति के कारण।

उनमें से कुछ पोस्टें पुरातत्व (आर्कियॉलॉजी) सम्बंधित हैं। सभी पोस्टें संजोने के बाद एक लिस्ट बनाऊंगा उनको तरतीबवार देखने के लिये। इसके अलावा ट्विटर पर भी कई ट्वीट्स हैं सन 2018 की अगियाबीर की खुदाई पर। वह सब भी एकाग्र करना एक बड़ा काम है! जो होगा, भविष्य में देखा जायेगा।


स्वतन्त्रता के बाद हमारी सरकारों को (पुन: मैं जोड़ूंगा शायद, चूंकि मैं अपने को पुरातत्व वालों की जमात का होने की स्वघोषणा नहीं कर सकता) सिंधु घाटी सभ्यता के क्षरण के बाद वहां से अर्बन लोगों का मध्य गंगा के स्थानों में पलायन की अटकल की बात को असत्य प्रमाणित करने के लिये मध्य गंगा क्षेत्र में जहां भी पुरातात्विक शोध सम्भव था, वहां त्वरित गति से खोज कराना होना चाहिये था।

जितना मैने पढ़ा है, उसके अनुसार लगता है कि हरप्पा के शिव और काशी के शिव में काल का अन्तराल नहीं है। काशी में उसी स्थल पर उत्तरोत्तर सभ्यतायें बसती गयी हैं। आज भी वह जीवन्त शहर है। अत: वहां हरप्पा की तरह का खनन सम्भव ही नहीं। अन्यथा सिंधु और गंगा की सभ्यतायें समान्तर रही होंगी। अन्तर अगर रहा होगा तो कृषि पर निर्भरता के स्तर का अन्तर रहा होगा।

उस समय अगर हरप्पा में गैंड़ा हुआ करता था तो वह सरयूपार के सोहगौरा और लहुरादेवा में भी था। चावल की खेती करना अपने आप में एक पर्याप्त विकसित मस्तिष्क के बल पर ही सम्भव है और गंगा घाटी में 8000बीसीई में चावल की खेती हुआ करती थी। शायद हरप्पा के समकालीन; मेरे घर के समीप के अगियाबीर में भी क्वासी-अर्बन सभ्यता रही हो! पर उसके लिये साधन सम्पन्न तरीके से पुरातत्वीय खनन तो हो!

स्वतन्त्रता के शुरुआती समय में आर्कियॉलॉजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया को संसाधन प्रचुर मात्रा में मिले भी – ऐसा मेरे पढ़ने में आया है। मौलिक शोध के लिये विश्वविद्यालयों को भी संसाधन मुहैया हुये। भारत में कई स्थानों पर पुरातत्विक खनन हुये। पर कालान्तर में, कभी न कभी, सरकार को लगा होगा कि विरासत संजोने का काम पर्याप्त हो चुका है। उसके बाद सरकारें पुरातत्व खनन की बजाय मनरेगा छाप खनन/निर्माण की विकृतियों में लिप्त हो गयी। जनता को सबसिडी का अफीम चटाना और वोट कबाड़ना मुख्य ध्येय हो गया उत्तरोत्तर सरकारों का।

और; राष्ट्रवाद तथा भारतीय विरासत पर गर्व के नारे के साथ आयी भारतीय जनता पार्टी की सरकार में भी वह स्थिति बदली हो, ऐसा नहीं लगता।

मैं कई सप्ताह अगियाबीर की पुरातात्विक खुदाई स्थल को देखता रहा हूं। अपने मिशन के प्रति समर्पित पर अत्यन्त साधन की कमी से जूझते पुरातत्वविदों को वहां 42-43 डिग्री तापक्रम में जूझते हुये सुबह छ बजे से गोधूलि वेला तक काम पर लगे पाया है।

मैं दो सप्ताह से अगियाबीर की पुरातात्विक खुदाई स्थल को देख रहा हूं। अपने मिशन के प्रति समर्पित पर अत्यन्त साधन की कमी से जूझते पुरातत्वविदों को वहां 42-43 डिग्री तापक्रम में जूझते हुये सुबह छ बजे से गोधूलि वेला तक काम पर लगे पाता हूं।

अपने मिशन के प्रति समर्पित पर अत्यन्त साधन विपन्न पुरातत्वविदों को वहां 42-43 डिग्री तापक्रम में जूझते हुये सुबह छ बजे से गोधूलि वेला तक काम पर लगे पाता हूं।

ऐसे काम करने वाले लोगों के पास बेसिक कम्फर्ट्स देने का काम तो सरकारें – भाजपा की केन्द्र सरकार या भाजपा की प्रान्त सरकार – कर सकती थीं। पर खनन में कार्यरत उनके पास आये दिन बिजली व्यवस्था ध्वस्त हो जाती है। दिन भर चिलचिलाती धूप में काम करने के बाद रात में पंखे की हवा भी नसीब नहीं होती। एक साधारण सा रेफ्रिजरेटर और उसमें रखे शीतल जल की बोतलें तो बहुत बड़ी लग्जरी की बात होगी – वे लोग आसपास के बाजार में मिट्टी का घड़ा तलाश रहे हैं। पूरी टीम साधारण दाल-रोटी-सब्जी और शाम को चने-चबैने पर रह रही है। … पुरातत्व का खनन कोई जेसीबी मशीन से ताबड़तोड़ खनन तो है नहीं, यह बहुत धैर्य और अत्यन्त कुशल मानवीय श्रम मांगता है। दुखद यह है कि सरकारें उसे पर्याप्त फण्ड नहीं दे रहीं।

और सरकारें राष्ट्र गर्व की बात करती हैं! सब लिप-सर्विस प्रतीत होता है। मोदीजी गुजरात के मुख्य मन्त्रित्व में वहां के प्रान्त की ऑर्कियॉलॉजी में गहन रुचि लेते रहे होंगे; पर अब राष्ट के स्तर पर वह जज्बा/जनून अपनी टीम में नहीं भर सके हैं। टीम – नेता और ब्यूरोक्रेसी – दोनो स्तर पर वही कान्ग्रेस कल्चर वाली है।

बीरबाल साहनी पेलियोबॉटनी संस्थान के वैज्ञानिक डा, अनिल पोखरिया उन लोगों के लिये होटल से आते समय कोल्ड-ड्रिंक की बोतल लेते आते हैं।

मेरी पत्नीजी यदा कदा अपनी रसोई में अगियाबीर की टीम वालों के लिये कुछ बना लेती हैं। बीरबाल साहनी पेलियोबॉटनी संस्थान के वैज्ञानिक डा, अनिल पोखरिया उन लोगों के लिये होटल से आते समय कोल्ड-ड्रिंक की बोतल लेते आते हैं। अपने घर से हम स्पेयर पड़ा मिट्टी का घड़ा उनके लिये ले जाते हैं। अपने घर में बिजली-पानी की सुविधा वाला एक कमरा देने की पेशकश हम करते हैं, पर अपनी साइट से ज्यादा दूर (हमारा घर करीब तीन किलोमीटर दूर है) न रहना शायद उनके लिये बहुत आवश्यक है। वे लोग – डा, अशोक सिंह, डा. रविशंकर और अन्य – सधन्यवाद हमारा ऑफर अस्वीकार कर देते हैं। मुझे यकीन है कि इस पुरातत्व यज्ञ में वे स्वयम् न केवल अपने समर्पण और जुजून से अपनी आहुति दे रहे हैं, वरन यदाकदा अपने व्यक्तिगत आर्थिक रीसोर्सेज भी इसमें लगा देते होंगे।

तेज गर्मी और साधन हीनता में उनका एक सदस्य वाइरल बुखार से पीड़ित हो जाता है। रविशंकर (आदतन) अपने सिर पर न टोपी रखते हैं, न गमछा। दोपहर में अल्ट्रावायलेट विकीरण असामान्य रूप से अधिक होता है। उनके लिये मन में मुझे दुख होता है, पर कुछ कर नहीं सकता मैं।

अगियाबीर खुदाईस्थल पर यह छोटा मटका ले गये हम। उनकी जरूरत तो इससे बड़े और बेहतर मटके की है जो आसपास बाजार में तलाश रहे हैं वे। फ्रिज की कल्पना तो लग्जरी है।

हां, साधन-विपन्नता के लिये सरकार को जिम्मेदार ठहरा सकता हूं और वह में पूरे जोर दे कर करना चाहूंगा। वे पुरातत्व वाले समय के साथ रस्साकशी कर रहे हैं। अगियाबीर का टीला पुरातव की खुदाई के लिये बहुत सभावना-सम्पन्न टीला है। यहां नगरीय सभ्यता के प्रमाण हैं। गंगा घाटी में आबादी का सघन घनत्व होने के कारण इस प्रकार का अवसर कहीं और मिलना सम्भव नहीं। और खुदाई अगर साधनों की कमी के कारण टलती रही तो बहुत देर नहीं लगेगी – बड़ी तेजी से खनन माफिया टीले की मिट्टी के साथ साथ सिंधु घाटी के समान्तर और समकालीन नगरीय सभ्यता मिलने की सम्भावनायें नष्ट कर जायेगा।

इस सरकार से बहुत अपेक्षायें थीं। पर अपेक्षा रखना शायद पाप है। अकादमिक एक्सीलेंस की तवज्जो और फण्डिंग सरकार की प्राथमिकता में लगती नहीं।


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