गंगा तट की सुनहरी शाम और सुरती शेयर का समाजवाद – कोविड19

सुरती, दारू की तरह बहुत सामाजिक टाइप की चीज है। अजनबी व्यक्ति भी सुरती फटकने वाले के पास खिंचा चला आता है। वह निसंकोच सुरती मांग लेता है और देने वाला सहर्ष देता भी है।


मैं अकेला था द्वारिकापुर में गंगा किनारे। सूर्यास्त होने में पंद्रह मिनट बचे थे। उस दौरान नदी, बबूल, उखमज, मकड़ी के जाले, शाम के समय अपना रेवड़ हाँकते गड़रिये, बालू ढ़ोने वाली नावें (जो काम रुका होने के कारण नदी किनारे पार्क की हुई थीं और उनके आसपास कोई नहीं था) आदि को मोबाइल के कैमरे में कैद कर रहा था। इस बीच नजर फिराई तो किनारे ऊचाई पर ये दो अधेड़ सज्जन अचानक कहीं से प्रकट हुये दिखे।

गेरुआ वस्त्र पहने व्यक्ति मुझे लगा कि कोई साधू होगा जो शाम के समय सध्यावंदन के लिये गंगा तट पर चला आया होगा। और दूसरा उसका चेला… पर यह समझने में देर नहीं लगी कि ये यहीं पास के गांव के गृहस्थ हैं। शायद मित्र।

गेरुये सज्जन माला नहीं जप रहे थे। हाथ में सुरती मल रहे थे और खड़े हुये सज्जन उस मलने की क्रिया का अवलोकन कर रहे थे। सुरती तैयार होने पर गेरुये ने कहा – आवअ, ल (आओ, लो)।

खड़े जी गेरुये के पास बैठ कर सुरती में अपना हिस्सा लेने लगे। दोनो में पर्याप्त सौहार्द लग रहा था।

सुरती, दारू की तरह बहुत सामाजिक टाइप की चीज है। अजनबी व्यक्ति भी सुरती फटकने वाले के पास खिंचा चला आता है। पूर्वांचल में, जहां पर्याप्त विपन्नता है और चाय शेयर करना अमीरी की श्रेणी में आता है; सुरती शेयर करना व्यापक है। यह वस्तु अजनबी भी (निसंकोच) मांग लेता है और देने वाला सहर्ष देता भी है।

एक मनोविनोद भी है – कृष्ण चले बैकुण्ठ को, राधा पकरी बांंय, हिंया तमाकू खाय लो, उहां तमाकू नांय (कृष्ण वैकुण्ठ को चलने लगे तो राधा ने बाँह पकड़ कर कहा कि तम्बाकू (सुरती) तो खाते जाओ। वहाँ नहीँ मिलेगी सुरती)। 😆

समाजवादी पार्टी को साइकिल की बजाय बाबा छाप सुरती को अपना चुनाव चिन्ह बनाना चाहिये था। वह साइकिल की अपेक्षा कहीं ज्यादा सशक्त समाजवादी चीज है।

आजकल कोरोनावयरस के आतंक के युग में आईसीएमआर (Indian Council of Medical Research) ने पान मसाला, गुटका आदि न सेवन करने की एडवाइजरी जारी की है। उस कारण से उत्तरप्रदेश सरकार ने पान मसाला और तम्बाकू/गुटखा पर पाबंदी लगा रखी है। सिगरेट कम्पनियों ने महीने भर के लिये अपनी फैक्टरियाँ बंद कर दी हैं। पर कच्चे तम्बाकू और चूने की जनता की चुनौटियाँ आबाद हैं। मैंने लोगों को मास्क या गमछा लपेटे पर सुरती मलते देखा है।

“कोरौनवा सुरती खाई क मरि जाये (कोरोना भी सुरती खा कर मर जायेगा)” यह सुरती प्रेमी को कहते सुना है।

खैर, हास्य छोड़ दें; पर गंगा तट पर सांझ की सुनहरी किरणों की छाया में सुरती शेयर करते ये सज्जन बहुत शानदार और जानदार दृष्य प्रस्तुत कर रहे थे। अगर सोशल डिस्टेंसिंग का झमेला न होता तो मैं उनके पास जाता और कुछ बातचीत करता। उससे शायद यह पोस्ट और वजन रखती।


गाँव देहात और गंगा तट का एकांत

सुबह शाम सूरज की किरणें, गंगा नदी का बहाव, बबूल के झुरमुट और उनके झाड़ों पर उखमज (पतिंगे) वैसे ही हैं, जैसे थे। किसी आयरस-वायरस का कोई प्रभाव नहीं।


सामाजिक दूरी में प्रकृति से दूरी बनाना शामिल नहीं है। शहरों में सड़कें वीरान हैं तो वन्य जीव उनपर विचरने चले आ रहे हैं – ऐसी खबरें आये दिन आ रही हैं। सामाजिक अलगाव जो रिक्तता उपजाता है, प्रकृति उसे भरने के लिये पंहुच जाती है।

यहाँ, गांवदेहात में, कोविड19 के कारण लोग सतर्क हैं, पर अपना कामधाम किये जा रहे हैं। अर्थव्यवस्था के रुक जाने का हाहाकार शहर में ज्यादा है। गांव में तो लोग सरसों की कटाई-दंवाई कर चुके। अरहर कट रही है। गेंहूं की फसल तैयार है और कहीं कहीं किसान ने कटाई शुरू भी कर दी है।

अरहर की खेप ले जाने को सड़क पर खड़ा ठेला (सगड़ी)।

भेड़-बकरी चराने वाले उसी तरह चरा रहे हैं, जैसे पहले चराते थे। गांव का किराने के सामान वाला वैसे ही दुकान खोलता है, जैसे पहले खोलता था। पाही पर चाय बनाने और समोसा तलने वाला भी अपनी गुमटी पर बैठता है। डण्डा फटकारने वाली पुलीस का यहां कोई हस्तक्षेप नहीं।

एक गेंहू के खेत में मुझे आवाज से लगा कि वहां फसल कटाई चल रही है। पर ध्यान से देखने पर पता चला कि एक नीलगाय का झुण्ड खेत में है और खड़ी फसल चर रहा है। मेरे पास कैमरा नहीं था और मोबाइल के कैमरे से मात्र अहसास सा ही दर्ज हुआ उस झुण्ड के कद्दावर पुरुष-नीलगाय का।

खेत में बायें जो धब्बा दिख रहा है, वह कद्दावर नीलगाय है। मुझसे उसकी दूरी 15 मीटर रही होगी।

बच्चों पर सोशल अलगाव का ज्यादा असर नहीं पड़ा है। वे खाली पड़े खेतों और सड़कों पर आइस पाइस, कबड्डी या क्रिकेट खेलते दिख जाते हैं। सुबह भी और शाम को भी।

बाकी, सुबह शाम सूरज की किरणें, गंगा नदी का बहाव, बबूल के झुरमुट और उनके झाड़ों पर उखमज (पतिंगे) वैसे ही हैं, जैसे थे। किसी आयरस-वायरस का कोई प्रभाव नहीं।

केवल कुछ वयस्क लोग दिखते हैं मुँह ढंके।

(पोस्ट के चित्र लेने की कवायद में किसी व्यक्ति के पास आने का न प्रयास किया गया और न कोई आसपास आया। सोशल डिस्टेंसिंग का पालन हुआ।)


कोविड19 प्रसार, मसाले, गिलोय और इम्युनोलॉजी

भारत के लोगों में मसालों का प्रचुर प्रयोग शायद उन्हें इस प्रकार की रोग प्रतिरोधक क्षमता देता है कि कोरोना वायरस के ग्रसित लोग; बढ़ी उम्र और को-मॉर्बिडिटी होने के बावजूद ठीक ज्यादा हुये और उनको वेण्टीलेटर की जरूरत पश्चिमी देशों की अपेक्षा कहीं कम पड़ी।


कोविड19 का प्रसार पिछले दो दिनों में तेजी से हुआ है। तबलीगी जमात की कृपा (?) से मामले तेजी से बढ़े और पूरे देश को इन लोगों ने धांग दिया। टेस्टिंग की सुविधायें भारत में वैसे भी ज्यादा नहींं थीं। उनपर दबाव और बढ़ गया। शायद एक तिहाई टेस्टिंग तबलीगी जड़ता को समर्पित हो गयी। पुलीस अपना जरूरी काम छोड़ मस्जिदों को खंगालने लगी। यह तबका सहयोग ही नहीं कर रहा था। इंदौर में तो इन शूरवीरों ने नर्सों-डाक्टरों-आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को पत्थर मारे और दौड़ाया। अन्य स्थानों पर इन महानुभावों द्वारा पुलीस पर थूकने, नर्सों से अश्लील इशारे करने और डाक्टरों से अभद्र बर्ताव करने के केस भी सामने आये हैं। लॉकडाउन को पर्याप्त क्षति पंहुचाई है इस जमात ने।

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गांव में रिहायश – घर के परिसर की यात्रा : रीता पाण्डेय

घर में अपने पति समेत बहुत से बच्चों को पालती हूं मैं। ये पेड़-पौधे-गमले मेरे बच्चे सरीखे ही हैं। ये सब मिलकर इस घर को एक आश्रम का सा दृष्य प्रदान करते हैं। बस, हम अपनी सोच ऋषियों की तरह बना लें तो यहीं स्वर्ग है!


रीता पाण्डेय (मेरी पत्नीजी) कोरोनावायरस के लॉकडाउन समय में नित्य एक – दो पन्ने लिख रही हैं। किसी भी विषय में। शायद रोज लिखना ही ध्येय है। भला हो इस कोविड19 के कठिन समय का कि यह लेखन हो रहा है। मेरे जिम्मे उस लेखन को टाइप कर ब्लॉग में प्रस्तुत करने का काम रहता है। वह करने में भी एक आनंद है।

प्रस्तुत है, रीता पाण्डेय की आज की पोस्ट –

पति के रिटायरमेंट के बाद, अगले ही दिन, हमारे रहने की जगह बदल गयी। घर में उनकी दिनचर्या में बहुत बदलाव आया। पर मेरी दिनचर्या लगभग वैसी ही रही। आखिर, मैं तो रिटायर हुई नहीं थी; और होना भी नहीं चाहती।

अभी भी (रेलवे के बंगलों की तरह) मेरे घर का परिसर काफी बड़ा है। आजकल कोरोनावायरस के लॉकडाउन के समय में उसी परिसर में मेरी यात्रा होती है। सुबह की चाय का ट्रे बाहर बराम्दे में रखने के बाद जब नजर घुमाती हूं तो लाल गुड़हल के फूल आमंत्रित करते हैं। कुछ फूल भगवान के चरणों में समर्पित करने के लिये रख लिये जाते हैं तो कुछ डाल पर मुस्कराने के लिये छोड़ दिये जाते हैं।

अभी भी (रेलवे के बंगलों की तरह) मेरे घर का परिसर काफी बड़ा है।

उसके पास बोगनबेलिया है। श्रीमाँ ने उनका नामकरण किया था – डिवाइन प्रोटेक्शन। अचानक अमरूद पर नजर जाती है। दो साल पहले लगाया था। तेजी से बढ़ा है पौधा। पिछली साल दो बार फल दिये थे। अभी उसमें फिर फूल खिलने की तैयारी हो रही है।

बोगनबेलिया है। श्रीमाँ ने उनका नामकरण किया था – डिवाइन प्रोटेक्शन।

अमरूद की तरफ ही पपीता है। वह भी फल देता रहा है और देने को तैयार हो रहा है। कलमी आम के वृक्ष तो कई हैं पूरे परिसर में। दो-तीन साल पहले लगाये गये। उनकी ऊंचाई ज्यादा नहीं बढ़ेगी। पर उनपर भी बौर आये हैं और अब टिकोरे लग रहे हैं। सामने की क्यारियों में कोचिया कुछ उदास करते हैं, पर उन्ही के साथ गमलों में लगाये कोचिया स्वस्थ हैं। उन्हे देख प्रसन्नता होती है। चम्पा के पत्ते तो पूरी तरह झड़ चुके हैं। अब उनका कलेवर बदल रहा है।

गुड़हल की कई किस्में हैं। कई रंग।

फागुन से पीला गुड़हल भी खिलने लगा। गुलाब तो अपने शवाब पर है! हल्का गुलाबी अमेरिकन गुड़हल पर भी कलियां लगने लगी हैं।

पीले अलमण्डा की बेल ऊपर तक चली गयी है। अचानक नजर गयी तो उसकी फुनगी पर कुछ फूल भी नजर आये। इस बार भयानक बारिश और उसके बाद कड़ाके की लम्बी चली सर्दी में कई पौधे गल-मर गये। ऐसा लगा कि कई पौधे नर्सरी से लाकर फिर से लगाने पड़ेंगे। पर पाया है कि अपराजिता फिर से हरियरा गयी है और झुलसी तुलसी में नये पत्ते आ गये हैं।

कुछ ही वर्षों में पेड़ और बेलें घर को आच्छादित कर देंगे।

घर के पीछे की ओर भी कई पौधे हैं। कई बेलें। वहां एक लीची का पौधा भी लगाया है। गंगा के इस इलाके में चलेगा या नहीं, अभी देखना बाकी है। नीबू का झाड़ हरा भरा है। उसमें कई फूल लगे पर फल लगने के पहले ही झर गये। शायद अगले सीजन में लगें, जब झाड़ और बड़ा हो जायेगा। दिया तो गंधराज कह कर दिया था नर्सरी वाले नें। देखें, क्या निकलता है!

नीम के किशोर वृक्ष हर तरफ हैं। उनके सारे पत्ते झर चुके हैं और नये आ रहे हैं। कुछ ही दिनों में ये हरे भरे हो जायेंगे। केले का एक गाछ है। पिछली बार उनके पेड़ पर प्राकृतिक तरीके से पके केलों का स्वाद ही निराला था। और फल कई दिन रखने पर सड़े-गले नहीं थे।

केले का गुच्छा।

घर के पीछे एक नल है। नौकरानियों के लिये एक प्रकार का पनघट। वे यहां हाथ पांव धोने, नहाने, कपड़ा कचारने, नाश्ता-भोजन करने और बतकही/पंचायत के लिये आती हैं। आजकल यह कोरोनावायरस के लॉकडाउन के कारण वीरान जगह है। इस जगह पर अब बर्तन भर मांजे-धोये जा रहे हैं।

इसी नल के पास एक पारिजात – हारसिंगार – का वृक्ष है। उसकी बगल में चार साल की उम्र का पलाश। पलाश के फूल इस साल देर से आये हैं। हमारे इस पलाश में तो पहली बार ही आये हैं। अभी नया नया पेड़ बना है ये पलाश।

पहली बार फूला है पलाश

घर की इस यात्रा में और भी छोटे मोटे पड़ाव हैं। पीछे चारदीवारी में खेत की ओर जाने का एक छोटा गेट है, जिससे गेंहू का खेत दिखता है। उसके आगे सागौन के पेड़ हैं। घर के ऊपर – दूसरी मंजिल के ऊपर सोलर पैनल है। वहां खड़े हो कर गांव का हराभरा दृष्य बहुत सुंदर लगता है।

घर के पोर्टिको में गमले हैं। उनमें लगे पौधे अपनी आवश्यकता अनुसार मुझे बुलाते रहते हैं। किसी को पानी चाहिये होता है, किसी को धूप या किसी को छाया। कोई कोई तो मानो बात करने के लिये ही बुलाता है। वे हरे भरे होते हैं तो मन प्रसन्न होता है। कोई बीमार हो जाता है तो मन खिन्न होता है। बिल्कुल किसी परिवार के सदस्य की दशा देख कर।

घर में अपने पति समेत बहुत से बच्चों को पालती हूं मैं। ये पेड़-पौधे-गमले मेरे बच्चे सरीखे ही हैं। ये सब मिलकर इस घर को एक आश्रम का सा दृष्य प्रदान करते हैं। बस, हम अपनी सोच ऋषियों की तरह बना लें तो यहीं स्वर्ग है!


यात्रायें, यादें और कोविड19 – रीता पाण्डेय

भरतपुर में मालगाड़ी को सिगनल मिल गया था। वह हिलने लगी तब स्टेशन मास्टर साहब दौडते हुये आये और अपने घर से बनी चाय और पेपर कप हमें थमा दिये। हिलते ब्रेकवान में खड़े खड़े हमने गार्ड साहब से शेयर करते चाय पी। … मेरे और मेरे बच्चों के लिये यह यादगार अनुभव था।


रीता पाण्डेय लिखती चली जा रही हैं। लिखने बैठती हैं तो मालुम नहीं होता कि किस विषय पर लिखेंगी। अनेक विषय कुलबुलाते हैं। शायद कागज कलम उठाने तक तय नहीं होता और कुछ मिनट व्यतीत होने पर ही लिखने की प्रक्रिया प्रारम्भ होती है।

मेरे विचार से जो लिखा जाता है, उसकी एक दो बार एडिटिंग होनी चाहिये। हल्की फुल्की, वाक्य विन्यास और हिज्जों की एडिटिंग तो मैं कर दे रहा हूं, पर विचारों के प्रवाह में जो तरलता या गड्डमड्ड होना है, उसे जस का तस रख रहा हूं।

आखिर, ब्लॉग है ही खुरदरा लेखन। बहुत तराशने पर उसका मूल तत्व (प्रकार, या सौंदर्य) समाप्त होने का खतरा होता है।

आप रीता पाण्डेय का लिखा पढ़ें –


स्कूल में निबंध लिखने को कहा जाता था। गाय पर, त्यौहार पर या फिर यादगार यात्रा पर। यूं तो मैंने अपने जीवन में बहुत यात्रायें की हैं पर कुछ यात्रायें यादगार हैं।

उस समय बच्चे छोटे थे। दिल्ली में अपने भाई के घर छुट्टियां बिता कर रतलाम (जहां मेरे पति रेल सेवा में पदस्थ थे) आ रही थी बच्चों के साथ। ट्रेन सफर के पहले भाई ने कुछ पूरी-सब्जी साथ में दी थी। मन में था कि शाम तक रतलाम पंहुच जायेंगे। इस लिये ज्यादा भोजन रखने के लिये मैंए बहुत आनाकानी की। यह सोचा कि लंच केटरिंग से कोटा में मिल ही जायेगा। पर ट्रेन लेट होती गयी और होती गयी। रास्ते में कुछ नहीं मिला। कोटा पंहुचते पंहुचते शाम के सात बज गये। और वहां दूध, चाय और कुछ नाश्ता मिलने पर बड़ी राहत मिली।

एक बार दीपावली के अवसर पर हमें रतलाम से अपने पैतृक घर इलाहाबाद (अब प्रयागराज) जाना था। रेलवे में छुट्टी मिलना अंत समय तक निश्चित नहीं होता। एन मौके पर छुट्टी मिली और हम ताबड़तोड़ किसी खटारा रेलगाड़ी से रवाना हुये। ट्रेन को भरतपुर में छोड़ कर किसी अन्य ट्रेन से दिल्ली पंहुचना था। वहां से प्रयागराज एक्सप्रेस से इलाहाबाद। खटारा गाड़ी लेट होती गयी। भरतपुर में उतर कर लगा कि दिल्ली समय से पंहुच ही नहीं सकते।

ऐसे में ट्रेन कण्ट्रोलर ने जुगाड़ बिठाया। एक मालगाड़ी के ब्रेकवान में हमको बिठा कर मथुरा भेजने का इंतजाम किया। … भरतपुर में मालगाड़ी को सिगनल मिल गया था। वह हिलने लगी तब स्टेशन मास्टर साहब दौडते हुये आये और अपने घर से बनी चाय और पेपर कप हमें थमा दिये। हिलते ब्रेकवान में खड़े खड़े हमने गार्ड साहब से शेयर करते चाय पी। मेरे पति के पास तो इस तरह ब्रेकवान में चलने के बहुत अनुभव होंगे, पर मेरे और मेरे बच्चों के लिये यह यादगार अनुभव था। हम गार्ड साहब के डिब्बे की रेलिंग पकड़ कर पीछे जाती पटरी को ध्यान से देख रहे थे। ऐसा दृष्य पहले नहीं देखा था।

मथुरा में एक रोड वैहीकल का इंतजाम कर दिया था ट्रेन कण्ट्रोल ने। सो मथुरा से दिल्ली तक की यात्रा सड़क मार्ग से पूरी की। रेल सेवा के अमले का इंतजाम न होता तो हम किसी भी प्रकार नई दिल्ली पंहुच कर प्रयागराज एक्सप्रेस नहीं पकड़ सकते थे।

बहुत सी यादें रेल की पटरी के इर्द-गिर्द हैं।

रेलसेवा की बदौलत एक और यात्रा, जो वैसे न हो पाती, सम्भव हो सकी। रतलाम में दोपहर खबर मिली कि मेरी माताजी (सास) पीजीआई, लखनऊ में अकस्मात भर्ती की गयी हैं। उनके पैर में रक्त जम गया था और अगर ठीक नहीं हो पाया तो पैर की सर्जरी तक की सम्भावना थी। ट्रेन कण्ट्रोल ने आननफानन में यात्रा का इंतजाम किया। रतलाम से उज्जैन एक खटारा मेटाडोर वैन में यात्रा कर हम उज्जैन पंहुचे। वहां से मालवा एक्सप्रेस में आरक्षण करा दिया था मण्डल के नियंत्रण कक्ष ने, और उस ट्रेन से हमें आगरा पंहुचना था। आगरा सेण्ट्रल स्टेशन से लखनऊ किसी अन्य ट्रेन में यात्रा का इंतजाम किया गया।

उज्जैन पंहुचने में देर हुई। शायद बारिश के कारण या खटारा वाहन के कारण। लगा कि मालवा एक्सप्रेस मिस हो जायेगी। स्टेशन पर पंहुचे तो स्टेशन मास्टर साहब स्टेशन के बाहर इंतजार करते मिले। मालवा एक्सप्रेस प्लेटफार्म पर खड़ी थी। तेज चाल से चलते जब मालवा एक्सप्रेस में बैठे तो स्टेशन मास्टर साहब ने हल्के से बताया कि वह ट्रेन करीब आधा घण्टा हमारे लिये रोक रखी थी ट्रेन कण्ट्रोल ने। मास्टर साहब ने कहा कि आप फिक्र न करें – रतलाम मण्डल की सीमा के अंदर ही ट्रेन रनिंग पर ध्यान दे कर उसे भोपाल सही समय पर पंहुचा दिया जायेगा। वैसा ही हुआ। पर जब तक हम भोपाल नहीं पंहुचे, तब तक हमारे लिये मालवा एक्सप्रेस जैसी महत्वपूर्ण ट्रेन को आधा घण्टा रोकने का अपराध बोध होता रहा…

अभी तेरह मार्च को मेरी बेटी अपने पुत्र के साथ बोकारो से वाराणसी आयी थी। मैं भी उसके साथ एक सप्ताह वाराणसी में रही। उस दौरान कोरोनावायरस का हल्ला गम्भीर से गम्भीरतर होता गया। मेरे दामाद ने अपना वाहन भेज दिया था मेरी बेटी को वापस बोकारो ले जाने के लिये। पर जाना एक दो दिन यहां लोगों की मनुहार पर टला। इस बीच बाईस मार्च को मोदी जी द्वारा जनता कर्फ्यू की घोषणा हुई। अफरातफरी मच गयी। बिहार सरकार अपनी सीमायें सील करने का निर्णय कर चुकी थी।

रीता पाण्डेय और गंगा किनारे का सूर्योदय

बिटिया अपने वाहन में बैठ कर चलने ही वाली थी कि टेलीवीजन की खबरों से पता चला रास्ता बंद कर दिया गया है। वह वापस वाराणसी में अपने मामा के घर लौटी। … पर भला हो मेरे दामाद का। उन्होने पता किया कि बिहार सरकार ने अभी-अभी तो निर्णय ही लिया है। उसके कार्यान्वयन में इतनी तत्परता बिहार प्रशासन-पुलीस नहीं दिखा सकते। विवेक (दामाद) ने विवेक से काम लिया और वाणी-विवस्वान (बेटी-नाती) को तुरंत निकल चलने के लिये कहा। वाणी फिर यात्रा पर रवाना हुई और वास्तव में रास्ते में किसी ने कुछ नहीं पूंछा। सड़के वीरान थीं। जिस यात्रा में वाराणसी से बोकारो तक नौ-दस घण्टे लगते, वह उन्होने छ घण्टे में ही सम्पन्न कर ली। … पर जब तक रात दो बजे तक वह बोकारो पंहुच नहीं गयी, हमारी जान अटकी रही।

उसके और मेरे लिये यह यात्रा भय देने वाली और रोमांचक थी। कोविड19 के कालखण्ड का यह रोमांचक अनुभव था।


यात्रा – ये साधू थे जो मुझे बह्मावर्त (बिठूर) में गंगा किनारे मिले थे। यात्राओं की खुदरा यादें बहुत हैं। मेरे पास भी और रीता पाण्डेय के पास भी।

रीता पाण्डेय ने तो ऊपर कुछ यात्राओं के बारे में लिखा है। मुझे लगता है कि गरीब लोगों का कोरोनावायरस लॉकडाउन संदर्भ में जो पलायन हुआ है; जिस प्रकार पैदल, कण्टेनर में ठुंस कर या अन्य प्रकार से लोगों ने अकेले या सपरिवार यात्रायें की हैं; जिस प्रकार प्रशासन-पुलीस की क्षमता/अक्षमता देखी है; उसका विवरण अभूतपूर्व होगा। उस महापलायन पर अगर कोई मेमॉयर लिखे और पब्लिश हो तो चाहे जितनी कीमत हो, मैं खरीदूं और पढूंगा जरूर।