धूप सेवन और चोर गिलहरियों की संगत

सागौन के पेड़ के ऊपर एक गिलहरी दम्पति मोजे को ऊपर की ओर खींच रहे थे। वे हटाने पर आसपास चींचीं करते रहे, मानो उनकी सम्पत्ति हो और हम उसे जबरी हथियाने जा रहे हों। 😆


एक बोतल पानी, दो कुर्सियाँ जोड़ कर उनपर अधलेटा शरीर। मोबाइल पर चलता कोई पॉडकास्ट या गाना। घर में धूप खूब आती है और उसमें बैठने-लेटने का बहुत आनंद है। श्रीमती जी जब वहां गयीं तो पैरों मे मोजे पहने हुये थे। धूप की गर्मी में वे उतार कर पास की एक कुर्सी पर रख दिये।

धूप का आनंद लेतीं श्रीमती रीता पाण्डेय

एक दो घण्टे बाद जब मोजे देखे तो एक पैर का गायब था। कौन ले जायेगा? कौन कौन आया था घर में? पीछे अरहर के खेत में घास छीलने वाली स्त्रियां आती हैं। उनमें से कोई ले गयी? पर लेना भी होगा तो एक पैर का काहे ले जायेगी?

“फुआ, दूसरे पैर का वहीं रहने दें। जो एक पैर का ले गया है उसे कम से कम दोनो पैर का मिल जाये!” – घर में बर्तन मांजने वाली ने ठिठोली की।

“चेखुरा (गिलहरी) लई ग होये। सर्दी में ओन्हने खोथा बनवथीं। (सर्दी में वे अपना घर बनाती हैं।)” – दूसरी ने अपना कयास लगाया। खोथा बनाने की सम्भावित जगहें तलाशी गयीं पर मोजा कहीं नहीं मिला। एक पैर का मोजा घर में पड़ा रहा।

अगले दिन काम करने वाली ने चिल्ला कर कहा – होवा बा! (वहां है!)

सागौन की पत्तियों के बीच मोजा

सागौन के पेड़ के ऊपर एक गिलहरी दम्पति उसे ऊपर की ओर खींच रहे थे। वे हटाने पर आसपास चींचीं करते रहे, मानो उनकी सम्पत्ति हो और हम उसे जबरी हथियाने जा रहे हों। पेड़ के पास एक प्लास्टिक की कुर्सी पर चढ़ कर एक टहनी से पत्नी जी ने जुराब खींच कर पेड़ की पत्तियों से अलग की। उसमें छेद बना दिये थे गिलहरी ने। उसके बच्चों या उसे गर्माहट देने वाली तो होगी वह, पर हमारे किसी काम की नहीं थी। छेद छोटा नहीं था कि रफू कर काम चलाया जा सके। उसे वहीं पेड़ पर छोड़ दिया गया – गिलहरी के प्रयोग के लिये। अभी दूसरी जुराब भी वहीं ले जा कर छोड़ देने पर विचार चल रहा है! 😆

जुराब का यह हाल बना दिया था गिलहरी दम्पति ने।

पांच साल पहले जब यहां खेत में हमने घर बनाया था तो एक ही पेड़ था। उसपर चार पांच गिलहरियां रहती थीं। फिर पेड़ बढ़े। वनस्पति और लतायें बढ़ीं। गिलहरियों और चिड़ियों के लिये पानी और अन्न रखा जाने लगा। अब घर भर में तीन चार दर्जन गिलहरियां और एक दर्जन किस्म के पक्षी रहते हैं। उनके घोंसले भी दिख जाते हैं।

उस दिन माधवी लता की छंटाई करने के लिये माली जी गये तो एक छोटी मुनिया जैसी चिड़िया इतना चिल्लाई कि छंटाई का विचार त्याग दिया रामसेवक ने। देखा तो उसमें एक घोंसला पाया। ऐसे घोंसले घर में अप्रत्याशित स्थानों पर पाये जाये हैं। मुनिया, गौरय्या, बुलबुल और अब बया भी घोंसले लगा रही हैं हमारे परिसर में। चरखी और चेखुरा (गिलहरी) बहुतायत से हैं। वे यहां के मूल निवासी हैं। गिरगिट, उल्लू, कबूतर और नेवले भी आते जाते रहते हैं।

इस घोंसला वाली चिड़िया ने राम सेवक को लता की छँटाई रोकने को बाध्य कर दिया।

मेढ़क और सांप भी किसिम किसिम के हैं। एक छोटा मेढ़क तो दीवार पर चढ़ने में महारत रखता है। एक रात एक सांप तो टूटी जाली से स्नानघर में चला आया था। वह तो भला हो कि रात में लघुशंका के लिये जाने पर उसपर पहले नजर पड़ गयी। न चाहते हुये भी उसे मारना पड़ा। उसे पकड़ने की तकनीक अगर आती होती तो उसकी जान बच जाती।

इन सब जीवों में गिलहरियां और चरखियाँ सबसे ढीठ और चोर हैं। अन्न सूखने के लिये धूप में डाला जाये तो ये दोनो बहुत खा जाते हैं और खाने से ज्यादा जमीन पर गिरा कर बरबाद करते हैं। फिर चींटियां उन्हे ढ़ो कर ले जाती हैं। क्या करें; गांव में रह रहे हैं तो इनकी संगत में रहना ही है।

और अब तो इनकी संगत में रहना अच्छा भी लगता है! 😆

गिलहरियाँ और चरखी सुखाने रखे गेंहूं में अपना हिस्सा बटाते हुये।

अशोक शुक्ल ने दैनिक पूजा का लाभ बताया, और वह बड़ा लाभ है!

अशोक पण्डित ने कहा कि शोक और दु:ख अलग अलग मानसिक अवस्थायें हैं। जहां दु:ख का मूल अभाव में है; वहीं शोक अज्ञान से उपजता है – अज्ञान प्रभवं शोक: (गरुड़ पुराण)।


अशोक कुमार शुक्ल जी के घर लड़की की शादी पड़ी है। शादी के दिन मैं नहीं जा सकता था, तो एक दिन पहले उनके घर जा कर शगुन दे कर आने की सोची। घर पर अशोक थे जरूर, पर पूजा में बैठे थे। विवाह सम्बंधित कोई पूजा नहीं थी; उनकी दैनिक पूजा थी। बताया गया कि नित्य एक घण्टा पूजा में लगता है।

पूजा के बाद अशोक आये और साथ में चाय भी। पीते हुये मैंने उनसे पूछा – मैं आपकी पूजा के धार्मिक पक्ष की बात नहीं कह रहा। जानना चाहता हूं कि आपके रोज के कामकाज में इसका कोई महत्व है? इससे कोई लाभ होता है आपकी दैनिक गतिविधि में?

पण्डित अशोक कुमार शुक्ल अपनी दैनिक पूजा के बाद मिले।

“हां, बहुत लाभ है। दिन में कई बार ऐसा होता है कि मानसिक व्यग्रता होती है। हर व्यक्ति को होती है। एक बार व्यग्र होने पर व्यक्ति उससे बहुत देर तक जूझता है। पर पूजा का लाभ यह है कि मैं पांच या दस मिनट तक ही व्यग्र होता हूं। उसके बाद सोचता हूं, स्मरण (ईश्वर का स्मरण) करता हूं और व्यग्रता उनको सरेण्डर कर देता हूं।… उस समर्पण के बाद वह समस्या उनकी हो जाती है। नित्य पूजा के प्रभाव से यह स्मरण और समर्पण बड़े सहज तरीके से होता है। आदत की तरह। किसी किसी दिन जब पूजा में विघ्न होता है तो बेचैनी होती है।”

अशोक जी की इस बात से मुझे श्री अरविंद की याद हो आयी। वे Letters on Yoga में लिखते हैं – Step back and remember The Mother:

It is more difficult to separate oneself from the mind when it is active than from the body. It is quite possible however for one part of the mind to stand back and remember the Mother and receive her presence and the force while the other is busy with the work.

Meanwhile what you are doing is the right way.

Remember always that whatever the difficulties the Mother’s love is with you and will lead you through.

Ref: Letters on Yoga – IV

[आपके मस्तिष्क का एक भाग काम में लगा हो सकता है पर दूसरा भाग रुक कर माँ का स्मरण करता है। ऐसा करने से माँ का प्यार आपकी समस्याओं से आपको पार लगाता है।]

दो दशक पहले वह समय था जब मैं श्री अरविंदो आश्रम के साधकों से सम्पर्क में रहता था। उस समय थोड़े थोड़े समय पर रुक कर स्मरण (और समर्पण) का अभ्यास किया करता था और उससे मेरी व्यग्रता में बहुत कमी हुआ करती थी। आज पण्डित अशोक कुमार शुक्ल ने वही बात एक अन्य प्रकार से मेरे सामने रखी। आजकल मैं कई प्रकार के दु:स्वप्नों को अचेतन में देखता हूं और मन के पार्श्व में कुछ व्यग्रतायें हैं, जिनका स्वरूप और आकार मुझे स्पष्ट नहीं है। अनिश्चित भविष्य की व्यग्रतायें। अशोक पण्डित ने सुझा दिया कि उन व्यग्रताओं को असीम सत्ता को समर्पित/सरेण्डर कर देना एक पुख्ता समाधान है।

मुझे लगता है कि “स्टेप बैक एण्ड रिमेम्बर” एक प्रकार से सतत ध्यान (meditation) की आदत है। अन्य ध्यान पद्धतियां भी यह लाभ न्यूनाधिक मात्रा में देती होंगी।

उदाहरण के लिये मैंने पाया कि सेपियंस के प्रख्यात लेखक युवाल नोवा हरारी ने अपनी एकाग्रता और लेखन की उत्कृष्टता के लिये विपस्सना को बड़ा सहायक बताया है। दुनियां में जिन लोगों से वे प्रभावित हैं, उनमें विपस्सना गुरु एस जी गोयनका प्रमुख हैं। हरारी अपने जीवन में नित्य कार्यों की लिस्ट बनाने और उसके अनुसार चलने पर बहुुत जोर देते हैं और बताते हैं कि लिस्ट में सबसे महत्वपूर्ण आइटम दो घण्टे की विपस्सना होता है। उसी का परिणाम है कि वे अपने लेखन और अपने व्याख्यानों के लिये गहन चिंतन कर पाते हैं। सेपियंस उन्होने अपने हिब्रू विश्वविद्यालय में पहले साल के विद्यार्थियों के लिये दिये नोट्स के आधार पर लिखी थी। उसके पहले रूप की 2000 प्रतियां बिकीं। हरारी ने सोचा कि शायद यही सीमा है उनके लेखन की। पर उनके पति (वे समलैंगिक हैं) ने उन्हे विपस्सना के लिये प्रेरित किया। और उसका परिणाम है कि उनकी पुस्तकें कालजयी हो गयी हैं। आप उनके टिम फेरिस शो के इस पौने दो घण्टे के इण्टरव्यू का श्रवण करें।

अशोक जी का बड़ा कुटुम्ब है। वे छ भाइयों में सबसे बड़े हैं। पर शायद सबसे प्रतिभावान भी हैं। वे किसान भी हैं और संस्कृत के अध्यापक भी। जजमानी/पण्डिताई भी होगी। उनके बोलने का ढंग बहुत प्रभावी है। गांवदेहात में वैसी वक्तृता शक्ति कम ही मिलती है। उनके पिता बाला प्रसाद शुक्ल भी 84 वर्ष की उम्र में बहुत एक्टिव हैं। उनकी घनी शिखा जो उनके वक्ष तक आ रही थी, मुझे बहुत अकर्षक लगी। उनको मैंने चरण स्पर्श किया तो बहुत आत्मीयता से उन्होने आशीष दिया। लालचंद जी (जो मुझे उनके घर ले गये थे) ने बताया कि वे आस पास की जमीन में खुरपी ले कर लगे रहते हैं। शायद वही उनके स्वास्थ्य का राज है।

पण्डित बाला प्रसाद शुक्ल, अशोक कुमार जी के पिताजी।

अशोक जी ने अपनी व्यग्रता निवारण के लिये ही नहीं, अपने दु:ख और शोक से उबरने में भी दैनिक पूजा के महत्व को रेखांकित किया। उनके अनुसार अभावों के कारण दु:ख तो होते ही हैं। उनसे उबरने के लिये स्मरण और समर्पण बहुत काम आता है। उन्होने कहा कि शोक और दु:ख अलग अलग मानसिक अवस्थायें हैं। जहां दु:ख का मूल अभाव में है; वहीं शोक अज्ञान से उपजता है – अज्ञान प्रभवं शोक: (गरुड़ पुराण)।

शायद दु:ख तो कर्मठता और अपने जीवन के अभावों को दूर करने के यत्न से शमित हो सकते हैं; पर शोक के निवारण के लिये सत्य और मिथ्या के अंतर को समझना और अपने जीवन के मूलभूत दार्शनिक उत्तर पाने की जद्दोजहद से गुजरना होगा। दु:ख बाह्य प्रयत्नों के डोमेन में है। शोक की समझ के लिये अपने अंदर जाना होगा। ध्यान और पूजा (पूजा भी ध्यान की एक विधा है, नहीं? अशोक पण्डित के साथ बैठा तो इस पर चर्चा करूंगा) उसमें सहायक हो सकते हैं। या शायद वे ही औजार हों शोक की सर्जरी के।

सर्दी का मौसम, गुनगुनी धूप और अशोक कुमार शुक्ल जी से मुलाकात। मुझे लगा कि मेरा दिन बन गया। पिछले वर्ष मेरे पिताजी की मृत्यु हुई थी। माता के जाने के बाद वही मेरे माता-पिता थे। उनके जाने की रिक्तता अभी भी भरी नहीं है। शोक जब तब मौका पाता है, मेरे अंदर पसर जाता है। अशोक जी की मानूं तो वह मेरे अज्ञान में वास करता है।

ज्ञानी बनो, जीडी। केवल नाम भर ज्ञानदत्त होने से कोई समाधान नहीं होने वाला।


गिरीश चंद्र त्रिपाठी जी और वामपंथ से टकराव

त्रिपाठी जी ने वामपंथ से टकराव के अनेक मामले और अनेक लोगों से मिलने के प्रसंग मुझे बताये। उनसे मिलने पर लगा कि ये वामपंथी लिबरल-वाम एजेण्डा को बड़े शातिराना ढंग से शिक्षण संस्थानों और समाज में घोलने का काम करते हैं।


एक विवाह कार्यक्रम में गया था मैं। सूबेदार गंज, प्रयागराज के रेलवे परिसर में कार्यक्रम था। पुरानी जानी पहचानी जगह। फिर भी मुझे यह लग रहा था कि मेरे परिचित कम ही लोग होंगे और मैं वहां निरर्थक हीहीहाहा किये बिना कर जल्दी लौट सकूंगा। पर वैसा हुआ नहीं। और मुझे चार पांच अच्छे लोग मिले। सार्थक हुआ वहां जाना।

मेरे बंधु ओमप्रकाश मिश्र के पुत्र का विवाह था। उन्होने मुझे कहा – भाई साहब, आपको एक महत्वपूर्ण सज्जन से मिलवाता हूं। कार्यक्रम में मेरी व्यस्तता के कारण मैं स्वयम उनके पास बैठ नहीं पाऊंगा। अत: मेरे स्थान पर आप उन्हें कम्पनी दीजिये।

श्री गिरीश चंद्र त्रिपाठी

वे सज्जन थे श्री गिरीश चंद्र त्रिपाठी। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति रह चुके हैं और वर्तमान में उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा परिषद के अध्यक्ष हैं। वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रह चुके हैं (अभी भी होंगे, शायद) और संस्कृत के भी विद्वान हैं।

मुझे अटपटा लगा। जिंदगी भर मैं ट्रेन परिचालन में थानेदारी भाषा में जूझता रहा और यह बंधु मुझे एक एकेडमिक क्षेत्र की शीर्षस्थ विभूति के साथ घंटा-डेढ़ घंटा के लिये “फंसा” रहे हैं। मेरे और उनके बीच बातचीत के कोई कॉमन मीटिंग प्वाइण्ट ही कहां होंगे?

श्री गिरीश चंद्र त्रिपाठी से सामान्य परिचय के बाद मैं उनके पास सोफे पर बैठ गया। उनसे उनके बारे में उन्ही से पता करना शायद उनकी गरिमा के अनुकूल नहीं होता; सो मैंने इण्टरनेट सर्च की शरण ली। “Girish Chandra Tripathi BHU” के नाम से सर्च करने पर न्यूज18 का यह लेख मेरे सामने था – Meet BHU VC Girish Chandra Tripathi, A ‘Proud Swayamsevak’ Who is in Eye of The Storm .

थोड़ा अंश पढ़ कर, उन्हें लगभग सुनाते हुये मैंने कहा – वाह! यह तो लिखता है कि आपने लड़कियों की हॉस्टल की मेस में मांस निषेध कर दिया था। और वहीं से अपरिचय की बर्फ पिघलनी प्रारम्भ हुई। मेरा मोबाइल ले कर त्रिपाठी जी ने वह लेख पूरा पढ़ा। फिर उन्होने बताना शुरू किया। उसके बाद सामान्यत: वे बोलने वाले और मैं सुनने वाले की भूमिका में आ गये। उनकी बातें इतनी रोचक थीं कि मुझे अपने श्रोता होने में कोई कष्ट नहीं था।

उन्होने बताया कि यह (लेख में वर्णित) संदीप पाण्डेय विश्वविद्यालय में नौकरी करते हुये भी छात्रों के बीच राजनीति करता था। जब नहीं माना तो मुझे निकाल देना पड़ा। वामपंथी है। मेगसेसे अवार्ड विजेता भी। बहुत से मेगसेसे अवार्ड पाने वाले उसी प्रकार के हैं। अपना काम करने की बजाय यह व्यक्ति विश्वविद्यालय में येन केन वाम विचारधारा का प्रसार करने और छात्रों को उकसाने में लिप्त रहता था। और वैसा आचरण बनारस हिंदू विश्वविद्यालय तथा महामना मालवीय जी की विश्वविद्यालय की परिकल्पना के अनुकूल कदापि नहीं है।

प्रो. गिरीश चंद्र त्रिपाठी

त्रिपाठी जी ने वामपंथ से टकराव के अनेक मामले और अनेक लोगों से मिलने के प्रसंग मुझे बताये। उनसे मिलने पर (जैसा मैं पहले भी महसूस करता था) लगा कि ये लोग – शैक्षणिक संस्थानों में घुसे संदीप पाण्डेय जैसे और मीडिया के एक बड़े वर्ग के लोग मसलन राजदीप सरदेसाई, रवीश कुमार या बरखा दत्त – लिबरल-वाम एजेण्डा को बड़े शातिराना ढंग से शिक्षण संस्थानों और समाज में घोलने का काम करते हैं। इसके अलावा प्रायोजित आंदोलनों में इनकी उत्तरोत्तर विघटनकारी भूमिका उजागर हो रही है। हिंदी साहित्य में भी इनकी सोची समझी पैठ है।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय स्थापित करते समय जिन आदर्शों को महामना मालवीय जी ने सामने रखा था, उनसे इन लोगों की विचारधारा का सामंजस्य नहीं है। गिरीश चंद्र त्रिपाठी जी भारतीय जीवन पद्यति, शासक के जीवन मूल्य और समाज में नारी के स्थान के बारे में विस्तार से बताने लगे। उस संदर्भ में अनेक संस्कृत के कथन भी उद्धृत किये। मैं कई बार उनसे पूछ्ता रहा – यह कहां/किस ग्रंथ में है? बाद में पढ़ने के लिये मैंने दो पुस्तकें चिन्हित कीं – कालिदास का अभिज्ञानशाकुंतल और दण्डी का दशकुमार चरित्र। इनके अतिरिक्त कुछ अन्य पुस्तकें – स्वप्नवासवदत्ता, मृच्छकटिक, उत्तररामचरित्र, कुमारसम्भव, मुद्राराक्षस आदि हिंदी अनुवाद में सहजता से उपलब्ध हैं। उन सब को भी देखने पढ़ने के लिये पर्याप्त समय है मेरे पास! 🙂

“दुष्यंत मृग का पीछा करते हुये अनजाने में कण्व के आश्रम में प्रवेश कर जाते हैं। तपस्वी उन्हें चेताता है – रुको, अपना बाण नीचे करो, यह आश्रम है और यहां हरिण अवध्य है। किसी प्राणीमात्र की हत्या नहीं की जा सकती यहां।… और दुष्यंत का उसके बाद आचरण ध्यान देने योग्य है। वे रथ से उतरते हैं; अपना धनुष-बाण नीचा करते हैं। उनका सिर अपराध बोध से झुक जाता है। उन्हे पश्चाताप होता है कि वे गुरुकुल/आश्रम में प्रवेश कर गये पर अपना मुकुट उतारा नहीं! … आज के समय में इस आचरण की कल्पना की जा सकती है? आज का शासक होता तो ऐसा कहने पर बेचारे तपस्वी को तो कारागार मेंं डाल दिया जाता।… जब हम विश्वविद्यालय की सोचते हैं तो उसकी गरिमा और उसके आदर्श के रूप में यह सब सामने आता है।” – मैं श्री गिरीश चंद्र जी के शब्दों को यथावत नहीं रख पा रहा (मेरी स्मरण शक्ति उस लायक नहीं है), पर उनका आशय ऐसा ही था।

वाल्मीकि आश्रम में लव-कुश के साथ सीता। चित्र देवदत्त पटनायक की पुस्तक “सीता” से।

समाज में नारी की स्थिति के बारे में उन्होने अपने विचार रखे। राम के आदर्श की भी बात की। वनगमन के विषय में माता की बात पिता के आदेश के ऊपर थी, ऐसा उन्होने बताया। कौशल्या राम को कहती हैं – जो केवल पितु आयसु ताता; तो जिनि जाऊ जानि बड़ि माता। जो पितु मातु कहेऊं बन जाना; सो कानन सत अवध समाना। (अगर केवल पिता ने ही वनगमन का आदेश दिया है तो माता को बड़ा मान कर उनके आदेश का अनुसरण मत करो। पर अगर माता-पिता दोनो ने कहा है तो जंगल तुम्हारे लिये अवध समान है।)… माता का स्थान पिता से ऊपर है। इसी प्रकार सीता को वनवास देने के प्रसंग में राम (अपने राजधर्म की आवश्यकता के बावजूद) सीता को वन नहीं जाने देना चाहते। तब सीता उन्हें उनका राजधर्म समझाने के लिये उस कक्ष में ले कर जाती हैं, जिसमें उनके पूर्ववर्ती रघुवंशीय राजाओं के चित्र लगे हैं। सीता राम को वे चित्र दिखा कर कहती हैं – अगर वे राम के व्यक्ति को राजा के ऊपर रख कर आचरण करेंगे तो परलोक में अपने इन पूर्वजों को क्या उत्तर देंगे? … तब राम सीता के वनगमन के बारे में निश्चय कर पाते हैं।

उनके कहने में मुझे बहुत रस मिल रहा था और मैंने उन्हे बहुत नहीं टोका। एक अनुशासित श्रोता बना रहा। उनके कहने के बाद मैंने गिरीश चंद्र जी से उनके अपने लेखन की बात की; जिसे पढ़ कर मैंं उनके विचारों के विषय में और जान सकूं। उन्होने बताया कि “यह उनकी कमजोरी रही है कि उन्होने लिखा बहुत कम है”। उनसे बातचीत में लगा कि यह उनकी ही नहीं, सभी दक्षिण पन्थी विचारधारा वालों की भी कमी रही है। “दक्षिण पंथी मीडिया भी नाममात्र का है”।

श्री गिरीश चंद्र त्रिपाठी (बाँये) और मेरे मित्र श्री ओमप्रकाश मिश्र (दांये)

मैंने स्वराज्य का नाम लिया। गिरीश जी ने उस मीडिया संस्थान के विषय में भी अपना असंतोष व्यक्त किया। उनके अनुसार स्वराज्य के लोगों को भी भारतीय सोच, दर्शन, परम्पराओं और सांस्कृतिक मूल्यों की गहन समझ नहीं है। वामपंथ से जूझने के लिये यह कमजोरी है ही। … मुझे भी ऐसा लगा। मेरे दैनिक न्यूज-व्यूज और ओपीनियन खंगालने के लिये जो साइट्स हैं उनमें हैं – न्यूयॉर्क टाइम्स, गार्डियन, द टेलीग्राफ, पाकिस्तान का डॉन और भारत का द हिंदू। ये सभी वाम पंथी या लेफ्ट-ऑफ-सेण्टर की सामग्री परोसते हैं। इसके अलावा साहित्य में भी अधिकतर इसी विचारधारा का वर्चस्व दिखता है। मेरे पास ले दे कर स्वराज्य का सब्स्क्रिप्शन है, जिसे राइट या राइट ऑफ सेण्टर कहा जा सकता है।

काश गिरीश चंद्र त्रिपाठी जी जैसे विद्वान नियमित लेखन कर लोगों की विचारधारा को पुष्ट करने का बड़ा कार्य करते। यहां गांव में एकांत में रहने वाले मुझे भविष्य में गिरीश चंद्र त्रिपाठी जी का सानिध्य मिलेगा; कह नहीं सकता। उस समारोह में एक पत्रकार श्री मुनेश्वर मिश्र जी भी आये थे। उनको त्रिपाठी जी ने भविष्य मेंं बैठक/गोष्ठी आयोजित करने के लिये कहा है, जिसमें शायद गिरीश जी से मिलना सम्भव हो।

गिरीश चंद्र जी से मुलाकात के बाद मुझे यह जरूर स्पष्ट हुआ है कि मुझे भारतीय सोच/विचारधारा/दर्शन का बेहतर और विधिवत अध्ययन करना चाहिये; इधर उधर चोंच मारने और चुगने के अंदाज में नहीं। पर संस्कृत साहित्य को उसके मूल रूप में पढ़ना-समझना फिलहाल मेरे लिये सम्भव नहीं है – मेरी भाषा की सीमायें हैं। बारबार संस्कृत-हिन्दी शब्दकोष रेफर करना असम्भव तो नहीं, ऊबाउ काम है।

इसलिये फिलहाल मैंने अभिज्ञान शाकुंतल और दशकुमार चरित्र का हिंदी अनुवाद त्रिपाठी जी से मिलने के बाद ढूंढ़ कर पढ़ा। पैंसठ साल की उम्र में जीवन में पहली बार इन पुस्तकों को मैंने पहचाना। अभी आधा दर्जन अन्य संस्कृत के ग्रंथों के अनुवाद भी पढ़ने के लिये चिन्हित कर लिये हैं। इसके अलावा तुलसी के रामचरितमानस और विनयपत्रिका को एक बार फिर से पढ़ने की सोची है। इसी वर्ष मैंने राजाजी का महाभारत और इरावती कर्वे का युगांत पढ़ा है। और आगे यह सब जारी रखने के लिये प्राइम मूवर गिरीश चंद्र त्रिपाठी जी से उक्त वर्णित मुलाकात ही है।