गंगा आरती @ गौगंगागौरीशंकर


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Gadauli Dham गड़ौली धाम

वह गंगा का ऊसर किनारा, जिसमें करारी कंकर हैं, गंगा के बाढ़ के पानी से बना एक तालाब है, इक्का दुक्का घूमते नीलगाय हैं और नीरव शांति है; वह मेरे नित्य सवेरे घूमने का नया जुनून है। मेरे घर से टेढ़े मेढ़े रास्ते से वह करीब छ किलोमीटर दूर पड़ता है। रास्ते में जो भी दिखता है और जो भी अनुभूतियां होती हैं वो मन में बहती चली जाती हैं। उन्हें बाद में बैठ कर कागजबद्ध किया जाये तो अनूठी चीज बने। पर वे सब बहुत तरल होती हैं। लेकिन, मैं कभी कभी सोचता हूं कि कागज (या कीबोर्ड) बद्ध करना महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है अनुभूतियों को जीना। वह मैं कर रहा हूं। और उसमें आनंद है!

शमी के कोटर में रखा दिया देवदीपावली की अगली सुबह भी वहीं था।

देव दीपावली के अगले दिन सवेरे उस स्थल पर पंहुचता हूं तो सतीश सिंह पिछले दिन की देव दीपावली के पीतल के दीपक और अन्य उपकरण मांज-धो कर सहेजते नजर आते हैं। सतीश की सरलता को देख कर लगता है कि सुनील ओझा जी को आदमी के चरित्र को परखने की गजब की काबलियत है। इस एकांत में इस काम के लिये सतीश से बेहतर कौन आदमी होता। इस गांव-गंगा-जंगल-झाड़ी में सतीश अकेले टेण्ट में रहते हैं। झाड़ू भी लगाते हैं; आरती भी करते हैं; मजदूरों की गतिविधि पर निगाह भी रखते हैं। सतीश की दिनचर्या भी रोचक है। उसपर फिर कभी लिखूंगा। शहर-महानगर की जटिल जिंदगी से उलट एक सरल दिनचर्या भी हो सकती है, जिसमें दिन भर सतीश कुछ न कुछ करते नजर आते हैं – वर्ना वे पतले दुबले इकहरे बदन के नहीं होते। मेरी तरह स्थूल होते।

वहां उस प्लेटफार्म पर अभी भी सजावट के फूल पड़े हैं, जहां कल देवदीपावली की सांझ में गंगा आरती हुई थी।

मैं अपनी साइकिल ले कर गंगा के बिल्कुल किनारे चला जाता हूं – उस ऊंची नीची जमीन पर साइकिल लहराते चलती है – जैसे बच्चे रोलर-कोस्टर पर ऊपर नीचे आते हैं। वहां उस प्लेटफार्म पर अभी भी सजावट के फूल पड़े हैं, जहां कल देवदीपावली की सांझ में गंगा आरती हुई थी। वहां पूरी नीरवता है। दूर विश्वेश्वरानंद घाट के पास इक्का दुक्का लोग नहाते दीखते हैं। चार सौ कदम दूर इसी गौंगंगौरीशंकर स्थल पर ही एक कद्दावर नीलगाय खरामा खरामा चलता नजर आता है। उसे भी शायद आश्चर्य हो रहा हो कि इस जगह की कुशा की घास कहां चली गयी। वह मेरी ओर भी देखता है, पर मैं शायद उसे एक इनसिग्नीफिकेण्ट चीज नजर आता हूं। धीरे धीरे आगे वह कुशा के झांखाड़ की ओर चला जाता है।

चार सौ कदम दूर इसी गौंगंगौरीशंकर स्थल पर ही एक कद्दावर नीलगाय खरामा खरामा चलता नजर आता है। उसे भी शायद आश्चर्य हो रहा हो कि इस जगह की कुशा की घास कहां चली गयी।

पास में ही शमी का वह वृक्ष है, जिसे कल मेरी पत्नीजी और मैंने अपने घर से लाये दियों को सजाने के लिये चुना था। उसके आसपास करीब चालीस पचास दिये सजाये थे। उनसे एक स्वास्तिक चिन्ह बनाया था। शमी में एक कोटर है। उसमें आरपार दिखता है। उस कोटर में भी एक दिया रखा था। आज सवेरे देखा तो सभी दिये वहां जस के तस थे। वह कोटर वाला दिया भी। दिन में कौव्वे उनसे छेड़छाड करेंगे।

आशा करता हूं कि जब यहां महादेव मंदिर बनेगा तो गंगा किनारे के इस शमी को छुआ नहीं जायेगा। बाकी, निर्माण करने वालों की विध्वंसक ताकत की आशंका तो होती ही है।

मेरी पत्नीजी ने यह शमी का वृक्ष चुना था दिये की सजावट के लिये

मुझे गंगा किनारे आया देख एक मजदूर भी पीछे पीछे चला आया। नाम है हीरालाल। यहीं पास के गांव अगियाबीर का है। उस मिस्त्री का सहायक है वह जिसने कल यह गंगा आरती का प्लेटफार्म बनाया है। बताता है – “फलाने जी प्लाई कम लाये इसलिये दोनो ओर शेल्फ के पल्ले नहीं लग सके। आज शायद काम हो। मिस्त्री आयेंगे तो बतायेंगे क्या करना है।”

हीरालाल

हीरालाल की साइकिल का कैरियर आम साइकिल वाला नहीं है। वह लोहे के एक मोटे पतरे से बना है। उसपर सामान भी ढोया जा सकता है। इस प्लेटफार्म को बनाने के लिये पटिया इसी कैरियर पर लाद कर गंगा किनारे लाया था हीरालाल। उसपर बिठा कर अपनी पत्नी-बच्चे को मेला-ठेला भी घुमा लाता है। कल कार्तिक पुन्निमा के मेला में भी इसी साइकिल से गया होगा उसका का परिवार। उस कैरियर से साइकिल गरीब की मोटरसाइकिल बन गयी है।

कल देवदीपावली को अच्छी चहल पहल हो गयी थी यहां। सौ के आसपास लोग थे।

कल देवदीपावली को अच्छी चहल पहल हो गयी थी यहां। सौ के आसपास लोग थे। गणेश वंदना और गंगाआरती गाने वालों का दो चार लोगों का संगीत उपकरणों से लैस ग्रुप भी था और आरती करने के लिये पण्डिज्जी भी थे। वैसे नित्य आरती तो सतीश सिंह ही किया करेंगे।

देवदीपावली को शमी की कोटर में जलते दिये का चित्र मुझे इतना भाया था कि उसका ब्लॉग-हेडर ही बना लिया!

जिन लोगों का कल शाम जमावड़ा था, उनमें एसयूवी वाहनों पर आये दो दर्जन से ज्यादा वे लोग भी थे जिनका ध्येय आसन्न विधायिका चुनाव में टिकट साधना है। यह टिकट-साधना बेचारे कलफ-क्रीज वाले झकाझक कपड़े पहने उन बड़े लोगों को कहां कहां के चक्कर नहीं लगवाती!… बेचारे गंगा आरती में जुटे थे। गंगा माई के बंधक-भक्त। :lol:

मैं गंगा तट से लौटता हूं। सतीश दीपक मांज चुके थे। आरती भी कर चुके थे। उन्होने मुझे प्रसाद दिया – लाचीदाना और किशमिश। उसके बाद मुझे नमस्ते की – “बाबूजी, घर को निकलूंगा। मेरा मोबाइल खो गया है। वही तलाशना है। सवेरे गईया को सानी करते समय शायद झुकने में वहीं गिर गया होगा। वह इधर उधर हो जाये इससे पहले मुझे तलाश लेना है।”

करीब पौना घण्टा वहां गंगा-नीलगाय-हीरालाल-सतीश के साथ बिता कर मैं भी घर के लिये लौटता हूं। मुंह में जीभ पर सतीश के दिये गये प्रसाद की किशमिश अभी भी चुभुलाने को बची है। आज अच्छी सैर रही। ऐसी ही रोज रहती है। जीवन का यह स्वर्णिम काल है?! :-)

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3. देव दीपावली पर गंगा आरती शुरू होगी गौगंगागौरीशंकर पर
4. गंगा आरती @ गौगंगागौरीशंकर
5. बिस्राम का बुढ़ापा
गौगंगागौरीशंकर

देव दीपावली पर गंगा आरती शुरू होगी गौगंगागौरीशंकर पर


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Gadauli Dham गड़ौली धाम

आज सवेरे गौ-गंगा-गौरीशंकर (गौगंगौरी) वाली जगह गया तो सतीश सिंंह ने बताया कि गंगा किनारे प्लेटफार्म बन गया है जहां रोज शाम सूर्यास्त के समय गंगा आरती हुआ करेगी। आज शुभ दिन है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन देव दीपावली मनाई जाती है। आज से यहां गंगा आरती नित्य करना प्रारम्भ होगा।

देवदीपावली होने के कारण सतीश वहां 500 दिये जलाने का इंतजाम भी कर रहे हैं। उन्होने मुझे भी आने के लिये आग्रह किया है। मेरी पत्नीजी 25-50 दीये और तेल ले कर चलेंगी वहां। वाहन चालक को सजेह दिया है कि चार बजे शाम हम जायेंगे गौगंगौरी स्थल पर।

देवदीपावली होने के कारण सतीश वहां 500 दिये जलाने का इंतजाम कर रहे हैं।

परियोजना में गंगा तट पर, जहां महादेव मंदिर बनना है, वहीं यह प्लेटफार्म बन रहा है। उसपर पटिया साँझ से पहले लग जायेगा। प्लेटफार्म के नीचे दो चेंबर हैं जिनमें वहां नित्य की गंगा आरती का सामान रखा जा सकेगा। उनपर दरवाजा भी लगेगा। सतीश ने मुझे वह सब दिखाया। हम दोनो वहां अपनी अपनी साइकिल से पंहुचे।

गंगा तट पर, जहां महादेव मंदिर आना है, वहीं यह प्लेटफार्म बन रहा है। उसपर पटिया संझा से पहले लग जायेगा।

परिसर में कुशा की घास साफ कर दी गयी है तो उसमें रहने वाले चींटों के बिल और उनके खोद कर बाहर लाये मिट्टी के ढूह नजर आते हैं। सतीश ने बताया कि ओझा जी ने मंदिर के स्थापत्य वालों को कहा है कि मंदिर की योजना इस तरह से बनायें जिससे चींटे भी रहें और महादेव भी। प्रकृति को सैकड़ों साल लगते हैं जमीन को एक आकार देने में – कहीं ऊंचाई और कहीं नीचाई। उसका सम्मान किया जाना चाहिये। आकार के साथ कम से कम छेड़छाड़ की जानी चाहिये। इससे स्थापत्य-निर्माण वालों को कष्ट हो सकता है पर महादेव खूब प्रसन्न होंगे!

परिसर में कुशा की घास साफ कर दी गयी है तो उसमें रहने वाले चींटों के बिल और उनकी बाहर लाये मिट्टी के ढूह नजर आते हैं। सतीश ने बताया कि ओझा जी ने मंदिर के स्थापत्य वालों को कहा है कि मंदिर की योजना इस तरह से बनायें जिससे चींटे भी रहें और महादेव भी।

सवेरे सतीश के साथ 15-20 मिनट मिलना होता है और इस प्रकार की कई बातें सतीश मुझे बताते हैं। अगर नित्य का वह सब ब्लॉग पर संजोया जाये तो गौगंगौरी किस प्रकार बनेगा उसका एक दस्तावेज बन जायेगा। प्रेमसागर की कांवर पदयात्रा लेखन के समांतर यह भी करो ज्ञानदत्त! रिटायर हो, बैठे-ठाले और क्या करोगे! :-)

एक जगह से ढलान दे कर गंगा तीर पर जाने का रैम्प जैसा रास्ता बन जायेगा जिससे लोग जा कर नदी किनारे दीये रख सकें।

पास में ही एक जगह से ढलान दे कर गंगा तीर पर जाने का रैम्प जैसा रास्ता बन जायेगा जिससे लोग जा कर नदी किनारे दीये रख सकें। सतीश सिंह ने कहा कि पचीस पचास लोग इकठ्ठा होंगे। कटका के भाजपा बूथ प्रभारी विशाल जी अपने साथ दस बीस गण ले कर आयेंगे – ऐसा बताया है। शायद प्रयाग से सुनील ओझा जी भी आयेंं। वे आये तो उनकी कृपा के इच्छुक पचीस तीस लोग तो आ ही जायेंगे। दो आदमी – मेरी पत्नीजी और मैं भी जुड़ जायेंगे उस समूह में।

सतीश बताये कि कल थाने वाले भी आये थे। पूछ रहे थे कि कोई समस्या तो नहीं आती। कप्तान साहेब उनसे रिपोर्ट मांगते हैं तो बेचारों को इस झाड़ झंखाड़ में आने की जहमत उठानी पड़ रही है।

गंगा का किनारा और गौंगंगौरी का पूरा विस्तार देख कर मेरे मन में शिवकुटी के गंगा किनारे घूमने के दिन याद आते हैं। वहां घर से 300 कदम दूर पैदल चल कर रोज पंहुच जाता था, यहां मुझे आधा घण्टा साइकिल चला कर पंहुचना होता है। इसमें द्वारिकापुर-अगियाबीर के नाले में साइकिल धकेलना भी शामिल है।

ओझा जी एक पास आजकल ढेरों लोग अपने अपने स्वार्थ को ले कर चक्कर मारते हैं। मैं सोचता हूं कि इसी बहाने अगर इस नाले पर एक पुल बन जाये तो आनंद आ जाये। बरसात के मौसम में भी इस उत्तरापथ पर आना सुगम हो जाये। यह उत्तरापथ – गंगा किनारे से पटना तक – जाने वाला मार्ग पौराणिक है। इसी पर अगियाबीर का वह टीला है जिसमें आज से तीन हजार वर्ष पूर्व का औद्योगिक नगर दफन है।

खैर, असल बात यह है कि आज से गंगा आरती प्रारम्भ होगी गौंगंगौरी स्थल पर और आज 500+ दीपक भी जलेंगे वहां गंगा तीरे।

त्रिपुरारि शिव ने आज ही के दिन त्रिपुरासुर का संहार कर तीनों लोकों को उसके आतंक से मुक्त किया था और देवों ने दीप जला कर दिवाली मनाई थी। आप सब को देवदीपावली पर मंगलकामनायें। हर हर गंगे; हर हर महादेव!


सुनील ओझा जी और गाय पर निर्भर गांव का जीवन


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Gadauli Dham गड़ौली धाम

इस इलाके में जहां मैं रह रहा हूं; किसानों की जोत कम से कमतर होती गयी है। लोगों के पास खेती की जमीन बीघे में नहीं बिस्वे (बीघे का बीसवां अंश) में है। और बहुत से खेती पर आश्रित लोगों के पास तो अपनी जमीन है ही नहीं। खेती की नहीं, मकान या शौचालय बनाने की भी जमीन ठीक से नहीं है। उनके विकल्प सीमित हैं – अधियरा या बटाईदारी आधार पर किसानी; एक दो बकरी-मुर्गी-भेड़ पालन और उसके साथ एक गाय या भैस रखना जिन्हे आसपास की घास चरा कर जीवित रखना और गाढ़े में उन्हे बेच कर कुछ रकम पा लेना; कालीन बुनाई करना या उससे सम्बद्ध कोई कार्य करना; मजदूरी या मकान की बेलदारी-मिस्त्री का काम करना आदि। यह सब उन्हें प्रगति की ओर नहीं ले जाते। केवल जिंदा रहने भर के साधन हैं।

इसलिये, लोग यहां से निकल कर महानगरों की ओर जाते हैं। पर वह भी (अधिकांश मामलों में) केवल सबसिस्टेंस का ही जरीया है; समृद्धि का नहीं। समृद्धि तो तभी आ सकती है, जब यहां रहते हुये उन्हें ऐसा रोजगार मिले जो उनकी आर्थिक दशा सुधारे और उसमें उत्तरोत्तर सुधारने की क्षमता हो।

उस दिन गौ-गंगा-गौरीशंकर प्रॉजेक्ट के स्थान पर सुनील ओझा जी से अप्रत्याशित भेंट हो गयी। गाय पर अपनी सोच स्पष्ट करते हुये उन्होने कहा कि ऐसा हो सकता है; गांव के मार्जिनल और खेतिहर की समृद्धि आ सकती है और वह देसी गाय आर्धारित जीवन पर निर्भर है।

बड़े धैर्य के साथ ओझा जी ने हम से सवा घण्टे बातचीत की। उस दौरान मैं ओझा जी की सरलता का कायल हो गया।

पर जब ओझा जी ने कहा कि उनकी सोच इन खेतिहर किसानों को गाय पालन के आधार पर उस स्तर पर लाने की है जो ग्रामीण जीवन के लिये एक मॉडल बनेगी; तो वह बात सीधे सीधे मुझे नहीं पची। वह कहना मुझे गांधी जी के ग्राम-स्वराज्य जैसा आदर्शवाद लगा; जिसपर आज भी हम लिप-सर्विस देते हैं पर जीवन में उसे सिरे से नकार चुके हैं। मुझे गांधीजी के ग्राम की परिकल्पना के अनेकानेक प्रयोग याद आये जो आज केवल नोश्टॉल्जिया का अंग हैं; यथार्थ में गांधीजी हाशिये पर हैं। भवानी भट्टाचर्य के उपन्यास Shadow From Ladakh (1966) के समय ही बापू का ग्रामोदय प्रसंग खो रहा था और अस्सी के दशक के बाद जब बैल आर्धारित खेती खत्म हुई, ट्रेक्टर-ट्यूब वेल आये, तब गाय-बैल की अर्थव्यवस्था भी दम तोड़ने लगी थी। यह सब मेरे जमाने में हुआ है।

मैं अपनी पत्नीजी को गौ-गंगा-गौरीशंकर का वह स्थल दिखाने ले गया था, जहां इस थीम पर एक वृहत परियोजना फलीभूत होने जा रही है।

मैं अपनी पत्नीजी को गौ-गंगा-गौरीशंकर का वह स्थल दिखाने ले गया था, जहां इस थीम पर एक वृहत परियोजना फलीभूत होने जा रही है। हम लोग शाम चार बजे गये थे और मैं सोचता था कि पत्नीजी को दस मिनट में वह स्थान दिखा कर लौट सकूंगा। पर वहां तो दो दर्जन कारें और एसयूवी वाहन खड़े थे। लोग गंगा तट पर देखते चर्चा करते लौट रहे थे। एक बारगी तो मन हुआ कि आज लौट चला जाये; पर फिर विचार बदल कर पत्नीजी को मैंने गंगा किनारे वह स्थान दिखाया जहां महादेव का मंदिर बनेगा। उसके पश्चिम में ढलान है और उसके बाद फिर ऊंचाई। पश्चिम की ऊंचाई पर गौरीशंकर की 108 फुट की प्रतिमा, गंगा किनारे, गंगा जी को मुंह किये स्थापित होगी। पूरी थीम भारतीय जनता पार्टी की पोलिटिको-कल्चरल सोच को संवर्धित करती है।

पांच सात मिनट में हम दोनो वापस लौट रहे थे तभी एक सज्जन – धर्मेंद्र सिंह जी ने हमारी ओर आ कर हमारा परिचय पूछा और वहां आने का प्रयोजन भी। मेरे नाम से शायद वे कुछ दिन पहले मेरी ब्लॉग पोस्ट के साथ मुझे पहचान पाये और उन्होने हमें सुनील ओझा जी से मिलाया।

चित्र में बांयी ओर ओझा जी और धर्मेंद्र जी|

ओझा जी एक आर्किटेक्ट जैसे लगते सज्जन से बातचीत कर रहे थे। उनको वे समझा रहे थे कि साइट देखने के आधार पर उन्हें थीम को ध्यान में रखते हुये प्लान परिवर्धित करना है। मैंने देखा कि पचीस-तीस लोग, जो वहां थे; ओझा जी को ध्यान से सुन रहे थे। जल्दी ही उन सज्जन को विदा कर वे हमें मुखातिब हुये। उनकी बात से लगा कि वे मेरी ब्लॉग-पोस्ट पढ़ चुके थे। ब्लॉग पोस्ट तथा शैलेश जी ने जो कुछ मेरे बारे में उन्हे बताया था; उसके आधार पर वे मुझे इस योग्य पाते थे कि वे एक सवा घण्टे तक मेरे साथ बातचीत कर सकें। अन्यथा यह तो मैं जान ही गया था कि उनका समय कीमती है और आसपास आये कई लोग तो मात्र उनके द्वारा नोटिस किया जाने से ही अपने को धन्य मानते होंगे।

बारम्बार ओझा जी ने कहा कि वे यह नहीं सोचते कि हम गाय पर दया करें, वरन ऐसा हो कि हमें लगे कि गाय वास्तव में हमारी माता की तरह हमारा पालन कर रही है। यह सुन कर मैंने उनसे दो तीन बार पूछा – आप यह आर्थिक आधार पर कह रहे हैं या मात्र “गौमाता वाले इमोशन” को अभिव्यक्त कर रहे हैं? पर हर बार उनका उत्तर था कि वे शुद्ध आर्थिक आधार की बात कर रहे हैं। “गाय की जब सेवा होगी, पर्याप्त और सदा उपलब्ध भोजन उसकी चरनी में रहेगा, जब गाय की साफ सफाई का ध्यान रखा जायेगा तो वह इतना देगी कि खेतिहर के जीवन में समृद्धि आयेगी।”

उन्होने जोर दे कर स्पष्ट किया कि वे ज्यादा दूध देने के लिये जर्सी या अन्य विदेशी गायों की बात नहीं कर रहे। वे अमूल के दूध कलेक्शन या विपणन मॉडल की भी बात नहीं कर रहे – जिसमें दूध को उसमें वसा की मात्रा जांच कर उसकी खरीद करने का चलन है। वे देसी गाय के उस दूध की बात कर रहे हैं, जिसे भारतीय आयुर्वेद और संस्कृति ‘अमृत’ मानती है। और उसकी कीमत देसी गाय के शुद्ध दूध के आधार पर आंकी जानी चाहिये।

देसी गाय। महिला ने बताया कि गाभिन है।

ओझा जी की बात उस समय मुझे उस यूटोपिया का अंग लगी जिसे हिंदू धर्म के समर्थक-प्रचारक बांटते हैं। उस सद्प्रचार के बावजूद सारी अर्थव्यवस्था ऐसी हो गयी है कि गाय – बैल अप्रासंगिक होते गये हैं; उत्तरोत्तर। और गाय बेचारी बहेतू जानवर की तरह (माता कहाये जाने के बावजूद) प्लास्टिक का कचरा खाने को अभिशप्त है। और बहेतू गाय बछड़ों को किसान धर्म के भय से मारता नहीं पर अपनी खेती की दुर्दशा के लिये खूब कोसता है। किसान के इस भाव को विपक्षी दल भुनाने से बाज नहीं आयेंगे; जबकि उनके पास कोई वैकल्पिक समाधान नहीं है। … इतना जरूर है कि कोई समाधान होना चाहिये। इसलिये ओझा जी की बात भले यूटोपियन लगती हो, पर उस पर ध्यान देने की जरूरत मैंने महसूस की।

पर मुझे शैलेश पाण्डेय ने बताया था कि ओझा जी आम लफ्फाज नेता की तरह नहीं हैं। वे ठोस काम करने वाले और धरातल से जुड़े, धरातल पर खड़े व्यक्ति हैं। इसलिये मैंने उनके कहे को, अपनी शंकाओं के होते हुये भी, ध्यान से सुना। और बड़े धैर्य के साथ ओझा जी ने हम से सवा घण्टे बातचीत की। उस दौरान मैं ओझा जी की सरलता का कायल हो गया। उन्होने न केवल अपनी बात कही, अपने परिचय में भी बताया और हमारा भी उतना परिचय प्राप्त किया जिससे हमारे चरित्र और प्रवृत्ति को वे समझ सकें।

ओझाजी गुजराती हैं; पर काशी को और यहां के अंचल को अपना घर मान रहे हैं। शायद यहीं बस जायें। वैसे ब्राह्मणों का इतना इधर से उधर जाना हुआ है कि अगर वे बहुत पीछे जायें तो वे शायद सरयूपारी-कान्यकुब्ज-शाण्डिल्य ही निकलेंगे। काशी के आसपास से गुजरात गये हुये। यह पूरा भारत एक है! :lol:

ओझा जी की उम्र लगभग मेरे बराबर है। वे राजनीति में हैं। सक्रिय। उनकी एक ट्वीट के अनुसार वे सन 2001 के गुजरात विधान सभा के नरेंद्र मोदी जी के चुनाव में वे मोदी जी के प्रभारी थे –

सुनील ओझा जी की ट्वीट। चित्र में सबसे दांये अमित शाह जी हैं और उनके बांये ओझा जी।

ओझा जी ने बताया कि सन 2014 में वे वाराणसी आये और 2019 के चुनाव में मोदी जी के प्रभारी थे। वे काशी और गंगा मां से इतने अभिभूत हैं कि इसी इलाके में अपने जीवन का उत्तरार्ध व्यतीत करने की सोचते हैं। वे इस गौगंगागौरीशंकर प्रॉजेक्ट को अपना ध्येय मानते हैं और इसके साथ आसपास के छोटी जोत के और खेतिहर लोगों को जोड़ कर एक आर्थिक मॉडल बनाने की भी सोच रखते हैं।

इस इलाके की देसी गौ आर्धारित अर्थव्यवस्था पर ओझा जी की दृढ़ सोच पर अपनी आशंकाओं के बावजूद मुझे लगा कि उनकी बात में एक कंविक्शन है, जो कोरा आदर्शवाद नहीं हो सकता। उनकी क्षमता भी ऐसी लगती है कि वे गायपालन के मॉडल पर प्रयोग कर सकें और उसके सफल होने के बाद उसे भारत के अन्य भागों में रिप्लीकेट करा सकें।

सांझ ढलने पर हमें ओझा जी ने महुआरी के उस झुरमुट में हो रही बैठक से हमें विदा किया। वहां से चलते समय बहुत से विचार मेरे मन में थे। जीवन के इस उत्तरार्ध में मेरी राजसिक वृत्तियां लगभग समाप्त हो गयी हैं। अब तो विशुद्ध जिज्ञासा ही शेष है – यह जानने की जिज्ञासा कि क्या इस ग्रामीण अंचल का और यहां के गरीब मार्जिनल या खेतिहर किसान का भला हो सकता है?

शैलेश पाण्डेय, प्रॉजेक्ट स्थल पर

मैंने उस मुलाकात के बाद कई ग्रामीण लोगों से और एक कृषि वैज्ञानिक से बातचीत की है। उनकी बात से यह स्पष्ट हो गया है कि ओझा जी की कही बातों पर आर्धारित आर्थिक मॉडल की सफलता की सम्भावना तो बनती है। उन लोगों ने जो कहा, वह आगे एक पोस्ट में लिखूंगा।

… पर सफलता निर्भर करती है कि उस पाइलट प्रोजेक्ट पर काम करने वाले कुछ प्रतिबद्ध लोगों की टीम काम पर लगे जो किसानों को आर्थिक और कृषि-वैज्ञानिक ज्ञान सरल भाषा में समझा सक। इसके अलावा उनके लिये दूध के मार्केट को, जो ऑनलाइन भी अब काम करने लगा है – देस और विदेश के स्तर पर भी; सुलभ कराने की दिशा में फेसीलिटेट करे। इसके अलावा हरा चारा उगाने और अन्य पशुआहार की उपलब्धता सीम-लेस बनाने की दिशा में काम करे। एक बार ये सब घटक स्ट्रीमलाइन हो जायेंगे तो गौ आर्धारित श्री-समृद्धि किसान के पास सहज आयेगी।

मैं किसान नहीं हूं। मैंने गाय भी नहीं पाली है। पर छ साल गांव में परिवेश को समझने के लिये अपनी सभी ज्ञानेंद्रियों को खोल कर रखने और अब पिछले दस दिनों में सब प्रकार के लोगों से बातचीत के बाद गाय आर्धारित मॉडल पर अगली पोस्ट लिखने में अपने को सक्षम पाता हूं।

अगली पोस्ट की प्रतीक्षा की जाये। इस बीच मैं सुनील ओझा जी को धन्यवाद देता हूं कि उन्होने उस शाम जो मुझे समय दिया, उससे मेरी मानसिक हलचल गाय की दिशा में मुड़ी। … और मैं अपनी पत्नीजी से चर्चा करने लगा हूं – एक दो देसी गायें पाल ही ली जायें! :lol:


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