नया फेज – यू ट्यूब विश्वविद्यालय का विद्यार्थी


मैंने ह्वाट्सएप्प विश्वविद्यालय से डेढ़ दो साल पहले नाम कटा लिया था। या यूं कहूं कि नाम तो नहीं कटाया, पर कक्षायें अटेण्ड करना छोड़ दिया था। मेरे पास यू ट्यूब की भी प्रीमियम मैम्बरशिप थी। पर हर महीने उनके द्वारा पैसा काटना खलने लगा तो वह भी बंद कर दिया था। फिर देखना भी बंद कर दिया। कालांतर में प्रेमसागर कांवरिया के फेर में बहुत टाइम खोटा होने लगा। सिवाय प्रेमसागर ट्रेवल-ब्लॉग लेखन के बाकी सब कुछ होल्ड पर चला गया।

अब प्रेमसागर को नागेश्वर तीर्थ के बाद विराम दे दिया है, तो बाकी सब की ओर ध्यान जा रहा है। मेरी पत्नीजी प्रसन्न हैं – उन्हें लगता है कि मैं दीन दुनियाँ से बेखबर हो गया था। घर के कामकाज में भी ध्यान नहीं दे रहा था। अब वापसी हो गयी है।

और तो और मैंने सोनी वालों का “पुण्यश्लोक अहिल्याबाई” वाला सीरियल भी देखना प्रारम्भ कर दिया। टीवी सीरियल देखना मैं दशकोंं पहले छोड़ चुका था। अब पुनर्मूषको भव की दशा हुई है। मुझे जैसा भी लगे, मेरी पत्नीजी खुश हैं मेरे पुन: मूषक बनने पर!

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यह अहिल्याबाई वाला सीरियल देखने के लिये यू ट्यूब और फिर ओटीटी प्लेटफार्म्स भी खंगाले। यू ट्यूब की प्रीमियम मैम्बरशिप वापस लौट आयी। और यू ट्यूब तरह तरह के वीडियो ठेलने लगा। मैंने देखा कि ह्वाट्सएप्प विश्वविद्यालय की टक्कर में एक यू ट्यूब विश्वविद्यालय भी कम नहीं है। बहुत ज्ञान ठेलता है!

कल यूट्यूब पर नरसिम्हा पीवीआर राव जी से मुलाकात हुई, इंफिनिटी फाउण्डेशन के एक वीडियो पर। वे आईआईटी के उत्पाद हैं और वैदिक ज्योतिषी हैं। अग्नि उपासक हैं। पर्सनालिटी में नये पुराने का जबरदस्त घालमेल है। यूट्यूब विश्वविद्यालय के लिये एक जानदार शानदारश्च विभूति! उनके ट्विटर प्रोफाइल में परिचय है – IITian, engineering manager in US, Vedic astrologer (researcher, author, teacher and maker of a popular free software), Sanskrit scholar, philosopher, Fire Yogi.

नरसिम्हा पीवीआर राव जी ने एक वीडियो में अपने प्रेडिक्शन दिये

उन्होने वीडियो में अपने प्रेडिक्शन दिये –

  • मोदी जी 2024 का चुनाव भी जीतेंगे। मजे से। उसके बाद 2026 तक गद्दी योगी आदित्यनाथ को थमा कर कर्मसन्यास-वैराज्ञ टाइप लेंगे।
  • योगी आदित्यनाथ का राजयोग प्रबल है। अगले डेढ़ दशक – 2036 तक विश्व के लिये उथल पुथल वाले हैं। उसमें वे भारत को वह ऊंचाई दिलायेंगे जो अमेरिका ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पाई थी। उनका स्थान वैसा ही होगा जैसा रुजोवेल्ट का था।
  • चीन ज्यादा फुदकेगा। द्वितीय विश्व युद्ध के समय जैसा जर्मनी का था। पर अंतत: उसके (कम से कम) पांच टुकड़े होंगे।
  • इसी दशक में अमेरिका और ईरान के बीच भीषण युद्ध होगा। … और भी बहुत कुछ!
नरसिम्हा पीवीआर राव जी का ट्विटर हेडर।

इस प्रकार के ज्योतिषीय आकलन, एक आईआईटी वाले से, जो अमरीका में रह रहा है। … सब कुछ ग्लेमराइज करता है। सारे ज्योतिषीगण चमत्कृत करते हैं। मेरे पत्नीजी के ऑफीशियल ज्योतिषी लल्लू मामा (कमलेश कुमार त्रिपाठी जी) भी वैसे ही चमत्कृत करते हैं। वे कट्टर कांग्रेसी हैं और उनके सारे आकलन राहुल राजीव गांधी को अगले दशक का नायक बताते हैं। पर लल्लू मामा का यूट्यूब विश्वविद्यालय में कोई पद नहीं है। सो उनके भक्त हम आसपास के लोगों तक ही हैं। … उन्हें भी यूट्यूब पर अपना ठीया बनाना चाहिये।

गूगल सर्च, यूट्यूब, ह्वाट्सएप्प और ओटीटी – सब मिला कर रिटायर आदमी के लिये समय बहुत क्रीयेटिव तरीके से नष्ट करने के साधन हैं। मैंने यूट्यूब को बतौर विद्यार्थी पुन: ज्वाइन किया है। बहुत से लोगों का सुझाव है कि मुझे भी वहां अपना एक ठीया, एक चैनल बना लेना चाहिये। क्या पता, मैं भी अंतत: वहां विजिटिंग या नियमित फेकल्टी बन सकूं। फिलहाल सीखना है कि सुपरलेटिव्स में, अतिरेक में और सेनशेसनल तरीके से कुछ कैसे कहा-परोसा जाये।


मैं सवेरे उठता कैसे हूं?


मेरे जीवन में कर्मकाण्डों का बहुत महत्व नहीं है। मन उनमें नहीं लगता। कुछ कर्मकाण्ड सामाजिकता निर्वहन के लिये किये जाते हैं। उनका निर्वहन करते हुये निरपेक्ष भाव ही रहता है, सामान्यत:। अन्यथा, ईश्वर मंदिर में या यज्ञ-हवन-भजन में नहीं दिखते। वे अपने को या प्रकृति को यूंही निहारते में ज्यादा पास लगते हैं।

पर एक कर्मकाण्ड मेरे जीवन का अंग बन गया है – तीन चार दशकों से। उसमें कुछ परिवर्तन हुये हैं समय के साथ, पर मूलत: वह वैसा ही रहा है।

सवेरे उठते समय अगर नींद सामान्य रूप से खुलती है – किसी झटके या शोर या आकस्मिक घटना से नहीं – तब निद्रा और जागने की संधि पर मन में लेटे लेटे “हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे, हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे” का अठारह बार जप होता है। कभी कभी गिनती में गफलत होने पर अधिक भी हो जाता है पर सामान्यत: अठारह बार ही होता है।

उसके बाद धीरे धीरे बिस्तर पर बैठ कर निम्न प्रार्थना मन में ही होती है –

त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्‌। वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप। वायुर्यमोग्निर्वरुण:शशांक: प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च। नमो नमस्तेस्तु सहस्रकृत्व: पुनश्च भूयोपि नमो नमस्ते॥ पुनश्च भूयोपि नमो नमस्ते॥

Keep sheltered in my arms, they will protect you against everything. Open to my help, it will never fail you.

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥

यह प्रार्थना करते समय मन में योगेश्वर कृष्ण की छवि होती है।

योगेश्वर श्रीकृष्ण

उसके बाद मैं अपने पूर्वजो को याद करता हूं – जोड़े में। अपने माता-पिता, बाबा-आजी, नाना-नानी और स्वसुर-अम्मा जी को। याद करते समय, क्षण भर के लिये ही, उनकी छवि मन में आती है।

उसके बाद धरती पर पैर रख कर झुक कर दोनो हाथों से धरती को प्रणाम करता हूं।

यह क्रम, जैसा मैंने कहा, कई दशकों से चल रहा है। इस कर्मकाण्ड में कुछ परिवर्तन हुये हैं। शुरुआत में केवल हरे राम का जप होता था। कालांतर में गीता के उक्त श्लोक जुड़े। अंग्रेजी में मदर के कहे शब्द तो सन 2000 के आसपास जुड़े और उनके साथ सर्वधर्मान्परित्यज्य वाला श्लोक भी जुड़ा। तब शायद मन उद्विग्न रहा करता था और यह विचार आया कि सब गोविंद पर ही छोड़ देना चाहिये।

अपने पूर्वजों और धरती माता का स्मरण तो लगभग दो साल पहले जुड़ा। तब पिताजी की मृत्यु हुई थी। उसके बाद लगा कि दिन में एक बार उन्हें और पालन करने वाली धरती माता के प्रति भी भाव सवेरे की प्रार्थना में रहने चाहियें।

इस दैनिक कर्मकाण्ड के अलावा कोई धार्मिक कर्मकाण्ड मेरे जीवन का अनिवार्य हिस्सा नहीं है। स्नान कर पूजा करना भी कभी होता है और कभी नहीं। संस्कृत मुझे नहीं आती – उतनी ही आती है, जितनी स्कूल में तृतीय भाषा के रूप में रटी थी। पर कुछ श्लोक याद हैं। उनका मनमौज के अनुसार यदा-कदा मन में या सस्वर उच्चारण भी कर लेता हूं। … हे कृष्ण गोविंद हरे मुरारे, अच्युतम केशवं रामनारायणम, या कुंदेंदु तुषार हार धवला, आदि कई श्लोक प्रिय हैं। इनको मन में आने पर बोलता हूं।

बस, ले दे कर यही मेरे कर्मकाण्ड हैं। यही मेरा धर्म। … बस। चारधाम की यात्रा, किसी मंदिर देवालय में जाना, किसी धार्मिक समारोह में शरीक होना – यह मेरी सामान्य प्रवृत्ति नहीं है और उनके लिये सयास कर्म नहीं करता। हां, उन्हें जड़ता या उद्दण्डता से नकारता भी नहीं। धर्म बहुत फ्लेग्जिबिल है! :lol:


साइकिल सैर की एक दोपहर – विचित्र अनुभव


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Gadauli Dham गड़ौली धाम

बहुत दिनों बाद धूप थी, हवा नहीं बह रही थी और वातावरण में गलन भी नहीं थी। बहुत दिनों बाद गुलाब को कहा कि मेरी साइकिल की हवा चेक कर ले। बहुत दिनो बाद गांव देहात में साइकिल ले कर मैं निकला। बारह से ऊपर समय हो गया था। दक्षिणायन सूर्य उत्तर की ओर साइकिल की छाया बना रहा था। वातावरण में धूल थी, पर इतनी नहीं कि सांस में घुटन सी हो। साइकिल सैर आनंददायक नहीं थी, पर अप्रिय भी नहीं थी।

अगियाबीर के नाले में आज फिर किसी ने अपने नीचाई के खेत में पानी दिया था जो पगडण्डी पर बह कर आ गया था। उसमें से अगर साइकिल निकालता तो जरूर साइकिल फंस जाती। न आगे जाते बनता न पीछे। एक बार पहले मैं फंस चुका था; सो इस बार सतर्क था। किनारे से बच बचा कर निकला और साइकिल भी सूखे से धकेल कर निकाली। सौ दो सौ कदम चढ़ाई पर पैदल चलना पड़ा साइकिल घसीटते हुये। उतने के लिये मेरे ऑस्टियोअर्थराइटिस ग्रस्त घुटनों और छियासठ वर्षीय शरीर को ज्यादा तकलीफ नहीं हुई। तीन चार साल पहले यह नहीं कर पाता। निश्चय ही मैं चार साल पहले के खुद से ज्यादा फिट हूं। गांव का असर है!?

सामने दक्षिण की ओर गंगा को उन्मुख परिसर का विस्तार। एक रंगमंच सा सज गया था।

आगे कमहरिया के गौगंगागौरीशंकर पंहुचा। सतीश वहां नहीं मिले। फोन किया तो उनकी पत्नी ने कहा कि बाहर गये हैं और फोन घर पर ही है। शैलेश पाण्डेय ने बनारस से मेरे लिये एक डमरू भेजा था, जो सुनील ओझा जी ले कर आये थे और सतीश के टेण्ट में रखा था। वही लेना था, पर सतीश के न होने से मिला नहीं। वहां रामप्रसाद थे। वे मुनीम/केयरटेकर जैसा काम देखते हैं। उन्होने कहा – बाबू जी बैठिये, मैं चाय बनाता हूं।

रामप्रसाद जी ने चाय बनायी। इसी बीच एक पुरुष और महिला मोटर साइकिल पर वहां आये। आदमी उस महिला का पति था या नौकर स्पष्ट नहीं हो रहा था। उसने महिला के लिये कुर्सी खींच कर रखी। तब महिला उसपर बैठी। कुर्सी खींचने का काम वह खुद कर सकती थी।

इसी बीच एक पुरुष और महिला मोटर साइकिल पर वहां आये। आदमी उस महिला का पुरुष था या नौकर स्पष्ट नहीं हो रहा था। उसने महिला के लिये कुर्सी खींच कर रखी। तब महिला उसपर बैठी।

एक रंगमंच सा सज गया था। तीन खण्ड रंगमंच के। एक तरफ मोटर साइकिल और मेरी साइकिल। बीच में सतीश का टेण्ट। दूसरी तरफ एक तख्त पर बैठा मैं और सामने दक्षिण की ओर गंगा को उन्मुख परिसर का विस्तार। मोटर साइकिल के पास कुर्सी पर बैठी महिला। बीच में टेण्ट में चाय बनाता रामप्रसाद और दूसरी तरफ तख्ते पर बैठा मैं। खण्ड एक में महिला अपनी बुलंद आवाज में अपने से ही बोले जा रही थी। स्वत: स्फूर्त मोनोलॉग। मुझे नहीं लगा कि वह किसी से बात कर रही हो। बीच में रामप्रसाद ने उसके पति/नौकर से बातचीत में मेरे बारे में कहा कि “वे रेलवे के बड़े अफसर हैं; उनको चाय पिला रहा हूं।”

इतना सुनते ही वह आदमी लपक कर मेरी ओर चला आया। बिना भूमिका के पास के तख्त पर बैठ कर मुझसे कहने लगा – “मेरे दो लड़के इलाहाबाद में रह कर नौकरी की परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। आप अगर कुछ उनकी सहायता कर सकें। कोई नौकरी दिला सकें।..”

“मैं क्या कर सकता हूं भाई। मैं तो रिटायर हो चुका हूं। मेरे हाथ में तो कुछ नहीं है। आर आर बी की परीक्षा दिलवाइये। उससे ही नौकरी का कुछ हो सकता है।” – मैंने अपना ऑफ्ट-रिपीटेड डायलॉग बोला जो गांवदेहात में बार बार मुझे बोलना पड़ता है। और लोग तो कुछ जान पहचान निकाल कर, भूमिका बना कर नौकरी की बात करते हैं; यह बंदा तो घोर अपरिचय के बाद भी लप्प से नौकरी दिलाने की कह रहा है। मुझे अजीब लगा। झुंझलाहट भी हुई कि सतीश के न रहने पर मैं वहां चाय पीने के लिये रुका क्यूं?!

वह आदमी हार नहीं माना – “आप पूरी तरह रिटायर हो गये हैं?”

“भाई रिटायर तो रिटायर। आधा रिटायर कुछ होता नहीं।”

“तब भी आपके पास कौनो जुगाड़ तो होगा।” यह सुन कर मैं खीझ गया। पर तभी रामप्रसाद चाय ले आये।

“भाई मेरी खुद की नौकरी कड़ी परीक्षा पास करने पर लगी थी। वही अपने लड़कों को करने को कहो। कोई जुगाड़ काम नहीं करता।”

वह बंदा फिर भी पेस्टरिंग करता रहा। मेरा चाय पीना दूभर हो गया। इस बीच उसने बताया कि वह नौकरी करता था, पर पत्नी बीमार रहती है, इसलिये नौकरी छोड़ दी। उनको आंगनवाड़ी और जहां जाना होता है ले कर जाना होता है। उसी में बहुत समय चला जाता है। मुझे और कंफ्यूजन हुआ। पत्नी बीमार हो तो नौकरी छोड़ कर निठल्ला बनना हजम होने वाला सिद्धांत नहीं लगता था। और पत्नी किसी भी तरह से लाचार-बीमार नहीं दिखती थी। चौधरी की तरह कुर्सी पर बैठी थी। हो न हो, यह बंदा भी मेरी तरह “गुड फॉर नथिंग” ही है। गांवदेहात में ऐसे गुड-फॉर-नथिंगों की भरमार है। वे लोग जो पढ़ लिख कर खेती किसानी करते नहीं। श्रम करने की उनकी इच्छा शक्ति ही नहीं है। नौकरी भी चाहते हैं जिसमें तनख्वाह हो पर काम न हो।

जल्दी जल्दी चाय खत्म की। रामप्रसाद को अच्छी चाय बनाने का धन्यवाद दिया और वहां से चलने लगा। रंगमंच का फोकस तख्ते से टेण्ट होते मोटरसाइकिल के पास कुर्सी पर बैठी महिला की ओर शिफ्ट हुआ। बिना किसी पूर्व परिचय के वह महिला मुझसे बोली – “अरे, आप कहां चल दिये? इतनी जल्दी। आप कहां से आये हैं? कहां रहते हैं?” उसके शब्द धीरे धीरे, पूरी स्पष्टता के साथ, चबा चबा कर निकल रहे थे। मानो रंगमंच निर्देशक ने उन्हें इसी तरह डायलॉग बोलने को कहा हो। पूर्ण अपरिचित के साथ इस प्रकार बोलना मुझे बहुत वीयर्ड लगा।

उस महिला को हूँहां में जवाब दे चला। मेरे मन का नॉन-प्रेक्टिसिंग पत्रकार इस दम्पति के बारे में जानकारी लेने का प्रयास करने लगा। औरत चण्ट है और आदमी घोंघा। औरत की आंगनवाड़ी में नौकरी लग गयी है तो आदमी को लगा कि काम करने की जरूरत नहीं। वह महिला के नौकर-मोटरसाइकिल चालक के रोल में आ गया है। ज्वाइण्ट फैमिली में रहते हैं पर उसमें अपना योगदान नहीं करते। उल्टे, महिला पूरे परिवार पर तोहमद लगाती फिरती है कि वे सब मिल कर उसे मार डालना चाहते हैं। एफ आई आर लिखा कर पूरे परिवार को थाने घसीट चुकी है वह! वे दम्पति भारत के उस पक्ष को दिखाते हैं जो जाहिल-काहिल-नीच-संकुचित है। भारत अगर प्रगति नहीं करता तो ऐसे लोगों के कारण ही।

सामान्यत: गांवदेहात का यह पक्ष मेरे सामने नहीं आता। यह पता चलने पर खिन्नता भी हुई और जानकारी भी बढ़ी। मुझे नहीं लगता कि पढ़ने वाले इसे कोई रिलेवेण्ट पोस्ट मानेंगे। पर अनुभव हुआ तो लिख देने का मन हो आया। ब्लॉग है ही उस काम के लिये। :lol:


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