रामप्रसाद तीर्थयात्री का निमन्त्रण


शाम का समय। सूर्यास्त से कुछ पहले। एक बस मेरे गांव के पास रुकी थी। अच्छी टूरिस्ट बस। उसके यात्री नेशनल हाईवे 19 की मुंड़ेर पर बैठे थे। एक बड़े पतीले में गैस स्टोव पर कुछ गर्म हो रहा था। एक व्यक्ति आटा गूंथ रहा था। सब्जियां भी कट रही थीं। शाम का भोजन बनने की तैयारी हो रही थी। बस बनारस से प्रयागराज की ओर जा रही थी।

पूर्णिमा के एक दिन पहले की शाम थी। चांद उग गया था। लगभग गोल। अगले दिन प्रयागराज में माघी पूर्णिमा का शाही स्नान था। सवेरे लोग संगम पर स्नान करेंगे शायद।

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मधुमक्खी का गड़रिया – शम्भू कुमार


हफ्ता भर हो गया गांव में डेरा जमाये। उमेश दूबे के खेत में उन्होने करीब डेढ़ सौ मधुमक्खी के बक्से बिछा रखे हैं। लगभग दो हफ्ते भर और रहेंगे यहां। फिर उनकी मधुमक्खी पालक कम्पनी का मालिक जहां के लिये कहेगा, वहां के लिये रवाना हो जायेंगे।

खाली पड़े खेत में बिछाये मधुमक्खी के बक्से

वे तीन लोग हैं। कम्पनी के कर्मचारी। उनमें से एक – शम्भू कुमार से बातचीत हुई। शम्भू बीस-पच्चीस साल का नौजवान होगा। बिहार के मुजफ्फरपुर का है। कम्पनी भी वहीं की है। उसने बताया कि मुजफ्फरपुर लीची के लिये तो प्रसिद्ध है ही, मधुमक्खी पालन के लिये भी हो गया है। हजारों लोग वहां इस काम में लगे हैं। सामान्यत: वे पांच-छ के समूह में चलते हैं। यहां अभी तीन लोग हैं।

घुमंतू हैं वे। बंगाल, झारखण्ड, बिहार, उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश के कई इलाकों में वह जा चुका है मधुमक्खियाँ ले कर। साल भर में 10-15 जगह का भ्रमण हो जाता है। जैसे गड़रिये, गाड्डुलिये लोहार, बतख का रेवड़ ले कर चलने वाले हैं। वैसे ही ये मधुमक्खी का रेवड़ ले कर घूमते फिरते हैं। पिछले साल भर में मैने गड़रिया, बतख के 1500 का रेवड़ ले कर चलने वाला और गाड्डुलिये लोहार देखे हैं अपने गांव के आसपास। ये मधुमक्खी वाली चौथी घुमंतू किस्म पायी है। शहर में तो ये सब दिखते ही नहीं।

शम्भू ने बताया कि ये मधुमक्खियां बक्सों में लगी जालियों पर रहती हैं। पेड़ों पर छत्ता लगाने वाली मधुमक्खियां दूसरी प्रकार की हैं। वे जंगलों में या बड़े पेड़ों पर 10 मीटर की ऊंचाई पर छत्ते लगाती हैं। ये वाली तो जमीन पर अपने बक्से में रहती हैं।

मधुमक्खी कर्मी शम्भू कुमार

सवेरे सात बजे के आसपास ये मधुमक्खियां निकलने लगती हैं। दिन भर अपने छत्ते पर आती जाती हैं। करीब दो-ढ़ाई किलोमीटर के क्षेत्र में फूलों के पराग से मधु इकठ्ठा करती हैं।

साल भर उन्हें अलग अलग इलाकों में मधु इकठ्ठा करने के अवसर मिलते हैं। अभी तो वसंत आने को है। सब तरफ फूल हैं। गर्मी पड़ने लगेगी तो मुजफ्फरपुर के इलाके में लीची का मौसम होगा। उस समय वहीं इन मधुमक्खियों के लिये पराग मिलेगा। बारिश के मौसम में, जब पराग नहीं होता, इन्हें जिंदा रखने के लिये चीनी का घोल बना कर रखना पड़ता है।

मधुमक्खियों में भी अन्य पशुओं-जीवों की तरह रोग लगते हैं। लांगर लगता है – एक तरह का मधुमक्खियों का पोलियो। कई बार इनके पंख झड़ने लगते हैं। कम्पनी का मालिक इनकी सेहत के लिये फिक्रमंद रहता है और इंतजाम करता है। जिस रास्ते से ये अपने बक्से से बाहर आती जाती हैं, उसी के पास दवाई का फाहा रखा जाता है इन्हें दवा देने के लिये। अगर इनका रखरखाव ठीक हो तो अपने समूह में इनकी संख्या बढ़ती रहती है। नया ‘बीज’ खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती।

जहां दीमक हों, वहां बक्सों को दीमक से बचाना पड़ता है। उन्हें जमीन पर रखने की बजाय ग्लास के पाये पर रखा जाता है। वर्ना नुक्सान होने की सम्भावना है। दीमक बड़ी तेजी से लकड़ी के बक्सों को बरबाद करती हैं। इसका ध्यान रखना पड़ता है।

शम्भू ने एक बक्से का ढक्कन हटाया और मैने नजदीक से चित्र लिया। अनेक मक्खियां थीं उसमें।

मैने उन बक्सों के पास से चित्र लेने के लिये शम्भू से कहा। वह मुझे अपने साथ बक्सों के पास ले कर गया। बोला – “वैसे तो नहीं काटेंगी, पर काट भी सकती हैं”। कुल मिला कर आप उनके चित्र लें, पर अपने रिस्क पर। :lol:

एक बक्से में करीब छ-सात प्लेटें थीं। उनमें जाली बनी थी। मधुमक्खियाँ उन्ही पर बैठती-रहती हैं। हर मधु मक्खी को अपना ठिकाना पता होता है। वह भटकती नहीं। प्रकृति का चमत्कार।

खेत में मधुमक्खियों के बक्सों को लाइन से रखा गया था। एक तरफ उन लोगों ने अपने रहने के लिये टेण्ट लगा रखा था। एक अन्य कर्मी दिखा जो मधुमक्खियों के बीच काम कर रहा था। उसने हैटनुमा टोपी पहन रखी थी। हैट से जाली उसके चेहरे पर लटक रही थी, जिससे चेहरे का मधुमक्खियों से बचाव हो सके। उसके अलावा उसका पूरा शरीर ढ़ंका हुआ था।

करीब आधा घण्टा वहां रहा मैं और ब्लॉग के काम लायक जानकारी और चित्र इकठ्ठा किये। ज्यादा लिखना हो और ज्यादा समझना हो तो उनके साथ लम्बा समय गुजारना होगा। उसके लिये धैर्य चाहिये। शायद कभी पुस्तक लिखने का जुनून चढ़े और लेखन से आमदनी होने की सम्भावना बने तो वह भी हो। पर फिलहाल तो यहीं सब चल रहा है – रोज अपने आसपास के इलाके में घूमना, देखना और उसपर ब्लॉग या माइक्रोब्लॉग पोस्ट लिखना। सामान्यत: यह रोचक लगता है पर कभी कभी बोझिल भी लगने लगता है।

एक टेण्ट लगा रखा था खेत में उन मधुमक्खी पालकों ने।

फिलहाल, शम्भू कुमार से मिलना, मधुमक्खियों के बारे में जानकारी लेना और चित्र खींचना अच्छा लगा।



श्रीराम बिंद की मटर


वह पास के गांव में रहता है अपनी “बुढ़िया” के साथ। दो लड़के हैं, दोनो बनारस में खाते-कमाते हैं। एक ऑटो चलाता है और दूसरा मिस्त्री का काम करता है किसी भवन निर्माण की फर्म में। उसके पास दो बिस्सा खेत है और गाय। गाय आजकल ठीक ठाक दूध दे रही है। मुझे दूध सप्लाई करने की पेशकश की थी, पर हमें जरूरत न होने पर वह अपने लड़कों और उनके परिवार के लिये बनारस ले कर जायेगा। “इही बहाने उन्हनेऊं दूध इस्तेमाल कई लेंईं (इसी बहाने उन्हें भी मिल जाये दूध)।

दो बिस्सा जमीन में मटर बोई थी। चार दिन पहले वह लाया था बेचने। 14रुपये किलो दी थी। बहुत अच्छी और मीठी मटर। लम्बी छीमी और हर छीमी में 6-9 दाने। स्वाद लाजवाब था – इस मौसम की सबसे बेहतरीन मटर थी वह। दो बिस्वा (1 बिस्वा बराबर 125 वर्ग मीटर) खेत में बहुत ज्यादा तो होती नहीं। आज दूसरी बार तोड़ी तो आसपड़ोस वाले ही ले गये। किसी तरह से 3 किलो बचा कर लाया हमारे लिये।

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