अमरकण्टक – दाढ़ी बनवाई, अगले चरण की तैयारी


24 सितम्बर 21, सायंकाल:

प्रेमसागर कांवर यात्रा करने वाले, पदयात्रायें करने वाले, संकल्प करने और जुनून की तरह उसका निर्वहन करने वाले तथाकथित ‘दकियनूसी’ हिंदुत्व के प्रतीक हैं। पर वे प्रयोगधर्मी भी हैं। परिवर्तन को स्वीकारने वाले – भले ही उछल कर नहीं, सोच समझ कर कुछ झिझकते हुये ही सही; लेकिन हैं।

आज कुछ खास नहीं हुआ अमरकण्टक में। बारिश होती गयी। कहीं निकलना नहीं हुआ। शाम को प्रेमसागर ने अपनी दाढ़ी बनवाई। जब मैंने फोन किया तो वे सैलून से निकल कर रेस्ट हाउस आ रहे थे।

द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा के दूसरे चरण की शुरुआत के पहले वे दाढ़ी बनवा रहे हैं। अगले दो ज्योतिर्लिंग को अर्घ चढ़ाने तक दाढ़ी बढ़ेगी। शायद यह परम्परा हो कि कांवर उठाने के बाद कांवरिया शेव इत्यादि न करता हो। कांवरिया क्या क्या करता है और क्या उसके लिये वर्जित है, यह मैंने पूछा नहीं। आगे यह पता करूंगा।

प्रेमसागर, दूसरी फेज की यात्रा के लिये दाढ़ी बनवा लिये हैं।

रात में दो चीफ कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट आ रहे हैं। रेस्ट हाउस के केयर टेकर साहब बहुत व्यस्त हैं। साहब लोग यहीं रहेंगे या होटल में जायेंगे, यह स्पष्ट नहीं है। प्रेम सागर जी को लगता है कि उनकी उन लोगों – जोशी जी और मिश्रा जी – से मुलाकात होगी। संगम-वाराणसी से अमरकण्टक की पदयात्रा ने प्रेम सागर जी को वैशिष्ठ्य तो दे ही दिया है।

प्रेम सागर के कांवर-मित्र लोग बलिया से ट्रेन पर चढ़े या नहीं, वह उन्हें स्पष्ट नहीं है। उनका फोन नहीं लगा। वे लोग अगर आते हैं तो वहां से ट्रेन से जबलपुर आयेंगे और जबलपुर से अमरकण्टक सड़क मार्ग से। “उन्होने ही कहा था कि वे अमरकण्टक से उज्जैन चलेंगे। अगर आते हैं तो भी ठीक और नहीं आते तो भी। परसों मुझे नर्मदा उद्गम स्थल से दो लोटा जल ले कर निकलना है। चाहे उनके साथ या चाहे अकेले।” – प्रेम सागर अपने कार्यक्रम के बारे में स्पष्ट हैं।

(अमरकण्टक के चित्रों का कोलाज। सौजन्य शैलेश पण्डित।)

आज तो उनके पास शेयर करने के लिये कोई चित्र नहीं हैं, पर कल सवेरे छ बजे निकलेंगे कपिल धारा, दूध धारा आदि स्थान देखने के लिये। कल इग्यारह बजे तक आसपास के अनेक दर्शनीय स्थलों का भ्रमण और चित्र आदि लेना वे कर चुके होंगे।… जब प्रेम सागर यह मुझे बताते हैं तो एक बात स्पष्ट होती है – वे ब्लॉग और सोशल मीडिया पर सम्प्रेषण को महत्वपूर्ण मानने लगे हैं, उत्तरोत्तर। मेरी पत्नी जी का कहना है कि बहुत बदलाव आया है प्रेम सागर के देखने, नोट करने और चित्र खींचने-बताने में। और शायद यह वे खुद भी अनुभव करते हैं।

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची

आज मैंने उन्हे कहा कि ह्वात्सएप्प चित्रों की गुणवत्ता अच्छी नहीं रखता प्रेषण करने में। उसके बजाय वे टेलीग्राम अकाउण्ट बनायें और उसपर चित्र भेजें। पांच मिनट भी नहीं लगे जब उन्होने टेलीग्राम डाउनलोड कर उससे चित्र भेजे। उनकी पिक्सल टेलीग्राम में दुगनी से ज्यादा है, बावजूद इसके कि ह्वाट्सएप्प में चित्रों की सबसे अच्छी क्वालिटी के लिये सेटिंग उन्होने कर ली थी, मेरे अनुरोध पर। मोबाइल पर इतना तकनीकी प्रयोगधर्मी हो जायेंगे, यह मैंने कल्पना नहीं की थी। … यही नहीं, घटनाओं, कथाओं की अपनी एक अहमियत होती है इसको वे जान गये हैं। प्रेमसागर कांवर यात्रा करने वाले, पदयात्रायें करने वाले, संकल्प करने और जुनून की तरह उसका निर्वहन करने वाले तथाकथित ‘दकियनूसी’ हिंदुत्व के प्रतीक हैं। पर वे प्रयोगधर्मी भी हैं। परिवर्तन को स्वीकारने वाले – भले ही उछल कर नहीं, सोच समझ कर कुछ झिझकते हुये ही सही; लेकिन हैं।

महादेव की भी अगर कल्पना की जाये तो वे भी इसी प्रकार अपवर्ड-मोबाइल, हाईटेक ग्राह्यता वाले रस्टिक-रुरो-अर्बेन देव होंगे। बहुत कुछ वैसे कि महानगर की गिटपिट हिंगलिश बोलने वाला युवा भी उनको अपने सा मानने लगे। धर्म की तन्यता, उसकी अडाप्टेबिलिटी कल्पनातीत है। तुम उसकी सोचो और उसको अनुभव करने का प्रयास करो, जीडी।

25 सितम्बर 21 सवेरे:

सवेरे छ बजे मैंने प्रेमसागर जी से बात की। वे आसपास के स्थान देखने निकलने जा रहे थे। साथ चलने के लिये रेस्ट हाउस के केयर टेकर वर्मा जी की प्रतीक्षा कर रहे थे। कांवर मित्रों से उनकी बात नहीं हो सकी थी। फोन ही नहीं लगा। यह सम्भव है कि वे ट्रेन यात्रा में हों। बहरहाल वे आ रहे हैं या नहीं, दिन में पता चलेगा। प्रेमसागर से ज्यादा मुझे उनकी जरूरत है। एक की बजाय तीन लोग यात्रा विवरण और अच्छा दे सकेंगे, ऐसा मेरा सोचना है। उससे ब्लॉग कण्टेंट समृद्ध ही होगा।

वन विभाग के बड़े साहब लोग रात नौ बजे तक आये। उनके लिये रुकने का स्थान होटल में है। शायद साथ में लोग ज्यादा हैं और रेस्ट हाउस की कैपेसिटी उतनी नहीं है।

आज शाम को प्रेम सागर की अमरकण्टक की घुमक्कड़ी के चित्र मिलेंगे और कल की योजनाओं का पता चलेगा। फिलहाल वे घूमने के लिये निकल लिये हैं और उनका फोन नेटवर्क कवरेज के बाहर है।


सवा इग्यारह बजे प्रेमसागर जी ने दूध धारा के कई अच्छे चित्र भेजे। उन्हें जोड़ रहा हूं नीचे कोलाज में –


कल बारिश का दिन रहा अमरकण्टक में


24 सितम्बर 2021, सवेरे:

कल प्रेमसागर जी के दो कांवर मित्र – भुचैनी पांड़े और अमरेंद्र पांड़े 10-11 बजे तक अमरकण्टक पंहुचेंगे। वे अपनी कांवर साथ ले कर आ रहे हैं। प्रेमसागर की कांवर कारपेण्टर जी से बनवा रहे हैं रेस्ट हाउस के वर्मा जी। परसों ये लोग नर्मदा उद्गम स्थल से जल उठा कर रवाना होंगे ॐकारेश्वर के लिये। प्रेम-भुचैनी-अमरेंद्र की तिगड़ी नये नये अनुभव करायेगी ब्लॉग पर।

प्रेमसागर आज सवेरे का चित्र भेजे। चाय पीते समय सामने का चित्र। रेस्ट हाउस का प्रांगण हरा भरा है। उस्पर कैप्शन लगाया है – रेस्ट हाउस के बाहर का सीन। कुहासा लगा हुआ है। हर हर महादेव।

प्रेम सागर में यही दिक्कत है – विस्तृत विवरण स्वत स्फूर्त नहीं निकलता। हर हर महादेव सम्पुट की तरह है, जो और कुछ न बोलने पर लगाया जा सकता है! बाकी, दृश्य कैसा बन रहा है, वह आप खुद ही देखें और उसकी शाब्दिक कल्पना करें। यह कृत्य वे सामने वाले पर छोड़ देते हैं।

रेस्ट हाउस के बाहर का सीन। कुहासा लगा हुआ है। हर हर महादेव।

उन्होने वन विभाग की औषधीय सम्पदा के चित्र भेजे हैं। कल मैं लिख भी चुका हूं कि वन विभाग आसवन कर (या अन्य प्रकार से) औषध निर्माण भी करता है। एक महिला साधना मार्को वहां काम करती हैं। उनके अलावा नर्सरी में काम करने वाले पांच सात लोग और सफाई कर्मी हैं। छोटे स्तर पर ही होता होगा यह कार्य, पर है यह रोचक। मन होता है कि वहां कम से कम एक पखवाड़ा रुका जाये।

अनेक औषधीय पौधों और वृक्षों के चित्र प्रेमसागर जी ने भेजे हैं। यह रुद्राक्ष का वृक्ष है –

रुद्राक्ष का वृक्ष

प्रेमसागर जी ने उस वृक्ष के नीचे से रुद्राक्ष के सूखे फल भी बीने हैं। उनकी वे माला बनायेंगे। मैं सोचता हूं कि 108 मनकों की मानक माला के बाद भी अगर बच रहें तो वे मेरे लिये रख लें। कभी मुझसे मिलेंगे तो उनकी यात्रा के प्रतीक के रूप में मोमेण्टो जैसा होगा वह! :-)

इससे प्रेमसागर रुद्राक्ष माला बनायेंगे।

एक अन्य वृक्ष – सीता अशोक की बात की प्रेमसागर जी ने। इसका उपयोग सम्भवत: अशोकारिष्ट बनाने में होता है। वृक्ष और उसके फल के चित्र नीचे दिये गये हैं।

सीता अशोक
सीता अशोक के फल

अन्य अनेक वनस्पतियों के चित्र भेजे हैं। मसलन मयूरपंखी का हम यहां छोटा पौधा देखते हैं; वहां उसका बड़ा वृक्ष है –

मोरपंखी का वृक्ष

जिस वन सम्पदा की बात कर रहे हैं प्रेम सागर जी, उनके बारे में तो एक ब्लॉग पोस्ट क्या, पुस्तक बन सकती है – अमरकण्टक के वृक्ष और वनस्पतियाँ। मैकल पर्वत, जिसका अमरकण्टक अंश है और विंध्य-सतपुड़ा के जंगलों की वन सम्पदा पर प्रवीण जी की दो पुस्तकों की जानकारी तो मुझे है। बहुत श्रमसाध्य अध्ययन किया है उन्होने।

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची

हनूमान जी लक्षमण जी के लिये संजीवनी उखाड़ने हिमालय पर चले गये। यहां आये होते तो यहां भी काम की चीज उन्हें मिल जाती। शायद। और यहां तो उतने समय में दो-तीन राउण्ड लगा लेते! रामचंद्र जी को मूर्छित भाई की दशा देख विलाप करने का शायद चांस नहीं मिलता। :lol:

प्रेम सागर जी को परसों नर्मदा मंदिर के दर्शन लोगों ने कराये। लोगों के बीच खड़े प्रेमसागार वीआईपी जैसे लग रहे हैं।

बांये से – मध्यप्रदेश पुलीस के दारोगा जी, संतोष प्रजापति (डिप्टी रेंजर साहब), प्रेम पांड़े, वीरेंद्र सिंह और नामदेव जी। नेपथ्य में नर्मदा मंदिर है।

प्रेम सागर जी का एक चित्र रेंजर साहब – मिथुन सिसोदिया जी के साथ भी है। आज वहां चीफ कंजरवेटर साहेब – कोई जोशी जी और मिश्र जी भी आने वाले हैं। प्रेमसागर जी से उनकी भी मुलाकात होगी। प्रेम जी का वीअईपियत्व बढ़ रहा है। मैं और आप उसके दर्शक भर हैं! :lol:

रेंजर साहब – मिथुन सिसोदिया जी के साथ

कल प्रेमसागर जी के दो कांवर मित्र – भुचैनी पांड़े और अमरेंद्र पांड़े 10-11 बजे तक अमरकण्टक पंहुचेंगे। ये दोनो सज्जन बलिया, उत्तरप्रदेश के हैं। वे अपनी कांवर साथ ले कर आ रहे हैं। प्रेमसागर की कांवर कारपेण्टर जी से बनवा रहे हैं रेस्ट हाउस के वर्मा जी। परसों ये लोग नर्मदा उद्गम स्थल से जल उठा कर रवाना होंगे ॐकारेश्वर के लिये। प्रेम-भुचैनी-अमरेंद्र की तिगड़ी नये नये अनुभव करायेगी ब्लॉग पर। आपने ब्लॉग सब्स्क्राइब न कर रखा हो तो कर ही लीजिये। … रोज एक ब्लॉगपोस्ट कांवर यात्रा पर लिखने का आदेश/ठेका तो भगवान महादेव ने मुझे थमा ही दिया है! बदले में यात्रा के पुण्य का पांच सात परसेण्ट शायद दे दें। वैसे क्या पता; शायद न भी दें! जैसा मैंने कहा, शंकर जी बहुत डाईसी देव हैं। आप उनकी भक्ति कर सकते हैं, पर उनसे सख्यभाव रखने का कोई विवरण दिखता नहीं! … ज्यादा सटने पर वे लतियाने की प्रवृत्ति वाले देव हैं!

एक ठो नंदी पांड़े ही हैं जो साथ साथ रहे हैं शंकर जी के। पर वो बेचारे भी मंदिर के बाहर सर्दी-बारिश-घाम सहते बैठे रहते हैं इंतजार में। कभी महादेव से ज्यादा लिपिड़-लिपिड़ करते नहीं सुना उनके बारे में। हम नंदी जी के असिस्टेण्ट भी बन पायें तो जीवन तर जाये!

इस पोस्ट के लिये इतना ही। बाकी फिर। हर हर महादेव। जय हो!


अंजनी कुमार जी की ट्विटर पर टिप्पणी –

अमरकण्टक – नर्मदा और सोन की कथाओं का जाल


22 सितम्बर 2021:

अमृतलाल वेगड़ उन्हें सौंदर्य की नदी, अमृतदायिनी नदी कहते हैं। सर्पिल, बल खाती, उछलती कूदती क्षिप्र गति से आगे बढ़ती नर्मदा मंत्रमुग्ध करती हैं। मेरे जैसे अ-कवि हृदय को भी इतना आकर्षित करती हैं कि मैं यहां अपने लैपटॉप के की-बोर्ड से जूझते हुये भी नर्मदा तट पर जाने की प्रबल इच्छा रखता हूं।

इधर प्रेम सागर अमरकण्टक की ओर बढ़ रहे थे, उधर मुझे अमरकण्टक से बहने वाली नदियों की भांति भांति की कथायें सुनने को मिल रही थीं। आज और अगले दो दिनों में प्रेमसागर नर्मदा और सोन आदि के उद्गम स्थलों को देख चित्र आदि भेजेंगे। नर्मदा की उत्पति और सोन से उनके सम्बंधों की बात उठेगी। उन कथाओं की बात होगी जो मैंने सुनी हैं, पर जिनपर कोई मत नहीं बनाया है।

सोन नदी नहीं नद है। नर्मदा चिरकुमारी हैं। उनकी शादी होने वाली थी सोन से, जो हुई नहीं। सोन जोहिला (नर्मदा की सखी/दासी/नाउन) के साथ वैवाहेत्तर सम्बंध बनाना चाह रहा था या बना चुका था। ये सब कथानक तत्कालीन समाज, उसके उन्मुक्त भाव या पितृसत्तात्मक स्वरूप आदि पर दृष्टि डालते है। नदियाँ, पर्वत, ताल, झील, समुद्र, सूर्य, चंद्रमा, नक्षत्र आदि प्राकृतिक संरचनायें हैं। भिन्न भिन्न समाज उन्हें समझने के लिये उन्हें मानवीय या अतिमानवीय गुण प्रदान करते हैं और उनकी प्रकृति अपनी कथाओं के आधार पर समझने समझाने का प्रयत्न करते हैं। वही गंगा-यमुना-सरस्वती-सिंधु के साथ हुआ है और वही नर्मदा, सोन और जोहिला के साथ भी।

जो कथा (कथायें) मुझे बताई गयीं नर्मदा के बारे में, वे निश्चय ही वैदिक या पौराणिक आधार रखती हैं। पर शहडोल-अमरकण्टक और छतीसगढ़ के जुड़े इलाके में गोंड जनजाति रहती आयी है। शैलेश पण्डित से मैं पूछता हूं कि पुष्पराजघाट (राजेंद्रग्राम) से अमरकण्टक के बीच कौन रहते हैं तो उनका कहना है कि सकरा घाटी और उसके बाद के विंध्य के (?) पठारी भू भाग में दूर दूर बसे गोंड गिरिजनों के गांव (उनकी भाषा में ‘टोला’) हैं। आज से नहीं; आदि काल से यही गिरिजन वहां हैं। मनु, मार्कण्डेय, अत्रि या अगस्त्य और आज के तिवारी, पांड़े, ठाकुर, वैश्य आदि तो बाद में आये होंगे (मेरा कयास)। गोंड क्या लोककथा रखते हैं नर्मदा के बारे में? उनकी कथायें वही या उसी जैसी हैं जो मनु, मार्कण्डेय की पौराणिक कथायें हैं या उनसे कुछ अलग? नर्मदा के क्षेत्र में वे तो पहले (आदि) मानव रहे होंगे।

मुझे इण्टरनेट पर मोऊमिता डे (Moumita Dey) जी का एक रिसर्च पेपर मिला। इस सात पेज के वर्ड डॉक्यूमेण्ट में भिन्न भिन्न समाजों में नर्मदा के विषय में प्रचलित कथाओं का विश्लेषण है। यह रिसर्च पेपर आपको किसी निष्कर्ष पर नहीं पंहुचाता। वह शायद उसका ध्येय भी नहीं है।

वह रिसर्च पेपर केवल यह बताता है कि प्रत्येक समाज ने प्रकृति की देन – नदियों – को अपनी अपनी मान्यताओं के अनुसार गुण प्रदान किये हैं। पितृसत्तात्मक समाज में नारी (नर्मदा) किस प्रकार अपने को अभूतपूर्व बनाने के लिये संघर्ष करती है और किस प्रकार वह सफल या असफल होती है, उसकी झांकी लोक मान्यताओं/कथाओं में है। सुश्री डे के रिसर्च पेपर में अगर कोई पक्षपात है तो वह फेमिनिस्ट पक्षपात ही होगा।

पितृसत्तात्मक समाज – चाहे वह मनु मार्कण्डेय के गोल वाला हो या गिरिजनों के गोल वाला, वह नारी (अर्थात नर्मदा) की महत्ता यूंही स्वीकार नहीं करता। पहले वह उसे लांछित या उपेक्षित करता है, पर अगर फिर भी नारी अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित कर देती है, जो नर्मदा के मामले में है; तो वह उसे देवी का दर्जा देकर पूजनीय बना देता है।

नर्मदा मंदिर, अमरकण्टक

पेपर के अनुसार गोंड समाज में मान्यता है कि –

  • नर्मदा माँ देवी थीं और उनके सोन के साथ (संसर्ग से) एक बच्चा हुआ था।
  • नर्मदा के रूप रंग आकार प्रकार के बारे में गोंण लोक गाथा कुछ नहीं कहती।
  • जब नर्मदा ‘सिंगल मदर’ थीं (बिना बच्चे के पिता का नाम बताये) अपने बच्चे के लिये और वे जीवनदायिनी हैं। यह उनकी प्रकृति बताई गयी है। अर्थात अपने बच्चे का खुद पालन देखभाल करने वाली।
  • जिस कथा में वे यह बताती हैं कि उनका शिशु सोन के संसर्ग से है, वहां उन्हें आत्महत्या करनी पड़ती है।
  • गोंड गिरिजनों के मातृकुलीय समाज में स्त्री अपने बच्चे का लालन पालन कर सकती है, बिना अपने बच्चे के पिता या अपने पति का नाम बताये। पर अगर पिता कुल के बाहर का होता है तो नारी उपेक्षित और निंदनीय हो जाती है।
*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची

गोंड सोन को अपने कुल का मानते हैं। नर्मदा का अपने कुल के व्यक्ति से सम्बंध हो तो वह ‘स्वीकार्य है’ भले ही मातृकुलीय परम्परा पिता के जनक का नाम न घोषित करे। पर एक अन्य लोक कथा – सोन-मुदा की लोक कथा – में सोन गोंड समाज से इतर है और तब नर्मदा को अपनी दिव्यता के बावजूद आत्महत्या करनी पड़ती है।… कुल मिला कर नर्मदा के चरित्र की परिकल्पना बहुत कुछ इसपर निर्भर करती है कि कौन समाज वह परिकल्पना कर रहा है।

नर्मदा गिरिजनों की भी नदी हैं और आर्यजनों की भी। इसलिये उनकी कथाओं और उनको दिये गये attributes में अंतर है। आर्यजनों की नर्मदा चिरकुमारी हैं। गंगा जितनी पवित्र हैं। पितृसत्तात्मक समाज में भी अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित करने के कारण; एक बड़े विंध्येत्तर भू भाग की जीवनदायिनी पुण्यसलिला नदी होने के कारण; वे उतनी ही पूज्य हैं; वैसी ही पापनाशिनी हैं, जैसी माँ गंगा।

अमृतलाल वेगड़ उन्हें सौंदर्य की नदी, अमृतदायिनी नदी कहते हैं। सर्पिल, बल खाती, उछलती कूदती क्षिप्र गति से आगे बढ़ती नर्मदा मंत्रमुग्ध करती हैं। मेरे जैसे अ-कवि हृदय को भी इतना आकर्षित करती हैं कि मैं यहां अपने लैपटॉप के की-बोर्ड से जूझते हुये भी नर्मदा तट पर जाने की प्रबल इच्छा रखता हूं।… और इसके अलावा सोन (शोणभद्र नद) को भी आदर मिलना चाहिये। यह कहना कि वह एक नाउन या दासी के साथ सम्बंध बना रहा था; धिक्कृत लोक मानसिकता है। जोहिला भी एक अच्छी बलखाती ट्रिब्यूटरी नदी है। उसका भी मान होता चाहिये। … नदी, कोई भी हो, प्रकृति का वरदान है। मानव उसकी इज्जत करेगा तो प्रकृति मानव की इज्जत करेगी। अन्यथा भारत की अनेक नदियाँ माता का दर्जा पाने पर भी आई.सी.यू. में हैं। मरणासन्न! :sad:

यह सब पढने-जानने के बाद में मनु-मार्कण्डेय-पुराण-नर्मदा उद्गम- सोन मुदा और गिरिजनों की लोक कथाओं के जाल को विराम देते हुये; मैं केवल नर्मदा के सुंदर, चंचल और जीवनदायी स्वरूप के प्रति ही सोचूंगा। सोन/शोणभद्र, जोहिला और नर्मदा के सम्बंधों की बात को विराम देता हूं।

और इससे जुडी बात – ईश्वर की, देवों की रचना मनुष्य ने की है; या प्रकृति को, मनुष्य को ईश्वर ने रचा है; उसके पचड़े में पड़ने का भी कोई लाभ नहीं है। जो सामने है, वह सत्य है, सुंदर है, शिव है। वही सोचो और वही लिखो जीडी!

हर हर महादेव!

(इस पोस्ट का ऊपर का चित्र शैलेश पंडित का हैं। हेडर में प्रेमसागर नर्मदा मंदिर में हैं।)

23 सितम्बर 2021 सवेरे:

कल प्रेमसागर नर्मदा मंदिर गये थे। उसके अनेक चित्र उन्होने भेजे हैं। मैंने उन्हें कहा है कि मुझे चित्रों की आवश्यकता जितनी है उससे दस गुना चित्र भेजे हैं। उनमें से कुछ का प्रयोग मैं आगे एक दो दिन में करूंगा।

एक अच्छी बात उन्होने बताई कि वन विभाग एक आसवन शाला चलाता है संजीवनी नामके स्थल पर। वहां अश्वगंधा, नीम का तेल आदि अनेक दवायें वे निर्मित करते हैं। उनकी बिक्री भी होती है। वहां आई ड्रॉप का आसवन चल रहा था। एक कर्मी, साधना मार्को जी वहां लैब में काम कर रही थीं। प्रेमसागर ने भी वहां आई-ड्रॉप लिया।

एक कर्मी, साधना मार्को जी वहां लैब में काम कर रही थीं।

आज प्रेम सागर जी ने बताया कि प्रयाग-बनारस के बीच चलने वाले दो कांवरिया बंधु कल अमरकण्टक पंहुच रहे हैं। वे भी प्रेम जी के साथ अमरकण्टक से कांवर उठा कर साथ चलेंगे और उनके साथ ॐकारेश्वर-महाकाल तक साथ रहेंगे। … कारवाँ बढ़ेगा, जैसी टिप्पणी में कयास व्यक्त किया था कृष्ण देव जी ने! :-)

प्रेम सागार जी की गतिविधि के बारे में कल लिखा जायेगा। आज तो आप मेरी उक्त ‘मानसिक हलचल’ से ही अवगत हों! :-)


Design a site like this with WordPress.com
Get started