विजय तिवारी का रेस्तरॉं और रूरर्बियन रूपान्तरण


वे (भविष्यदृष्टागण) कहते हैं कि आने वाले समय में आर्टीफ़ीशियल इण्टैलिजेन्स (AI) की बढ़ती दखल से रोजगार कम होंगे। उसको सुनने के बाद मैं वे सभी अवसर तलाशता हूं जहां मेरे आसपास के गांव के परिवेश में रोजगार की सम्भावना बढ़ रही है, और तब भी रहेंगी जब आर्टीफ़ीशियल इण्टेलिजेन्स का शिकंजा और कस जायेगा। ऐसा ही एक अवसर मिला विजय तिवारी के नये खुले रेस्तरॉं में।

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दुखहरन लकड़हारा


वह लकड़हारा है। उसे बुलाया था घर में पड़ी लकड़ी चीर कर छोटे छोटे टुकड़े करने को। सर्दी बढ़ गयी है। सोचा गया कि शाम के समय एक दो घण्टे अलाव जलाया जाये। उसके लिये उपले जमा कर लिये थे। एक बोरसी भी बनवा ली थी। कमी थी तो लकड़ी के छोटे टुकड़ों की। लकड़ी घर में थी, पर काफी मोटे बोटे के रूप में। कई दिनों से एक लकड़हारे की जरूरत महसूस हो रही थी। तीन दिन पहले वह मिला।

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दुखहरन लकड़हारा

उसने नाम बताया दुखहरन। पास के गांव पठखौली (पाठक ब्राह्मणों का गांव) में रहता है। उससे तीन सौ में तय हुआ लकड़ी चीरने का काम। वह बोला कि अगले दिन आयेगा चीरने के लिये।

अगले दिन नहीं आया। साइकिल से घूमते हुये मैने देखा कि वह नहर की पुलिया पर बैठा था दिन के इग्यारह बजे। धूप सेंक रहा था। मैने पूछा – आये नहीं?

बिना किसी अपॉलॉजी के, उसने कहां कि हां, नहीं आ पाया। फिर जोड़ा – कालि आउब।

मुझे लगा कि वह विश्वसनीय नहीं है। नहीं आयेगा। पर अगले दिन सवेरे नौ बजे बाजार से घर लौट कर देखा तो वह लकड़ी चीर रहा था। नीम की मोटी डाल हमने पिछले साल कटवाई थी – इस लिये कि वह आम के पेड़ को दबा रही थी और आम में बौर ही नहीं लग पाते थे। एक साल भर में वह कोने में रखी डाल पूरी तरह सूख गयी थी। उसे चीरना बहुत मेहनत का काम था। हर लकड़ी की चोट करते हुये वह हांआआआं जैसी आवाज भी कर रहा था मुंह से।

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एक साल भर में वह कोने में रखी डाल पूरी तरह सूख गयी थी। उसे चीरना बहुत मेहनत का काम था। हर लकड़ी की चोट करते हुये वह हांआआआं जैसी आवाज भी कर रहा था मुंह से।

मेरी पत्नीजी ने काम शुरू करते समय उसे गुड़-पानी दिया था। तब दो लोटा पानी पिया था उसने। एक कप चाय दी थी पानी के बाद। घण्टा भर बाद काम बीच में रोक कर सुस्ताने और पानी-गुड़ की पेशकश की मैने, पर वह रुका नहीं। अनवरत चीरता रहा। पूरा काम करने के बाद ही दम लिया। लगभग तीन घण्टे, बिना रुके अपनी तीन किलो की कुल्हाड़ी से प्रहार करता रहा।

काम पूरा करने पर उसे चाय पिलानी चाही पर बोला – नाहीं, कुछ न चाहे। हमार हिसाब दई द। चलब। भगवानपुर जाई के बा (नहीं, कुछ नहीं पीना है। मेरा हिसाब कर दें। चलूंगा। भगवानपुर – पास के गांव – जाना है)।

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अनवरत चीरता रहा। पूरा काम करने के बाद ही दम लिया। लगभग तीन घण्टे, बिना रुके अपनी तीन किलो की कुल्हाड़ी से प्रहार करता रहा।

उसका पैसा देने के पहले मैने उससे उसके बारे में बात की। चार लड़के और दो लड़कियां हुई थीं। दो लड़के नहीं रहे। लड़कियों की शादी हो चुकी है और अपने अपने घर चली गयी हैं। दोनो लड़कों की भी। लड़कों के बच्चे-परिवार हैं। वह अकेला रहता है। पत्नी बीस साल पहले गुजर गयी। अपना खाना खुद बनाता है। शाम को पांच बजे तीन चार टिक्कड़ सेंकता है। वही भण्टा-चोखा से खाता है। बस एक बार भोजन करता है दिन में। बाकी चाय-पानी पर चलता है।

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बिना लजाये खुद ही (बिना पूछे, बेझिझक) कहा – आप तो जानते ही हैं। पैसा निकल जाता है नशा-गांजा में। पर फिर भी कुछ बचाया है। बैंक में खाता है।

कमाई इतनी करता है कि काम चल जाता है। उसने बिना लजाये खुद ही (बिना पूछे, बेझिझक) कहा – आप तो जानते ही हैं। पैसा निकल जाता है नशा-गांजा में। पर फिर भी कुछ बचाया है। बैंक में खाता है।

अकेला आदमी। रूखी, खुरदरी, मेहनत मशक्कत की जिन्दगी। जिस तरह से बताया, उससे लगता है कि मुझसे कुछ ही कम होगा वह उम्र में। पर व्यवहार में कोई लाचारी नहीं। कोई रिमोर्स, कोई शिकायत नहीं। बिना लाग लपेट के बताया अपने नशा-गांजा के बारे में! … अपनी मर्जी का मालिक।

उससे तीन सौ में तय हुआ था काम; मैने चार सौ दे दिये। उसने कोई गरम कपड़ा मांगा। मेरी पत्नीजी ने मेरा मोटा स्वेटर – पुराना, पर मुझे बहुत प्रिय था मुझे -उसे दे दिया। दुखहरन से बात करते उससे इतना अटैचमेण्ट महसूस कर रहा था कि मैं पत्नीजी को मना भी न कर पाया। शायद उन्हे मेरा वह पुराना स्वेटर पहनना अच्छा नहीं लगता था – इस मौके का फायदा उठा उन्होने निकाल दिया!

उसकी तीन किलो की टंगारी (कुल्हाड़ी); तीन बार प्रहार करने में ही मेरी कमर में निश्चित ही चिलक हो जाती; तीन घण्टे अनवरत चलाता रहा था वह!

वह जाने को हुआ तो मैने आखिरी सवाल किया – टंगारी (कुल्हाड़ी) तेज भी करते हो? कैसे?

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दुखहरन ने अपनी रेती दिखाई। बताया कि रोज कुल्हाड़ी तेज करनी पड़ती है। वह कुल्हाड़ी साथ रखता है और रेती भी। 

दुखहरन ने अपनी रेती दिखाई। बताया कि रोज कुल्हाड़ी तेज करनी पड़ती है। वह कुल्हाड़ी साथ रखता है और रेती भी।  स्टीफन कोवी की सेवन हैबिट्स पुस्तक का अध्याय मेरे दिमाग में जीवन्त हो गया – Sharpen the Saw. 

भगवानपुर में किसी मिसिर जी ने आम की लकड़ी चिरवाने के लिये बुलाया है। बोला कि जा कर कह देगा कि अब कल आयेगा उनका काम करने। आज जितनी मेहनत कर ली और जितना मिल गया; वह काफ़ी है।

इतने दार्शनिक हमें वर्तमान में जीने की सीख देते पूरी पूरी किताबें लिख देते हैं। यहां केवल वर्तमान में जीता उदाहरण सामने था – दुखहरन!     


दोपहर में द्वरिकापुर में गंगा किनारे


सवेरे निकलता हूं घूमने। गंगा तट पर जाना होता है तो उसी समय। अब सर्दी बढ़ गयी थी। सवेरे की बजाय सोचा दिन निकलने पर निकला जाये। बटोही (साइकिल) ने भी हामी भरी। राजन भाई भी साथ निकले पर वे अगियाबीर के टीले पर निकल गये; वहां प्राचीन सभ्यता के गहने-सेमीप्रेशस स्टोन्स के अनगढ़ टुकड़ों को बीनने। मैं अकेला गया गंगा तट पर।

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नीरव तो नहीं था वातावरण। गंगा का बहाव मन्थर था। जल कम हो रहा था। बीच में एक टापू उभर आया था और उसपर ढेरों प्रवासी पक्षी बैठे थे। शायद धूप सेंक रहे थे। मोटर बोट्स से उसपार से बालू ढोती नावें थीं। मेरे देखते देखते तीन नावें किनारे लगीं। उनपर सामान्य से कम बालू थी। हर नाव पर चार पांच कर्मी थे। वे नावों को किनारे लगा कर बेलचे से रेल तट पर फैंक रहे थे। कुछ तसले से भर भर कर तट पर ढो रहे थे। बालू का यह दृष्य देख मुझे हमेशा लगता है कि यह खनन अवैध है। इस बार भी लगा। पर मैं निश्चित नहीं था। हो सकता है कि यह सरकारी अनुमति के बाद हो रहा हो। पर मन में कोई न कोई भाव है जो गंगा के परिदृष्य से इस तरह की छेड़छाड़ को सही नहीं मानता – भले ही वह कानूनन सही हो। निर्माण कार्य में बालू का प्रयोग होता है। उत्तर प्रदेश सरकार की अवैध खनन पर कड़ाई के कारण बालू का रेट दुगना तिगुना हो गया है। असल में निर्माण कार्य में बालू का विकल्प आना चाहिये। नदियों का रेप कर निर्माण करना कोई अच्छी बात नहीं।

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खैर, बालू ढोने और उतारने का काम बड़े शान्त भाव से चल रहा था। मैं पीपल की जड़ को बेंच की तरह प्रयोग कर उसपर बैठा यह सब देख भी बड़े शान्त भाव से रहा था। अचानक एक गड़रिया करीब 50-60 भेड़ों के साथ गंगा तट पर उतरा। भेड़ों को उनकी भाषा में हर्र, हुट्ट, हेर्र,क्चक्च जैसे शब्द बोल कर स्टीयर कर रहा था। उसका सारा ध्यान और सम्प्रेषण सबसे आगे चलती भेड़ पर केन्द्रित था। उसके पास कोई कंकर या लकड़ी फेंक पर उसकी दिशा बदलता था। आगे वाली भेड़ को देख बाकी सभी “भेड़चाल” से निर्दिष्ट दिशा में चलने वाली थीं। … भेड़ों में कोई प्रयोगधर्मी या लीक से हट कर “जोनाथन लिविंगस्टन सीगल” की तरह की भेड़ मैने आज तक नहीं देखी। कभी किसी गड़रिये से पूछूंगा कि कोई मनमौजी स्वभाव की सामान्य से अलग प्रवृत्ति की भेड़ उनके पास है या थी!

गड़रिये को पानी पिलाने के लिये ज्यादा निर्देश नहीं देने पड़े भेड़ों को। शायद चरने के बीच में एक राउण्ड पानी पीना उनका नित्य का रुटीन होगा।

इक्का दुक्का लोग नहा कर लौट रहे थे। गंगा किनारे वह चबूतरा, जिसपर चौबेपुर की रिटायर्ड ब्राह्मण भाग्वत कथा कहते हैं और जहां कुछ भगवानजी के केलेण्डर और मिट्टी-पत्थर की भग्न, पुरानी मूर्तियां रखी हैं, पर रुक कर हाथ जोड़ आगे बढ़ जा रहे थे लोग। इतने में एक आदमी आ कर उस चबूतरे पर लेट गया। उसका पैर गंगा की ओर था और वह मनमौजी पन में अपनी दांयी टांग पर बायीं रखे हिला रहा था। पीपल की छाया से छन कर दोपहर की थोड़ी धूप उसपर पड़ रही होगी। धूप छांव का सही मिश्रण था उसके ऊपर। और पूरे वातावरण को वह एंज्वाय करता प्रतीत होता था।

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काफी समय हो गया था। घर पर लंच का समय। लौटने में भी मुझे 40 मिनट लगने थे। मैं उठ कर चला। एक बार दांये से बायें गंगा तट को निहारा। यह सब जाने कितनी बार कर चुका हूं और (लगता है) बाकी जिन्दगी यही करता रहूंगा।


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