पिताजी और यादें


संझा में बरामदे में बैठे, बतियाते पिताजी।
संझा में बरामदे में बैठे, बतियाते पिताजी।

शाम को घर के बरामदे में कुर्सी डाल हम बैठे थे – पिताजी, पत्नीजी और मैं। बात होने लगी पिताजी के अतीत की।

डिमेंशिया है पिता जी को। हाल ही की चीजें भूल जाते हैं। पुराना याद है। आवाज धीमी हो गयी है। कभी कभी शब्द नहीं तलाश पाते विचार के लिये। जब समझ नहीं आता तो हमें दो-तीन बार पूछना पड़ता है। यह सब फुरसत में ही हो पाता है। शाम को बरामदे में बैठे यह सम्भव है – जब समय की हड़बड़ी नहीं होती।


सन 1934 के जन्मे हैं मेरे पिताजी। गांव शुक्लपुर, तहसील मेजा, जिला इलाहाबाद। सामान्य सा गांव है शुक्लपुर। नाम शुक्लपुर है पर घर पाण्डेय लोगो के हैं। एक आध घर ही होगा शुक्ल लोगों का। गांव से गंगाजी 3 किलोमीटर की दूरी पर हैं। गांव में और आसपास के गांवों में खेत हैं हम लोगों के। कुछ बगीचे हैं – जिनके पेड़ पुराने हो कर खत्म हो रहे हैं। नये लगाये ही नहीं जा रहे। अब अलगौझी के कई दौर होने के कारण हर एक के हिस्से जमीन बहुत कम हो गयी है। घर का बड़ा मिट्टी का मकान था। करीब आधा बीघा जमीन पर। सौ साल से ज्यादा चला। हम लोग उसकी मरम्मत की सोच रहे थे। पर करीब तीन साल पहले उसे ढहा कर नया बनाने की सोची गयी। ढहा तो दिया गया, पर नया बनाने की बात पर एका नहीं हो पा रहा। गांव को लोग दुहना चाहते हैं – उसे सम्पन्न कोई नहीं करना चाहता।

चारदीवारी ले अन्दर एक बड़ा अहाता था, उसमें नीम का पेड़ था। नीम अब नहीं है।
शुक्लपुर का हमारा कुटुम्ब का मकान। अब नहीं है।

गांव से करीब 8 किलोमीटर दूर है सिरसा। बाजार है। मेरे प्रपितामह के छोटे भाई प. आदित्यप्रसाद पाण्डेय वहां वैद्यकी करते थे। पहले बनिया लोगों के किराये पर लिये मकान में रहते थे। फिर वहीं जमीन खरीद कर मकान बनाया। वह पुराना मकान अब भी है। पर उसी साथ नया भी बना लिया है उनके पुत्र श्री तारकेश्वर नाथ पाण्डेय ने। प. आदित्यप्रसाद आयुर्वेद में आचार्य भी थे और नाड़ी-वैद्य भी। श्री तारकेश्वर जी ने उनका दवाखाना आगे चलाया। वे कुछ अपने पिताजी से सीखे, कुछ होमियोपैथी की डिग्री ले कर हासिल किया। चिकित्सालाय उनका भी अच्छा चलता रहा है।

यहां पिताजी की यादें मूलत: इन्ही स्थानों और परिवेश की हैं।


पिताजी ने बताया कि गांव का मकान लगभग तब का था जब मालिक (मेरे बब्बा प. महादेवप्रसाद पाण्डेय जन्मे होंगे या कुछ छोटी उम्र के रहे होंगे। मेरे बब्बा का जन्म 1900 में हुआ था। वह मकान मेरे पर-बाबा प. हरिभूषण पाण्डेय ने बनवाया था। अलगौझी के बाद। सिरसा में वैद्य जी ने किराये पर मकान ले वैद्यकी करते हुये वहां बनिया लोगों से जमीन खरीद कर घर बनाया। पैंतीस सौ रुपये में खरीदी थी वह जमीन। बाद में घर के पीछे की जमीन भी किसी मुसलमान से खरीदी और घर का क्षेत्रफल बढ़ाया।

इण्टर की पढ़ाई मेरे पिताजी ने वैद्य जी के पास रहते हुये सिरसा में की।  सिरसा की यादें बताते हुये उन्होने कहा कि वह आजादी के समय का दौर था। गान्धी-नेहरू-विजयलक्ष्मी पण्डित आदि लोग वहां आते रहते थे। महामना मदन मोहन मालवीय जी भी आते थे। मालवीय जी और गान्धीजी में बनती नहीं थी। उन्होने एक फोटो देखी है जिसमें गान्धीजी मालवीय जी का हाथ पकड़ कर मंच पर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। नहीं तो दोनो एक साथ कम ही होते थे।

उन्हे याद है कि गान्धीजी सिरसा में करीब तीन-चार बार आये थे। नेहरू-विजयलक्ष्मी-कैलाशनाथ काटजू आदि तो आते रहते थे। शास्त्रीजी तो बहुत ही आया-जाया करते थे।

“एक बार नेहरू जी और विजयलक्ष्मी पण्डित शुक्लपुर  आये। उस जमाने में कोई गाड़ी नहीं होती थी। एक पुरानी कार का इंजतजाम हुआ था उन्हे लाने के लिये। भरत सुकुल का लड़का नन्दकिशोर कलकत्ता में कुछ गाड़ी चलाना सीखा था। उसी को जिम्मा दिया गया चलाने को। पर उससे पुरानी कार हड़हड़ाई बहुत, चली नहीं।” :-) 

“विजय लक्ष्मी पण्डित से मिलने सुकुलपुर में गांव की कई औरतें आयीं। त्रिभुअन की माई विजयलक्ष्मी का पैर छूने लगी तो उम्र के लिहाज से विजयलक्ष्मी जी ने ही उनका पैर छू लिया। त्रिभुअन की माई कहने लगी – ल बहिनी हम त तोहार गोड़ छुअई आइ रहे, तू हमरई छुई लिहू (लो बहिन, मैं तो तुम्हारा पैर छूने आई थी, तुमने तो मेरा ही छू लिया)।”

“उस समय आजादी, देश, राजनीति के बारे में गांव में जागरूकता थी। लोग पढ़े-लिखे कम थे, पर इन सब पर चर्चा करते थे। औरतें जो परदा में रहती थीं, भी बाहर गांव में जुलूस में निकला करती थीं। लोगों में स्वार्थ कम था; जागरूकता अधिक थी।”

“सिरसा में हम गंगा नहाने जाते थे – लगभग रोज। घर में कोई तैराक नहीं था। वैद्य जी भर कुछ तैरना जानते थे। नदी पार करने के लिये पॉण्टून वाला पुल नहीं हुआ करता था (वह तो आज से पच्चीस साल पहले बनने लगा)। लोग या तो डोंगी से पार जाते थे सैदाबाद की ओर या झूंसी वाले पुल से आवागमन होता था।”

“वैद्य जी विद्वान थे। पैसे का लोभ नहीं था उन्हे। बहुतों की निशुल्क चिकित्सा करते थे। पैदल जाते थे मरीज देखने। दूर जाना होता था तो लोग इलाज करवाने पालकी में ले जाते थे। सिरसा में न्योता (भोज) का बहुत चलन था। वैद्यजी न्यौता पर नहीं जाते थे। हम लोगों को जाने को कहते थे। जब कोई नहीं जाता था तो भोजन घर पर ही भेज देते थे लोग।”

खास बात यह थी कि वैद्यजी और मालिक (मेरे पिताजी के पिताजी) कभी झूठ नहीं बोलते थे।

“वैद्य जी का पहले कम्पाउण्डर था शीतला। वह कुशल हो गया था। दवा भी करना जान गया था। उसे बाद में कपारी (?) हो गयी थी। उसी से मर गया। उसके बाद गंगा कम्पाउण्डर बना। जात का नाऊ था। वह भी बहुत दक्ष हो गया था।”

पिताजी टुकड़ों में बताते हैं – जैसे याद आता है। प्रश्न करने पर सोच कर उत्तर देते हैं। मैने पाया कि प्रश्न करना और उनके कहे को नोट करना उन्हे अच्छा लगता है। सोचता हूं कि भविष्य में इस तरह बैठने-सुनने का अवसर अधिक मिलता रहेगा।

पिताजी की पुरानी याद पर एक पोस्ट – एक कस्बे में १५ अगस्त सन १९४७ 


कटका (गांव) के लिये ब्रॉडबैण्ड की तलाश


मेरा विचार कटका/विक्रमपुर (जिला भदोही) को साल-छ महीने में सोशल मीडिया में कुछ वैसा ही प्रोजेक्ट करने का है, जैसा मैने शिवकुटी के गंगा कछार को किया था। ग्रामीण जीवन में बहुत कुछ तेजी से बदल रहा है। उस बदलाव/विकास को दर्ज करना और जो कुछ विलुप्त होता जा रहा है, उसका आर्काइव बनाना एक महत्वपूर्ण कार्य है। बहुत से लोग बहुत प्रकार से यह करने में लगे हैं। मैं इसे अपने तरीके से करना चाहता हूं।

दूसरे, यद्यपि मैं राजनैतिक जीव नहीं हूं; मेरी विचारधारा केन्द्र और दक्षिण-पंथ के बीच की है। यदा कदा प्रियंकर जी जैसों के प्रभाव में वामपंथी टाइप सोच लेता हूं – पर वह एबरेशन है। मुझे यकीन है कि साम्य-समाजवाद की पंजीरी जनता में बांटने से जनता का न भला होगा, न पेट भरेगा। न रोजगार मिलेंगे और न गांव देहात से लोगों का महानगरों को पलायन रुकेगा। … जहां मैं रहने जा रहा हूं वहां पर्याप्त गरीबी/अशिक्षा/चण्टई/चिरकुटई है। भारत की सरकार अनेकानेक प्रकार से विकास की योजनायें – विशेषत: डिजिटली गांवों को एम्पावर करने की योजनायें बता रही है। उस सब के बारे में देखना, तथा अपनी सोच को गांव में टेस्ट करना और उस विषय में लिखना – यह मेरे मन में है।

यह लेखन एक अच्छी इण्टरनेट कनेक्टिविटी मांगता है। अभी वह गांव में मुझे मिलती नजर नहीं आती।

श्री करुणेश प्रताप सिंह, महाप्रबन्धक, टेलीकॉम, वाराणसी जिला।
श्री करुणेश प्रताप सिंह, महाप्रबन्धक, टेलीकॉम, वाराणसी जिला।

बेहतर नेट कनेक्टिविटी के लिये मैने एक बीएसएनएल का लैण्डलाइन फोन और ब्रॉडबैण्ड कनेक्शन लेने का निश्चय किया। तब पता चला कि गांव के उस क्षेत्र में – जहां मेरा घर बन रहा है, कोई संचार केबल नहीं गयी है। अत: मुझे महाप्रबन्धक, टेलीकॉम महोदय से मिल कर अनुरोध करना एक सही रास्ता लगा। पिछले दिनों मैं वाराणसी जिले के महाप्रबन्धक, टेलीकॉम; श्री करुणेश प्रताप सिंह जी से मिला।

करुणेश जी ने मेरी बात ध्यान से सुनी और पूरी सहायता का आश्वासन दिया। उन्होने अपने सहकर्मियों को मेरा आवेदन स्वीकार करने और उसके क्रियान्वयन के लिये त्वरित कार्रवाई करने के लिये भी कहा। इससे बेहतर की मैं अपेक्षा नहीं करता था।

बातचीत में पता चला कि करुणेश जी पास के प्रतापगढ़ के रहने वाले हैं और पूर्वांचल के शहरी-ग्रामीण जीवन के बारे में उनकी पर्याप्त जानकारी भी है और अपनी सोच भी। जहां मैं ग्राम्य जीवन के बारे में नोश्टाल्जिया और स्वप्न के आधार पर चल रहा हूं, उनके पास ठोस धरातल का अनुभव दिख रहा था।

मेरे गांव में जाने के बारे में उन्होने बताया – “आप फिक्र न करें; वहां आपको अपना परिचय नहीं देना होगा। वे अब तक आपके बारे में इतना खोद-निकाल चुके होंगे, जितना आप खुद अपने बारे में नहीं जानते!।” :lol:

“गांव में राजनीति करने वाले आपके बारे में व्यस्त हो जायेंगे और आशंकित भी होंगे कि कहीं आप राजनीति में तो पैठ नहीं करने जा रहे। दूसरे; कई लोग सोचेंगे कि सरकारी उच्च पद से रिटायर होने के कारण आपके पास ‘खूब’ पैसा होगा।” 

“सुरक्षा और स्वास्थ्य – ये ही मुद्दे हैं जिनपर आपको ध्यान देना है। अन्यथा बहुत से लोग हैं जो शहर से उकता कर शहर के आस-पास के गांवों में रहने की सोच रहे हैं – विशेषत: वे जिनके बच्चे सेटल हो कर अलग अलग रहते हैं।” 

करुणेश जी ने मेरी एक बड़ी समस्या – संचार और नेट कनेक्टिविटी – का समाधान का आश्वासन दे दिया था। एक इण्टरनेटीय कीड़े के लिये इससे ज्यादा प्रसन्नता की क्या बात हो सकती थी! उनसे मिल कर जब मैं लौट रहा था तो गांव में रहने के बारे में मेरे स्वप्न और पुख्ता होने लगे थे। पहले वे कुछ धुन्धले थे, अब उनके रंग चटक होने लगे थे।

सही व्यक्ति से और वे भी जो आपको बड़ी एकाग्रता से समय दे कर मिलें; इण्टरेक्शन कितनी प्रसन्नता दे सकता है। सरकारी क्षेत्र के अफसर भी ऐसे हो सकते हैं – यह अनुभूति बहुत सुखद लगी।


अविनाश सिरपुरकर : एक दण्ड-अधिवक्ता के पीछे का व्यक्तित्व


श्री अविनाश सिरपुरकर (उनके फेसबुक प्रोफाइल का चित्र)
श्री अविनाश सिरपुरकर (उनके फेसबुक प्रोफाइल का चित्र)

समाचारों में मैं क्रिमिनल लॉयर्स के बारे में बहुत पढ़ता-सुनता रहा हूं। पर पहले किसी क्रिमिनल लॉयर से सम्पर्क नहीं हुआ था। अत: एक कौतूहल तो था मन में कि ये व्यक्ति अपराध, छद्म, और मामलों को सदा एक्यूट एंगल से देखते देखते अपने सामान्य व्यक्तित्व, आदर्श और नैतिकता को किस स्तर का बनाये रखते हैं। यह इच्छा मन में थी कि अगर ऐसे किसी व्यक्ति से कभी मिला तो इस बारे में पूछूंगा जरूर।

मुझे अवसर मिल गया जब मैं उस दिन अपने काम से श्री अविनाश सिरपुरकर से उनके इन्दौर के दफ्तर में मिला। उनसे इस विषय में टेनटेटिव प्रश्न किया। पर अविनाश जी ने सम्भवत: इसे मूल विषय से इतर मान कर यही समझा कि मैं उनसे नेटवर्किंग बनाने के लिये इस प्रकार का प्रश्न कर रहा हूं। वह बात वहीं रह गयी।

अविनाश जी से अगले दिन पुन: मुलाकात हुई। रतलाम में। तब उन्होने स्वयम अपने विषय में (लगभग) विस्तार से बताया।

अविनाश मध्य प्रदेश हाई-कोर्ट के वरिष्ठ दण्ड-अधिवक्ता (क्रिमिनल लॉयर) हैं। वरिष्ठ और व्यस्त। “मेरी सात पीढ़ियां अधिवक्ताओं/कोर्ट-कचहरी वालों की हैं।” उनकी मानी जाये तो कानून-कोर्ट-कचहरी-अदालत केन्द्रित है उनका जीवन। “उसके अलावा कुछ नहीं”।

मैं असहमति जताता हूं। एक व्यक्ति जो सफलता के सोपान तय कर के (लगभग) शीर्ष पर पंहुचता है, एकांगी नहीं हो सकता। किसी न किसी अन्य प्रकार से समाज के प्रति अपना दायित्व समझता होगा – अगर वह मात्र आत्मकेन्द्रित/स्वार्थपरायणी न हो। और एक इण्ट्रोवर्ट व्यक्ति के भी उत्कृष्टता के एक से अधिक पहलू होते हैं।

स्टीफन आर कोवी की पुस्तक – द एड्थ हैबिट ( THE 8TH HABIT: FROM EFFECTIVENESS TO GREATNESS) पढ़ते समय मुझे यह गहरे से महसूस हुआ था कि सफल व्यक्ति केवल सफलता पर ही ठहरता नहीं है। उसमें समाज और जीवन को प्रतिदान (contribution) करने,  मूल्य (values) देने, और लीगेसी स्थापित करने की अंतर्निहित इच्छा होती है। यह मानव का मूल स्वभाव है।

अविनाश जी का फेसबुक कवर
अविनाश जी का फेसबुक कवर

इस बारे में अविनाश जी काफी झिझकते हुये खुले। मुझ जैसे लगभग अपरिचित से खुलने में होने वाली झिझक स्वाभाविक है। शुरुआत उन्होने अपने घर के पास एक मन्दिर बनाने की बात से की। मैं धार्मिकता का पहलू समझ सकता हूं। उनके फेसबुक प्रोफाइल के कवर पर गजानन महाराज का चित्र है। उन्होने बातचीत में शेगांव (वह स्थान जहां गजानन महाराज प्रकट हुये) की चर्चा भी की।

इसके बाद उन्होने जिस बात की चर्चा की, वह प्रसन्न कर देने वाली थी। अपने किसी मित्र ‘व्यास जी’ के कहे अनुसार वे सन 2003 से प्रतिवर्ष इंजीनियरिंग/डाक्टरी के कुछ विद्यार्थियों की शिक्षा का खर्च वहन करते हैं। उसमें विद्यार्थी के साथ तय यही होता है कि पढ़ाई के बाद समर्थवान हो कर वह भी इसी प्रकार दूसरों की पढ़ाई में सहयोग करेगा।

“क्या वे बाद में ऐसा करते हैं?”

“जी हां।”

मुझे अच्छा लगा यह जानकर कि इस तरह अविनाश जी विद्यादान की चेन कायम कर रहे हैं।

आगे स्वत: बताया उन्होने – “वकालत में सफलता के कारण मुझे पैसे की समस्या नहीं है। मेरा विचार है कि पचपन की अवस्था तक वकालत करूंगा। उसके बाद आदिवासियों के बीच काम करने का मन है।”

“अच्छा! क्या तय कर लिया है कि कहां और किस प्रकार कार्य करेंगे?”

अविनाश जी ने झाबुआ क्षेत्र की बात की। रतलाम रेल मण्डल में लम्बे अर्से तक कर्य करते हुये मुझे झाबुआ के आदिवासियों की विपन्नता के बारे में अनुभूति है। अनेक आदिवासी लोगों के चेहरे मेरी स्मृति में हैं। वनवासी कल्याण की जरूरतों के बारे में बहुत लोगों से सुना है। अत: यह जान कर बहुत अच्छा लगा।

मैने अविनाश जी से अपनी भी कही – आने वाले समय में गांव और गंगा नदी के सामीप्य में रहने की बात। उन्होने कहा – अच्छा है। आपके पास गंगा हैं और मेरे समीप हैं नर्मदा!

बातचीत के प्रारम्भ में मैं एक क्रिमिनल लॉयर के समक्ष था। एक ऐसा व्यक्ति जो सामने वाले को अपने तर्क, सूचना और वाकपटुता से हतप्रभ और निष्प्रभावी करने में दक्ष होता है। जिस क्रिमिनल लॉयर का यह ‘आवरण’ जितना कठोर और इम्प्रेगनेबल होता है, वह (मेरे अनुमान से) अपने पेशे में उतना कुशल होता है। पर बातचीत समाप्त कर हाथ मिलाते हुये मैं उस आवरण के पीछे के एक संवेदनशील और समाज के प्रति जिम्मेदार व्यक्ति से परिचय पा चुका था। एक सज्जन और एक उत्कृष्ट व्यक्ति से परिचय पाना किसे अच्छा नहीं लगता?

मैं वास्तव में प्रसन्न था। भविष्य में अगर अविनाश जी से सम्पर्क बना रहा तो उनके झाबुआ अदिवासियों के कल्याण कार्यों के बारे में जानने की इच्छा रहेगी!


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