नजीर मियां का पूरा परिवार आम की रखवाली में लगा रहता था। जब आम का सीजन नहीं होता था तब वह साड़ियां बुनता था। औरतें धागे रंगती, सुखाती और चरखी पर चढ़ाती थीं। फिर आदमी लोग उसे करघे पर चढ़ा कर ताना-बाना तैयार करते।
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मचिये के लिये मिला राजबली विश्वकर्मा से
राजबली का परिवार अलाव जला कर कोहरे में गर्माहट तलाशता बैठा था। आकर्षक मूछों वाले राजबली एक मोटे लकड़ी के टुकड़े को बसुले से छील भट्ठा पर काम करने वालों के लिये खड़ाऊँ बना रहे थे।
विष्णु मल्लाह – बैकर मछरी पकड़े बा!
किसान की तरह मल्लाह भी मार्केट की चाल से मात खाता है। यहां यह जरूर था कि तुरत-फुरत उसे रोकड़ा मिल जा रहा था। किसानी में वह भी नहीं होता।
