रीवा से बाघवार – विंध्य से सतपुड़ा की ओर


9 सितम्बर 2021:

उन्होने बताया कि सागौन के वृक्षों की भरमार है। शाल वन प्रारम्भ हो चुका है। भवानी भाई का ‘घना, ऊंघता, अनमना जंगल’ प्रेमसागर सामने देख रहे हैं। I wish he could have been a better writer and had knack of expressing himself; not merely being a pilgrim. पर आप प्रेमसागर नहीं हो सकते और प्रेमसागर आप नहीं हो सकते!

एक दिन के विश्राम के बाद प्रेम सागर सवेरे समय पर ही निकले होंगे, पर मैं कुछ अस्वस्थता के कारण उन्हे छ के आसपास फोन नहीं कर पाया। उनका ही रिंग आया सात बजे के बाद। उन्होने बताया कि 6-7 किलोमीटर चल चुके हैं। उन्हें कुछ खांसी आ रही थी। बोले कि कमरे में एसी था, उससे सर्दी लगी, जिसे बाद में उन्होने बंद कर दिया। आज पैंतीस किलोमीटर चलने का विचार था। उन्होने एक स्थान का नाम बताया जहां तक उन्हें पंहुंचना था।

मैंने वह क्षेत्र देखा नहीं है। ट्रेन से गुजरा भी होगा तो रात में निकल गया होगा। मैं आकलन करता हूं कि प्रेम सागर रीवा से दक्षिण की ओर चल रहे थे। विंध्य की पर्वत श्रेणी से सतपुड़ा की ओर। पर विंध्य कहां खत्म होता है और सतपुड़ा कहां शुरू, वह मुझे नहीं ज्ञात था। मैंने नेट पार सर्च करने की कोशिश की। यह भी पता करने की कोशिश की कि कोई अमेजन किण्डल पर रीवा-शहडोल-अमरकण्टक के ट्रेवलॉग मिल जाये। वह नहीं हुआ तो प्रवीण चंद्र दुबे जी से बात करने का प्रयास किया। वे भी भोपाल से इंदौर के रास्ते में थे। उनसे बात न हो पाई। एक एहसास यह था कि शायद नर्मदा विंध्य और सतपुड़ा की सीमा रेखा हैं। पर क्या वह सीमा रेखा दो देशों की सीमा रेखा सरीखी होती है या पहाड़ कभी आपस में गुंथे भी होते हैं?

खैर, बाद में जो जानकारी मिलेगी उससे ब्लॉग अपडेट किया जायेगा। फिलहाल तो प्रेम सागर जी के इनपुट्स ही थे मेरे पास। उन्हीं के आधार पर यह लिखता हूं।

करीब घण्टे भर बाद प्रेम सागर जी ने सिल्पार के टोंस हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर स्टेशन के चित्र भेजे। मैंने चेक किया तो यह बाणसागर परियोजना के दूसरे चरण की 15 मेगावाट की दो इकाइयों का स्थान था। यह रींवा नहर पर स्थित है।

जितनी प्रेम सागर जी से अपेक्षा थी, उससे बेहतर ही थे ये चित्र। धुधले नहीं थे।

वहां से वे आगे बढ़े। उन्होने तीन घण्टे बाद गोविंदगढ़ रेलवे स्टेशन के चित्र भेजे। स्टेशन की मेन प्लेटफार्म लाइन खुदी हुयी थी। व्यापक मॉडीफिकेशन का काम चल रहा था। यहीं एक घण्टा प्रेमसागर ने प्लेटफार्म पर आराम किया।

गोविंदगढ़ के बारे में पढ़ा कि यह रीवा के बघेल राजाओं की समर कैपिटल हुआ करती थी। वह इलाका – उनके भवन आदि शायद प्रेम सागर जी के रास्ते में पड़े नहीं। गूगल मैप पर एक कोठी और एक पुरानी चार पहिया गाड़ी के चित्र मिले। वहां की सीनरी के भी चित्र हैं। चित्र किन्हीं शशांक गुप्ता, क्षितिज मिश्र और रत्नेश वर्मा जी के लिये हैं। निश्चय ही मनोरम आरामगाह रहा होगा गोविंदगढ़! ये चित्र अच्छे हैं, अन्यथा उलूलजुलूल कपड़े पहने लड़कों और उनकी गर्लफ्रैण्डों के फोरग्राउण्ड के चित्रों की भरमार है! :lol:

दिन में आगे कहीं एक हनुमान जी का मंदिर मिला। वहां प्रसाद के रूप में खिचड़ी मिली। वही प्रेमसागर का लंच हुआ। खिचड़ी का मिलना यह दर्शाता है कि हिंदुत्व में भी ‘लंगर’ जैसी प्रथा किसी न किसी रूप में उपस्थित है। उसका ऑर्गेनाइज्ड रूप नहीं बना है; पर है जरूर। इस तरह की लंगर प्रथा धर्म में ऑर्गेनाइज्ड तरीके से होनी चाहिये या नहीं, उसपर बतकही हो सकती है। ऑर्गेनाइज्ड रिलिजन के अपने घपले हैं। उसमें जड़ता आती है। पर मुझे लगता है कि लंगर की प्रथा सिक्खी से और दान/जकात की प्रथा इस्लाम से सीखने के बारे में विचार होना चाहिये।

हनुमान जी का मंदिर मिला। वहां प्रसाद के रूप में खिचड़ी मिली।

आगे, बकौल प्रेम सागर रास्ता बहुत खतरनाक था। शायद सड़क हाईवे से हट कर इकहरी हो गयी थी। वह सर्पिल “जलेबी जैसी” सड़क थी। जरा सा फिसले नहीं कि खड्ड में गिर जाने का खतरा। सर्पिल सड़क से हट कर एक जगह पगड़ण्डी पकड़ी प्रेम सागर ने और पांच-सात किलोमीटर बचा लिये। शाम पांच बजे वे बाघवार रेस्ट हाउस पंहुच गये थे।

मैंने आज प्रेमसागर जी का पूरा रास्ता गूगल मैप पर देखा –

9 सितम्बर का यात्रा मार्ग
*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची

इस यात्रा मार्ग में गोविंदगढ़ रेलवे स्टेशन से बाघवार के बीच एक स्ट्रिप ऊंचाई और फिर घाटी की दिखती है। इसी इलाके को खरतनाक मार्ग कह रहे होंगे प्रेमसागर। शायद यह रींवा के पठार का छोर हो। शायद इससे सतपुड़ा की शुरुआत होती हो। मेरा भौगोलिक ज्ञान पुख्ता नहीं है। इसलिये मैं केवल अटकल ही लगा सकता हूं। बहरहाल मुझे भवानी प्रसाद मिश्र जी की कविता – सतपुड़ा के घने जंगल की याद आ रही है।

सतपुड़ा के घने जंगल?!

सतपुड़ा के घने जंगल।
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल।

झाड ऊँचे और नीचे,
चुप खड़े हैं आँख मीचे,
घास चुप है, कास चुप है
मूक शाल, पलाश चुप है।
बन सके तो धँसो इनमें,
धँस न पाती हवा जिनमें,
सतपुड़ा के घने जंगल
ऊँघते अनमने जंगल।

सतपुड़ा के घने जंगल
ऊँघते अनमने जंगल।

जितना मैं नेट पर रास्ता और प्रेमसागर के चित्र देखता हूं, उतना मुझे लगता है कि मुझे खुद वहां हो कर अनुभव लेना चाहिये था। तब मेरी अनुभूति, मेरा ज्ञान और मेरी समझ कहीं ज्यादा सघन, कहीं ज्यादा गहरी होती। लेकिन मैं वहां हो नहीं सकता। मैं कुछ अच्छी पुस्तकों को ढूंढ और टटोल सकता हूं। मुझे नर्मदा के आसपास और विंध्य के दक्षिणी भाग की बेहतर जानकारी चाहिये। जाने कहां से मिल सकेगी!

10 सितम्बर 2021:
आज का यात्रा पथ

आज सवेरे फिर मेरी तबियत खराब होने के कारण मैंने फोन नहीं किया। प्रेमसागर का ही आया। वे निकल लिये हैं और आज ब्यौहारी तक पंहुचने की योजना है। ठीक ठाक गति से चल रहे थे। एक चाय की दुकान पर रुकने जा रहे थे। मैंने उन्हें फिर नदी-नाले-झरने और वन्य दृश्य अथवा जो भी रोचक लगे उसके चित्र लेने को पुन: कहा। इस ब्लॉग कड़ी में सम्प्रेषण का मुख्य सूत्र चित्र ही हैं। उनके बिना मैं यात्रा की अनुभूति ही नहीं कर सकता। मैंने प्रेम सागर को चलते चलते वॉईस मैसेज देने को कहा, पर वह उनसे हो नहीं पाया। उनके लेखन की बजाय उनकी आवाज बेहतर कम्यूनिकेट करती है – यह बात वे ग्रहण नहीं कर पा रहे।

उन्होने बताया कि सागौन के वृक्षों की भरमार है। शाल वन प्रारम्भ हो चुका है। भवानी भाई का ‘घना, ऊंघता, अनमना जंगल’ प्रेमसागर सामने देख रहे हैं। I wish he could have been a better writer and had knack of expressing himself; not merely being a pilgrim. पर आप प्रेमसागर नहीं हो सकते और प्रेमसागर आप नहीं हो सकते! :lol:




प्रेम सागर के घर वाले कैसे लेते हैं पदयात्रा को?


9 सितम्बर 2021:

कोई व्यक्ति, 10-15 हजार किलोमीटर की भारत यात्रा, वह भी नंगे पैर और तीन सेट धोती कुरता में करने की ठान ले और पत्नी/परिवार की सॉलिड बैकिंग की फिक्र न करे – यह मेरी कल्पना से परे है। मैं तो छोटी यात्रा भी अपनी पत्नीजी के बिना करने में झिझकता हूं।

कल प्रेम सागर के छिले पांव वाली पोस्ट पर पर एक कविता की पंक्ति टिप्पणी में दी आदरणीय दिनेश कुमार शुक्ल जी ने – रेत में जब जब जले है पांव घर की याद आई है।

ये पंक्ति माहेश्वर तिवारी जी की कविता “घर की याद आई” में है। पूरी कविता नीचे है –

धूप में
जब भी जले हैं पाँव
घर की याद आई

नीम की
छोटी छरहरी
छाँह में
डूबा हुआ मन
द्वार का
आधा झुका
बरगद : पिता
माँ : बँधा आँगन
सफर में
जब भी दुखे हैं घाव
घर की याद आई
अकेले यात्रा। Photo by Jou00e3o Cabral on Pexels.com
"सफर में जब भी दुखे हैं घाव; घर की याद आई" - कितना सुंदर!!!

दिनेश जी और माहेश्वर जी कवि हैं। उनमें सूक्ष्म सम्वेदना का होना और उसका काव्य में प्रकटन होना स्वाभाविक है। पर एक कांवरिया किस प्रकार से लेता है पैर के घाव को? मैंने अपने घर के पास से संगम से बनारस जाते कांवरियों को देखा है। कई धीमे धीमे लंगड़ाते चलते हैं। उनके पैर में कपड़े बंधे होते हैं। पसीने और घर्षण से उनकी जांघों में फंगल इंफेक्शन होता होगा। पर उनके सामने लक्ष्य केवल बनारस तक पंहुचने का होता है। प्रेम सागर पाण्डेय को तो पूरा भारत चलना है! 

प्रेम सागर ने बताया कि उनके जांघ में पसीने और रगड़ से घाव हुआ था। दो तीन बार मलहम और पाउडर लगाने से अब काफी ठीक है। कल वे अमरकण्टक की ओर निकलेंगे। यहां से पैंतीस किलोमीटर पर कोई जगह है, वहां तक जाने का प्रोग्राम है।

उनको पैर पिराने पर घर की याद नहीं आती? मैं प्रेम सागर से इस बात को दूसरी तरह से पूछता हूं। उनका परिवार उनकी कांवर यात्रा को किस प्रकार से लेता है? उनकी पत्नी किस प्रकार से लेती हैं? प्रेम सागर जी ने बताया कि परिवार के लोग पहले नाराज थे। पर अब समझ गये हैं। उनकी पत्नी भी समझ गयी हैं। फोन पर समाचार लेती रहती हैं। उनके बारे में मेरा लिखा भी प्रेम जी अपने बेटा बेटी को भेजते हैं। वे अपनी माँ को बताते हैं। उनके अनुसार अब परिवार के लोग सहज भाव से लेते हैं। “आपको यात्रा करना है तो कर आइये” वाली सोच उनमें आ गयी है।

मुझे लगता है प्रेम सागर अपनी धुन और जिद के पक्के होंगे। परिवार के अन्य सदस्यों की नाराजगी का ध्यान कर कोर्स करेक्शन उनकी प्रवृत्ति का हिस्सा नहीं होगा। ऐसे व्यक्तित्व की मैं गहरे से कल्पना करना चाहता हूं; पर ऐसा व्यक्ति मेरी जान पहचान में नहीं है।

कोई व्यक्ति, 10-15 हजार किलोमीटर की भारत यात्रा, वह भी नंगे पैर और तीन सेट धोती कुरता में करने की ठान ले और पत्नी/परिवार की सॉलिड बैकिंग की फिक्र न करे – यह मेरी कल्पना से परे है। मैं तो छोटी यात्रा भी अपनी पत्नीजी के बिना करने में झिझकता हूं। अब कोई रेलवे का किसन सिंह, राम सिंह, छोटेलाल या रामलखन तो है नहीं जो मेरी नित्य की जरूरतों की फिक्र कर सके। पत्नीजी नहीं होंगी तो सवेरे नहाते समय कच्छा बनियान तौलिया कहां से लूंगा?! और पैर में अगर इंफेक्शन हो गया तो किस जगह कौन सी दवा लगानी है, यह बताने के लिये भी तो आर्धांगिनी की दरकार है। … देखिये शंकर भगवान आपकी भक्ति तो सही है, पर आदमी को प्रेम सागर पांड़े जैसा स्वयम को कसने का मन आप कैसे दे देते हैं!?

शंकर जी के भक्त हैं ही उलट। आखिर रावण को ही देख लें – कैलाश पर्वत उपार कर लंका लिये जा रहा था। आज होता तो शायद सारे ज्योतिर्लिंग सीलोन में उठा ले जाने की सोच कर काम करना प्रारम्भ कर चुका होता। … मार्कण्डेय ऋषि को देख लीजिये, जो आव देखा न ताव शिवजी की पिण्डी पकड़ कर ही चिपक गये। ये लोग सामान्य सेंसिटिविटी और सेंसिबिलिटी के परे हैं। प्रेम सागर भी उसी तरह के हैं। उन्हें माहेश्वर तिवारी या दिनेश कुमार शुक्ल जी की कविता की कोमलता में नहीं बांधा जा सकता।

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची

कल मैंने प्रवीण दुबे जी से उनके रींवा की पोस्टिंग के बारे में बात की। वे भोपाल में थे। वन विभाग से सेवानिवृत्त हो कर इंदौर में रह रहे हैं। उन्होने कहा कि भोपाल से इंदौर पंहुच कर वे अपनी रींवा पोस्टिंग के बारे में जानकारी (चित्र) देंगे। उसपर एक लेख बनता है एक दो दिन बाद।

मैंने प्रेमसागर से उनकी तीर्थाटन की योजनाओं के बारे में बात की। यह स्पष्ट हो गया कि उनके मन में द्वादश ज्योतिर्लिंग भ्रमण और उसके भौगोलीय फीचर्स/कठिनाईयों की सूक्ष्म जानकारी नहीं है। इस बात को और अपनी आशंकाओं को मैं अपनी पत्नीजी से शेयर करता हूं। उनका सही जवाब है – “प्रेमसागर अगर तुम्हारी तरह सूक्ष्म जानकारी और प्लानिंग के फेर में पड़ते तो घर पर ही बैठे रहते। रींवा और शहडोल के जंगलों में नहीं हिलते!”

प्रेम सागर जी ने कल वन विभाग के रींवा के कर्मियों के साथ चित्र खिंचाया। वह मैं नीचे प्रस्तुत कर देता हूं।

प्रेम सागर (कुरता धोती में) अन्य बांये से हैं – सुनील सिंह, लालू कुशवाहा, शंकर रमन और शिव बहादुर सिंह
राजेश्वरी पटेल

चित्र में प्रेम सागर (कुरता धोती में) हैं। अन्य बांये से हैं – सुनील सिंह, लालू कुशवाहा, शंकर रमन और शिव बहादुर सिंह जी हैं। ये सभी किसी न किसी प्रकार से द्वादश ज्योतिर्लिंग यज्ञ में सहभागी बने हैं! प्रेमसागर जी ने एक और सज्जन – राजेश्वरी पटेल जी का चित्र भी भेजा है। उसको भी मैं साइड में लगा दे रहा हूं। बाद में कभी इस यात्रा का दस्तावेजीकरण हो तो सनद रहे!

इन सभी लोगों ने प्रेम सागर जी की बहुत सहायता की है। और अभी रास्ते में जाने कितने सामान्य-उत्कृष्ट-विलक्षण लोग जुड़ेंगे! … तुम अपनी कहो जीडी, शंकर भगवान तुम्हे कब तक और किस प्रकार से जोड़े रखेंगे!

आज सवेरे प्रेमसागर निकल लिये हैं अमरकण्टक के लिये – वाया शहडोल। उनको आज मैं अपनी अस्वस्थता के कारण फोन नहीं कर पाया। सामान्यत: पौने छ बजे करता हूं। मैंने फोन नहीं किया तो उनका फोन आया। सात बजे। उन्हें खांसी आ रही थी। शायद सर्दी लग गयी है। पर चले वे जोश में ही हैं। आज पैंतीस किलोमीटर आगे चल कर रात्रि विश्राम का प्लान है। आगे की योजना भी उनके मन में साफ होती जा रही है। अमरकण्टक से वे ॐकारेश्वर की ओर निकलेंगे।

आगे यह मानसिक यात्रा जारी रहेगी। कल फिर नयी पोस्ट होगी सवेरे इग्यारह बजे। इस बीच कुछ खास रहा तो वह माइक्रोब्लॉगिंग के रूप में फेसबुक या ट्विटर पर पोस्ट होगा।



प्रेम कांवरिया – पैर छिले हैं। विश्राम। रींवा।


8 सितम्बर 2021:

कॉर्डियॉलोजिस्ट ने 12-15 टेस्ट लिखे। हर जगह टेस्ट करने वालों को यह बताया कि यह मेरा भतीजा है (वे डाक्टर साहब भी संयोग से पांड़े थे), इसका टेस्ट फ्री में कर दिया जाये। टेस्ट के बाद पंद्रह दिन की दवायें भी उन्हें फ्री में दीं और उन्हें पैदल चलने का एक अनुशासन बताया। पहले दिन थोड़ा और उत्तरोत्तर बढ़ाते हुये। प्रेम सागर ने वही किया। और अब चलने की धुन इतनी हो गयी है कि 12 ज्योतिर्लिंग पदयात्रा कर रहे हैंं! … प्रेमसागर के लिये शिव जी ने ब्रह्मा जी का लिखा उलट दिया है!

दो सितम्बर को बनारस से बाबा विश्वनाथ को जल चढ़ाने के बाद नित्य चले हैं प्रेम सागर। कल शाम रींवा पंहुचे। पैदल चलने के हिसाब से आकलन करें तो चालीस-पैंतालीस किलोमीटर प्रतिदिन तय किया। विंध्याचल की खड़ी चढ़ाई पार की। बारिश में भीगे और बचने को दौड़ भी लगाई। मध्यप्रदेश में प्रवीण दुबे जी और वन विभाग के अधिकारियों-कर्मियों से सहयोग भरपूर मिला; ठहरने और आतिथ्य की जो सुविधा मिली, शायद उसकी कल्पना नहीं की होगी यात्रा प्रारम्भ करते समय। पर चलना तो उन्हें ही था। अकेले।

आज सवेरे प्रेम सागर जी से बात हुई। वे वन विभाग के रेस्ट हाउस में हैं। आराम की सुविधा है। आज वे विराम कर रहे हैं यात्रा के दौरान। उन्होने बताया कि पांव छिल गये हैं। कोई पाउडर ले कर लगाया है। एक दिन के आराम से पांवों की दशा ठीक हो जाने की उम्मीद है उन्हें। दिन में आसपास निकल कर देखेंगे।

रींवा के बारे में वे कहते हैं कि दृश्य बहुत अच्छा है। कल शहर में आने के लिये उन्हें पांच सात किलोमीटर डी-टूर करना पड़ा हाईवे से। पर महसूस नहीं हुआ। शहर साफ है और सड़कें अच्छी हैं। वे आसपास के चित्र ले कर भेजने का प्रयास करेंगे।

कल दिन में इग्यारह बजे देवतलाब के शिव मंदिर में थे। यह प्राचीन मंदिर है। प्रेम सागर ह्वाट्सएप्प मैसेज में बताते हैं कि अपने वनवास के दौरान राम यहां आये थे और शिव जी की पूजा की थी – “देव तालाब का पुरातन मंदिर। कहा जाता है कि राम लक्ष्मण सीता यहाँ आ कल बाबा का पूजा किए थे। हर हर महादेव!”

देवतलाब मंदिर के अधिकांश चित्र, जो प्रेम सागर जी ने भेजे हैं, धुंधले हैं। उनका हाथ चित्र लेते समय हिल जाता है। मैं इस दुविधा में रहता हूं कि उनके चित्र का प्रयोग करूं या गूगल मैप के चित्रों का स्कीन शॉट। फिलहाल मैं मुख्यत: उन्ही के चित्र पोस्ट कर रहा हूं।

देवतलाब शिव मंदिर के बारे में सर्च करने पर पत्रिका में छपी एक रोचक किंवदंति सामने आयी। महर्षि मारकण्डेय यहां शिव जी के दर्शन के लिये हठ कर साधना कर रहे थे। तब शंकर भगवान ने विश्वकर्मा जी को रातोंरात मंदिर खड़ा करने और शिवलिंग स्थापना का आदेश दिया। यह मंदिर, किंवदंति के अनुसार रातोंरात बना।

महर्षि मारकण्डेय की हठी शिव साधना की कथा कैथी (छोटी काशी, बनारस के पास गंगा-गोमती संगम के समीप) की भी है। कैथी का मेरा अनुभव भी कांवरियों को ले कर ही है!

मारकण्डेय जी के पिता को बताया गया था कि बालक (मारकण्डेय) पैदा तो हुआ है, पर बारह (उन्नीस?) वर्ष की अवस्था में वह मर जायेगा। सो बालक छोटी काशी में शिव साधना करने लगा। आयु पूरा होने पर जब यमराज उसे लेने आये तो वह शिव जी की पिण्डी पकड़ कर बैठ गया। शिव जी को साक्षात प्रकट हो कर यमराज को आदेश देना पड़ा कि वे मारकण्डेय को नहीं ले जा सकते। इसी बात पर मेरे साले साहब ने मुझे कहा था – “जीजा जी, शिव भक्त होते ही हाफ मैण्टल हैं। वे ही इतना जुनून भरा काम कर सकते हैं। बाकी लोग तो जोड़-बाकी, किंतु-परंतु करने में ही अटक जाते हैं। और इन जैसों के लिये शिव जी ब्रह्मा का लिखा भी उलट देते हैं। आप से प्रेम सागर पांंड़े को मिलवाया, यह भी शंकर भगवान की कारस्तानी है!”

प्रेम सागर के जीवन में मारकण्डेय ऋषि टाइप अनुभव

प्रेम सागर जी ने मुझे मेरे घर पर बताया था कि पांच छ साल पहले उन्हें दिल की बीमारी हुई। वे 5-6 मीटर भी नहीं चल पाते थे। लखनऊ के पास वे पीजीआई में गये थे, पर वहां जो इलाज के खर्च का आकलन बताया गया, वह उनके बूते में नहीं था। संयोग से लखनऊ में एक सहृदय कार्डियॉलॉजिस्ट मिले। उन्होने पूछा कि इलाज कैसे कराना चाहोगे? पैसा देकर या वैसे?

प्रेमसागर ने कहा कि पैसा तो है ही नहीं। डाक्टर साहब ने 12-15 टेस्ट लिखे। हर जगह टेस्ट करने वालों को यह बताया कि यह मेरा भतीजा है (वे डाक्टर साहब भी संयोग से पांड़े थे), इसका टेस्ट फ्री में कर दिया जाये। टेस्ट के बाद पंद्रह दिन की दवायें भी उन्हें फ्री में दीं और उन्हें पैदल चलने का एक अनुशासन बताया। पहले दिन थोड़ा और उत्तरोत्तर बढ़ाते हुये। प्रेम सागर ने वही किया। और अब चलने की धुन इतनी हो गयी है कि 12 ज्योतिर्लिंग पदयात्रा कर रहे हैंं! … प्रेमसागर के लिये शिव जी ने ब्रह्मा जी का लिखा उलट दिया है!

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची

आज प्रेमसागर विश्राम कर रहे हैं। मुझे स्टीफन कोवी के इफैक्टिव लोगों के एक गुण – Sharpen the Saw – की याद आ रही है। सप्ताह में एक दिन अपनी ऊर्जा को संचित करने, अपनी टूट-फूट को रिपेयर करने और आगे की योजना बनाने में लगाना चाहिये। अपनी कुल्हाड़ी को तेज करते रहना चाहिये। भोंठ कुल्हाड़ी से लकड़ी नहीं चीरी जा सकती!

प्रेम सागर वही कर रहे हैं।

उन्होने आज अवकाश के दिन, रींवा के वन विभाग के करीब दस एकड़ के हरे भरे परिसर के दर्जन से ज्यादा चित्र भेजे हैं। प्रवीण चंद्र दुबे जब वहां पदस्थ थे, तब के उनके लगाये गये उद्यान के चित्र हैं। प्रवीण जी वहां 2005-8 के दौरान चार साल रहे। इस उद्यान में मध्यप्रदेश की वनस्पतीय विविधता है। लोग वहां सवेरे सैर के लिये आते हैं।

उसके बारे में अलग से, अगली पोस्ट में लिखूंगा।

रींवा में वन विभाग का उद्यान



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