प्रेमसागर के बारे में आशंकायें


18 सितम्बर 2021:

“आप मेरे बारे मेंं लिख रहे हैं, उससे मैं गर्वित नहीं होऊंगा, इसके लिये सजग रहा हूं और रहूंगा। आप डेली लिखें चाहे दिन में तीन बार भी लिखें, मैं उससे विचलित नहीं होऊंगा, भईया। लालसा बढ़ने से तो सारा पूजा-पाठ, सारी तपस्या नष्ट हो जाती है।”

सुधीर पाण्डेय

दो लोगों ने मुझसे प्रेमसागर जी के बारे में बातचीत की है। सुधीर पाण्डेय ने अपनी निम्न आशंकायें और निदान एक वॉईस मैसेज में व्यक्त किये हैं –

  • प्रेमसागर अभी रिजर्व ऊर्जा के बल पर आगे बढ़ते चले जा रहे हैं। जिस तरह का शारीरिक बनाव प्रेमसागर जी का है, शीघ्र ही इनके शरीर में आवश्यक तत्वोंं की कमी होने लगेगी। जरूरी है कि वे नित्य एक दो केले, जब सम्भव हो तो दूध या दही का प्रयोग करें जिससे मिनरल, आयरन और प्रोटीन की जरूरत पूरी हो सके। इसके अलावा उन्हें मल्टीविटामिन और कैल्शियम के सप्लीमेण्ट लेने चाहियें।
  • लम्बी दूरियाँ तय करने और लम्बे समय तक पैदल चलने से इनके पैरों में घाव हो जायेंगे। उसका उपाय जूता नहीं सेण्डिल है। जूते से पसीना होता है और वह अपने इनफेक्शन/जर्म्स देता है। सेण्डिल मोजे के साथ पहना जाये तो रास्ते की धूल कंकर से भी बचाव होगा।
  • तीसरा, उनको आगे पीछे से आने जाने वाले वाहनों से बचाव की अधिक जरूरत है। भारत में लोग अंधाधुंध वाहन चलाते हैं। सवेरे और शाम के धुंधलके में अपना बचाव करने के लिये उन्हें सड़क पर या रेलवे में काम करने वाले लोगों की तरह रिफ्लेक्टर वाले जैकेट का प्रयोग करना चाहिये जिससे उनको अंधेरे में चीन्हा जाना सरल हो। उन्हें चलना भी सड़क के दांई ओर चाहिये जिससे पीछे से आने वाले वाहनों की टक्कर का खतरा न हो।
  • उनके पास सही पहचान के लिये पहचान पत्र, आईडेण्टिटी लेपल होना चाहिये। भारत में अनपढ़ और अफवाह पर यकीन कर मारपीट करने वालों की कमी नहीं है। “बच्चे उठाने वाले” या “मुंहनोचवा” जैसी अफवाह पर लोग व्यर्थ उत्तेजित हो कर अजनबी और अकेले चलने वाले पर आक्रामक हो सकते हैं; होते हैं।
राजीव टण्डन

राजीव टण्डन जी, जो मेरे अन्यतम ब्लॉगर मित्र हैं; प्रेमसागर के अनूठे संकल्प से बहुत प्रभावित थे। उनके अनुसार भारत की इस प्रकार की यात्राओं के उन्हें तीन उदाहरण मिलते हैं इतिहास में – पहला है आदि शंकराचार्य का। दूसरा स्वामी विवेकानंद का। तीसरा महात्मा गांधी का। गांधी जी का ध्येय शायद अलग प्रकार का, राजनैतिक था; पर था वह भी विशाल ही। ये तीनों यात्रा से इतना निखरे कि अभूतपूर्व बन गये। प्रेमसागर के साथ क्या होगा, कहा नहींं जा सकता। उनका प्रयोग-प्रयास तो दशरथ मांझी जैसे की याद दिलाता है। उनके पास कांवर यात्राओं का पहले का भी अनुशासन है।

राजीव जी ने कहा – “पर पहले जिस प्रकार की उन्होने कांवर यात्रायें की, उसमें बहुत ज्यादा पब्लिसिटी नहीं रही होगी। अब वे जो कर रहे हैं; उसके बारे में आप जो लिख रहे हैं; उसका अप्रिय पक्ष यह है कि उन्हें जो लाइमलाइट मिलेगी वह उन्हें सहायता की बजाय उनके ध्येय में अवरोध बन सकती है।”

राजीव टण्डन जी की आशंका से मेरी पत्नीजी भी सहमत हैं। उनके अनुसार भगवान अपने भक्त की साधना की तीव्रता टेस्ट करने के लिये प्रसिद्धि, सफलता, प्रभुता जैसे कई चुग्गे डालते हैं। उनके कारण हुये अहंकार से साधक को निपटना पड़ता है। “आखिर देखिये न! नारद जैसे सरल भग्वद्भक्त ब्रह्मर्षि की भी यह परीक्षा लेते कितनी फजीहत कराई उन्होने। ये भगवान बहुत बड़े कलाकार हैं।”


प्रेमसागर पाण्डेय

मैंने उक्त मुद्दों पर प्रेमसागर जी से बड़ी बेबाकी से बातचीत की। सुधीर जी की आशंकाओं और सुझावों से मोटे तौर पर सहमत दिखे प्रेमसागर। सैण्डिल और मोजा पहनने को वे तैयार हो गये हैं। दो केले सेवन का दैनिक कृत्य करना उन्हें उपयुक्त लग रहा है। बीच में जब सुलभ हो दूध दही का प्रयोग भी करने को माना। मल्टीविटामिन आदि के बारे में सुधीर जी को बताना होगा। वैसे वे बबूल का गोंद और मिश्री रात में पानी में भिगो कर सवेरे उसका सेवन करने लगे हैं। बताया गया है कि वह शरीर में जरूरी पौष्टिकता देता है। वे अपने परिचय पत्र के बारे में भी सुधीर पाण्डेय जी से बात करेंगे। रिफ्लेक्टर वाले जैकेट के बारे में तो कोई धार्मिक अड़चन है ही नहीं, उसकी उपलब्धता का मुद्दा जरूर है। सतर्क चलने को तो वे भी महत्व देते हैं।

राजीव टण्डन जी और मेरी पत्नीजी की आशंकाओं के बारे में प्रेमसागर ने कहा – “भईया, इस बारे में पहले से पता है। सतर्क तो हम पहले से ही हैं। मेरे साथ बाबा धाम की कांवर यात्रा करने वाले बंधु ने भी इस बारे में पहले से आगाह कर दिया था कि बहुत से लोग आयेंगे उनसे विचलित नहीं होना है। मैं खुद लोगों को अपनी ओर से कहता हूं कि वे मुझे बाबाजी या महराज जी न कहा करें, भाई कह कर बुलाया करें। लोगों को अपनी ओर से मैं परिचय नहीं देता कि यह यह करने निकला हूं या काशी से आ रहा हूं। आज अनूपपुर के दस पंद्रह किलोमीटर पहले एक वृद्ध मिले थे। वे कहे कि उनकी पतोहू की डिलिवरी होनी है और वह बहुत पीड़ा में है। अगर वे कुछ मंतर जंतर सकें… मैंने उन्हें कहा कि मैं तो साधारण तीर्थयात्री हूं, कोई बाबा या महराज नहीं जो इस प्रकार की सहायता कर सकूं। हमें तो बाबा का ‘ब’ नहीं मालुम है। …।”

“आप मेरे बारे मेंं लिख रहे हैं, उससे मैं गर्वित नहीं होऊंगा, इसके लिये सजग रहा हूं और रहूंगा। आप डेली लिखें चाहे दिन में तीन बार भी लिखें, मैं उससे विचलित नहीं होऊंगा, भईया। लालसा बढ़ने से तो सारा पूजा-पाठ, सारी तपस्या नष्ट हो जाती है।”

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची

कल 17 सितम्बर को प्रेमसागर शहडोल से अनूपपुर की पदयात्रा सम्पन्न किये। रास्ते में एक दो जगह बारिश के कारण रुकना पड़ा; पर व्यवधान ज्यादा नहीं हुआ। मैंने दो तीन बार बीच में बात की। मेरे मन में यह था कि अगर मौसम अचानक बहुत खराब हुआ तो फंस सकते हैं प्रेमसागर। पर वैसा कुछ हुआ नहीं। उनके उत्साह में कोई कमी नहीं लगी बातचीत में।

गूगल मैप में नया रास्ता और पुराना सर्फा नाला पुल

रास्ते में उन्हे सर्फा नदी (गूगल मैप में सर्फा नाला) मिली। किसी भी अलग सी चीज, अलग से दृश्य का चित्र लेने का मैंने उन्हें अनुरोध कर रखा है। उन्होने नदी का नाम बताया, उससे मैंने गूगल मैप पर सर्च किया। मैप के अनुसार उसपर एक पुराना पुल भी है। शायद नये पुल से उस पुराने पुल का चित्र प्रेमसागर जी ने लिया था –

सर्फा नाले के पुराने पुल का चित्र

प्रेमसागर जी को आगे सोन नदी मिली। उसके कुछ अच्छे चित्र उन्होने भेजे। बेहतर मोबाइल से बेहतर चित्र! मेघाच्छादित आकाश नजर आता है और नीचे अच्छी खासी जलराशि। नीचे जल था, ऊपर जल था! जलमय ही दृश्य था सोन नदी का।

सोन यहां काफी बड़े पाट वाली लग रही हैं – यद्यपि मैदानी भाग में जो उनका नद वाला चरित्र है, वह परिलक्षित नहीं होता। हम अजीब लोग हैं; झरना दिखे तो नदी, नदी दिखे तो नद या झील और नद दिखे तो सागर की कल्पना करने लगते हैं। जो सामने होता है उसे जस का तस अनुभव करने का सुख लेना हमारी प्रवृत्ति में नहीं है। एक अच्छे यात्री में वह प्रवृत्ति गहरे से होनी चाहिये। यह नहीं कि उसे विंध्य या सतपुड़ा का जंगल दिखे तो मन दन्न से अमेजन के जंगलों की कल्पना करने लगे। पर मैं तो पदयात्री हूं नहीं! मेरी अपनी सीमायें हैं!

सोन नदी, शहडोल से अनूपपुर के रास्ते में

सबसे घटिया यात्री वे होते हैं, जो बड़ा खर्चा कर जगहों पर जाते हैं और वहां देखने की बजाय अपना वानर जैसा मुंह कई कई कोणों से घुमा कर, ताजमहल के कगूरे पर हाथ रख कर और एफिल टावर से लटकती गर्लफ्रैण्ड का टनों चित्र लेना ही ध्येय मानते हैं यात्रा का। उत्तमोत्तम यात्री प्रेमसागर जैसे हैं। कभी मन होता है उनसे पूछूं कि अपना खर्चा का हिसाब रखते हैं? कितना खर्चा होता होगा सप्ताह भर में। और खर्चा क्या होगा? दो रोटी खाने वाला, पैदल बिना टिकट चलने वाले का खर्चा भी क्या?! यात्री हो तो प्रेमसागर जैसा। अपनी बुद्धिमत्ता के बोझ से दबा हुआ भी नहीं, बाबा विश्वनाथ की प्रेरणा से चलता चले जाने वाला यात्री। और अब तो मेरी लेखन जरूरतों के हिसाब से बेचारे अपना मोबाइल-कैमरा आदि साधने लगे हैं! :lol:

रास्ते में अनूपपुर से करीब पंद्रह किलोमीटर पहले उन्होने काली माता के मंदिर में विश्राम भी किया था। उस मंदिर के चित्र भी हैं उनके ह्वाट्सएप्प मैसेज में। मैं सोचता हूं कि प्रेमसागर सुर्र से यात्रा करते चले जाते हैं। उस प्रकार की यात्रा करने वाला जो नहीं जानता कि उसका दांया पांव उठ रहा है या बांया। पर प्रेमसागर वैसे हैं नहीं। रास्ते में बोलते बतियाते, रुकते सुस्ताते भी चलते हैं। यह तो मेरी कमी है कि मैं उनसे विस्तार से खोद खोद कर पूछता नहीं। वह करता होता तो शायद यह डिजिटल ट्रेवलॉग (यह शब्द मेरा नहीं, प्रवीण पाण्डेय का दिया है!) बेहतर बन सकता।

रास्ते में पड़ा काली मंदिर

प्रेमसागर जी ने बताया कि प्रवीण दुबे जी ने फोन कर कहा है कि एक दिन वे अनूपपुर में गुजारें। इसलिये आज वे अनूपपुर में ही रहेंगे। प्रवीण दुबे जी बहुत सरल, मेधावी और संत स्वभाव के व्यक्ति हैं। उनकी सहायता से प्रेमसागर की यात्रा बहुत सहज ढंग से हो रही है। उन्होने एक दिन अनूपपुर में रुकने को कहा है तो उनके मन में कोई बात होगी ही। देखें, आज क्या करते हैं प्रेमसागर।

बिचारपुर शहडोल से सीतापुर अनूपपुर का रास्ता। मार्ग में सोन नदी पड़ती हैं।

कल प्रेमसागर के सोन नदी के चित्र देख कर मुझे थोड़ा कंफ्यूजन था कि अनूपपुर के सीधे रास्ते पर तो सोन पड़ती नहीं हैं। आज उन्होने मैसेज में बताया कि वे सीतापुर, अनूपपुर में हैं। यह अनूपपुर की बजाय बुरहर से अलग रास्ते पर पड़ता है। सीतापुर, अनूपपुर के कुछ चित्र भी प्रेम सागर ने दिये हैं।

सीतापुर अनूपपुर में डिप्टी रेंजर साहब राजेश कुमार रावत जी के साथ प्रेमसागर


गंगा किनारा और बालू लदान के मजदूर


काम मेहनत का है। उसके हिसाब से 3-4सौ (गांव का रेट देखते हुये) न कम है न ज्यादा। जो गांव में रहना चाहते हैं, वे इसको पसंद करेंगे; वर्ना अवसर देख कर महानगर का रुख करेंगे। मजदूर गांव और महानगर के बीच फ्लिप-फ्लॉप करते रहते हैं।

शाम के साढ़े पांच बजे थे। मैं गंगा तट की ओर जा रहा था। बहुत से बालू के लदे ट्रेक्टर-ट्रॉली दूसरी ओर से आ रहे थे। तीन-चार किलोमीटर की यात्रा में एक…दो…तीन…चार ट्रेक्टर बालू लदे आते दिखे। गांव की पतली सड़क, उसपर अगर ट्रेक्टर आ रहा हो तो अपनी कार, भले ही वह सबसे छोटे आकार की कार हो, रोकनी पड़ती है। आने जाने वाले दो वाहनों को गुजरने का मार्ग ही नहीं है वह।

कार तो क्या कभी कभी साइकिल पर भी दूसरी ओर से गुजरूं तो साईकिल रोकनी पड़ती है। इसमें पहले बुरा लगता था और बालू या मिट्टी वहन को तुरंत पर्यावरण खराब करने की बात से जोड़ कर अपने रुकने की बुड़बुड़ाहट को एक तर्क का जामा पहनाया करता था। पर अब उस सब की आदत पड़ गयी है। लोगों के पास आमदनी का यही जरीया है। शॉर्टकट। अपने खेत की मिट्टी बेचना या गंगा की बालू बेचना आसान तरीका है कमाई का। इससे बहुत से लोगों को रोजगार मिलता है। वर्ना आजकल रोजगार का जो हाल है, सो है। लोग हलकान हो कर कूद कर बम्बई जाते हैं पर वहां भी बारिश के मौसम में कौन रोजगार मिल रहा है?

जब कार रुकी है तो मैं चौथे ट्रेक्टर का चित्र खींचता हूं – पीछे की सीट पर बैठे बैठे। शाम हो गयी है। पता नहीं गंगा तट पर कब तक बालू का लदान चलेगा?!

घाट पर पंहुच कर देखता हूं कि आज का काम खत्म हो गया है। नाव से जमीन पर और जमीन से ट्रेक्टर में बालू का यानांतरण करने वाले मजदूर अपने अपने बेलचे रख चुके हैं। कुछ घर जाने की तैयारी में गंगाजी में हाथ मुंह धो चुके हैं। कुछ नहा भी लिये हैं। या अधिकांश स्नान कर लिये हैं। उसके बाद अपने अपने दोपहर के भोजन के बर्तनों की पोटलियां या तीन-चार खाने वाले डिब्बे ले कर घर लौट रहे हैं। ये सभी आसपास के गांवों के लोग हैं। द्वारिकापुर, कोलाहलपुर, अगियाबीर और करहर के। एक व्यक्ति से मैं पूछता हूं – कितना मिलता है दिहाड़ी?

“दिहाड़ी नहीं मिलता गुरू जी। काम के हिसाब से मिलता है। काम का नापतौल करने वाले जितना ट्रेक्टर लदान किया उसके हिसाब से पैसा देते हैं।” लगभग ऐसा ही सिस्टम भट्ठा मजदूरों का पेमेण्ट का देखा है मैंने। कितनी ईंट उन्होने ढोई, उसके हिसाब से पैसा मिलता है। वह व्यक्ति मुझे बॉटमलाइन बताता है – “तीन चार सौ तक मिल जाता है।”

वह व्यक्ति मुझे बॉटमलाइन बताता है – “तीन चार सौ तक मिल जाता है।”

काम मेहनत का है। उसके हिसाब से 3-4सौ (गांव का रेट देखते हुये) न कम है न ज्यादा। जो गांव में रहना चाहते हैं, वे इसको पसंद करेंगे; वर्ना अवसर देख कर महानगर का रुख करेंगे। मजदूर गांव और महानगर के बीच फ्लिप-फ्लॉप करते रहते हैं। कूद कर बम्बई जाते हैं और फिर हल्के से ट्रिगर पर, किसी तीज-त्यौहार-शादी-मरन पर घर आने की सोचते हैं।

अभी राजेश मुझे उस दिन फोन कर रहा था। छ महीना पहले यहाँ बालू का लदान कर रहा था। अब बम्बई में है। “काम नहीं है गुरूजी बम्बई में भी। बारिश के टाइम में सब ठप है। घर लौटना है पर टिकट ही नहीं मिल पा रहा। अब देखता हूं, नहीं मिला टिकट तो बिना टिकट लौटूंगा।”

राजेश वहां से यहां आयेगा, भले ही डब्ल्यू.टी.। और यहां हैं कई जो बम्बई जाने के मंसूबे बना रहे हैं। उत्तरप्रदेश सरकार विकास कर यहीं बम्बई बनाने के सपने बेच रही है। पर जैसे जैसे चुनाव आयेंगे, इस सपने की बजाय भाजपा या अन्य सभी दल जातिगत/धर्मगत पोलराइजेशन पर ही चुनाव लड़ेंगे।

यहां न खेती का स्वरूप बदलेगा, न कोई इण्डस्ट्री आयेगी। रंगदारों के खिलाफ सरकार वाहन पलटा रही है, पर रंगदार मरे पर रंगदार पैदा होते हैं। रंगदारी रक्तबीजों का प्रदेश है पूर्वांचल।

बालू यानांतरण करने वाले मजदूर नहा कर अपना अपना टिफन-पोटली समेट घर जाने वाले हैं।

चार पांच नावें आज का काम खत्म कर गंगा किनारे पार्क हो गयी हैं। एक नाव अपने डीजल इंजन का आवाज सुनाती किनारे लग रही है। एक और नाव वाला किनारे नाव लगा कर कह रहा है कि अभी आज का पैसा बंटा नहीं। जैसे मजदूर का पेमेण्ट है वैसे ही फेरा के हिसाब से नाव का भी पेमेण्ट करता है ठेकेदार। नावें नदी के उसपार से इसपार बालू ढो कर लाती हैं।

एक नाव अपने डीजल इंजन का आवाज सुनाती किनारे लग रही है।

बारिश का मौसम है। बालू खूब गीली आती है। अधिकतर नावें बांस की खपच्ची लगा कर एक कमरा नुमा स्थान बनाये हुये हैं। ऊपर पॉलीथीन या तिरपाल लगा है। मन होता है ऐसी किसी नाव में रात गुजारी जाये। पता नहीं गंगा किनारे अकेले में रात में सांय सांंय हवा की आवाज के साथ नाव के आसपास चुडैल-भूत-पिशाच न आते हों। पास में ही चईलहवा घाट (श्मशान घाट) भी है। … एक दो और लोग साथ रहें तो रुका जाये। यहीं बाटी-चोखा लगे! :-)

नाव वाला कह रहा है कि आज का पेमेण्ट अभी नहीं हुआ।

बारिश के मौसम में बालू का काम कम होता है। नवरात्रि बाद जोर पकड़ेगा। अभी घाट पर दो नावें उलटी लिटाई गयी हैं। उनका वार्षिक रखरखाव का काम हो रहा है। सड़ी लकड़ी और जंग लगा लोहा बदल कर उनका जीवन बढ़ाया जायेगा। रेलवे की भाषा में कहूं तो ए.ओ.एच. हो रहा है – Annual Over Haul.

नाव का ए.ओ.एच. हो रहा है। वार्षिक रखरखाव/मरम्मत

करीब पंद्रह मिनट का गंगा तट का भ्रमण और इतनी खोज खबर ले लेता हूं। यह सब मौज के लिये कर रहा हूं। किसी अखबार में या किसी चैनल वैनल में होता तो कुछ कमाई भी हो जाती। पर वह सब का शऊर ही भगवान तुम्हें नहीं दिये जीडी। वह तो कृपा की कि रेलवे की अफसरी दे दिये। वर्ना बिलाला घूमते। तब यहां फोटो खींचने कार में चढ़ कर थोड़े ही आते! :-)

मेरा ड्राइवर मेरे खब्तीपने पर कुलबुला रहा है। सोच रहा है कि जल्दी घर लौटूं तो वह कार खड़ी कर अपने घर जाये। मुझे घर लौटने की जल्दी नहीं है, पर उसे है। वह मेरे आगे पीछे घूम रहा है।

घर वापस लौटता हूं मैं। आज इतना बहुत है!

द्वारिकापुर का घाट

प्रेमसागर अनूपपुर की ओर


17 सितम्बर 2021:

कल उन्होने बारिश के लिये बेहतर तैयारी कर ली है। रेनकोट तो नहीं मिला, एक छाता खरीद लिया है। यह भी बताया कि छाता केवल अचानक आयी बारिश से बचने और कोई शरण ढूंढने के काम ही आयेगा। बारिश में चलते चले जाने के लिये नहीं!

सवेरे उठ कर मैं यहाँ भदोही का नहीं, शहडोल का मौसम तलाशता हूं वेदर चैनल पर। वह ‘मोस्टली क्लाउडी’ बताता है और बारिश की सम्भावना 70 परसेण्ट। पक्का नहीं लगता कि प्रेमसागर आज भी निकल पाये होंगे आगे की पदयात्रा के लिये; कल तो सात किलोमीटर चलने के बाद उन्हे बैक टू बिचारपुर होना पड़ा था।

सवा छ बजे सवेरे उनसे पूछा तो बोले – “हर हर महादेव! आज मौसम खुला है। हल्के बादल हैं एक तरफ। निकल ही लिये हैं हम। थोड़ा देर से निकले। अभी दो तीन किलोमीटर चले हैं। रस्ता में दृश्य अच्छा दिखा तो फोटो लेंगे।”

कल उन्होने बारिश के लिये बेहतर तैयारी कर ली है। रेनकोट तो नहीं मिला, एक छाता खरीद लिया है। यह भी बताया कि छाता केवल अचानक आयी बारिश से बचने और कोई शरण ढूंढने के काम ही आयेगा। बारिश में चलते चले जाने के लिये नहीं!

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची

साढ़े आठ बजे उन्होने अपडेट दिया। मौसम साफ है। धूप भी निकल आ रही है। करीब 16 किलोमीटर चल लिये हैं। अभी जंगल नहीं पड़ा। शहर और गांव ही दिख रहे हैं। एक जगह राधास्वामी वालों का सत्संग का स्थान है। “उसका फोटो खींच लें तो आपको भेजते हैं।”

वीरेंद्र सिंह परिहार, वन रक्षक (मुंशी जी)

प्रेम सागर अपनी यात्रा में चित्रों की भूमिका को उत्तरोत्तर समझते स्वीकारते और अपनाते जा रहे हैं। उन्होने वन रक्षक वीरेंद्र सिंह परिहार के एक चित्र को भेजा और साथ में टिप्पणी दी – “विरेंद्र सिह परिहार ( वन रक्षक) यही देख रेख मै हैंं। ये बहुत सेवा करते है। यही भाई साहब खुद ही चारो साइड घुमा रहै है।” कुल मिला कर सहायक व्यक्ति के बारे में कृतज्ञता ज्ञापन का यह तरीका उन्हें समझ में आ रहा है कि किसी भी व्यक्ति का उनकी पदयात्रा-विवरण में जिक्र हो।

वन रक्षक वीरेंद्र सिंह परिहार – “ये बहुत सेवा करते है। यही भाई साहब खुद हि चारो साइड घुमा रहै है।”

वीरेंद्र सिंह जी से मैं भी बात करता हूं। सरल व्यक्ति लगे। वन रक्षक हैं पर तैनाती वन में नहीं बिचारपुर ‘रोपनी (नर्सरी)’ में है। मध्यप्रदेश की वन सम्पदा में जो भी दुर्लभ, विचित्र और औषधीय वनस्पति है, उसकी नर्सरी का सुपरविजन वीरेंद्र सिंह जी के जिम्मे है। रीवा जिला में उनका गांव है। वन विभाग में एड-हॉक पर थे। सन 2017 में परमानेंट वन रक्षक बने हैं। वनों से खोज खोज कर वनस्पति लाये हैं बिचारपुर नर्सरी के लिये।

वीरेंद्र सिंह जी ने नर्सरी के अनेकानेक पौधों के बारे में प्रेम सागर को बताया। मसलन यह अगस्त्य मुनि है। यह वृक्ष जहां होता है, वहां तड़ित बिजली नहीं गिरती है।

अगस्त्य मुनि। यह वृक्ष जहां होता है, वहां तड़ित बिजली नहीं गिरती है।

बच का चित्र भी भेजा। बच के औषधीय गुणों के बारे में पहले पंकज अवधिया जी की एक अतिथि पोस्ट मेरे इस ब्लॉग पर उपलब्ध है। यह वनस्पति मानसिक तनाव दूर करने के लिये बहुत उपयोगी है।

बच – यह वनस्पति मानसिक तनाव दूर करने के लिये बहुत उपयोगी है।

यह गरुड़ का पौधा है। यथा नाम तथा गुण। प्रेम सागर कैप्शन देते हैं – गरुण के पौधे है। इनका पत्ती या फल को; कोइ भी सर्प काट ले तो; पीस कर पिला देने से उसका विष खत्म हो जाता है इस पौधे के नीचे कोई भी सर्प आता है तो मर जाता है।

गरुड़ – इनका पत्ती या फल को; कोइ भी सर्प काट ले तो; पीस कर पिला देने से उसका विष खत्म हो जाता है इस पौधे के नीचे कोई भी सर्प आता है तो मर जाता है।

इसके अलावा अनेकानेक वनस्पतियों के विवरण दिये हैं प्रेमसागर जी ने। उन सब के बारे में लिखा जाये तो छोटी पुस्तिका ही बन जाये! वीरेंद्र सिंह परिहार जी की इस वनसम्पदा रक्षण में भूमिका नीव के पत्थर की है। बाबा राम देव कभी शहडोल की बिचारपुर नर्सरी आये नहीं और वीरेंद्र सिंह परिहार जी से मिले नहीं; वर्ना इन्हें तो अपने आश्रम में ही रख लेते परमानेंटली! :-)

प्रेम सागर और वीरेंद्र सिंह परिहार। वीरेंद्र प्रेम सागर जी को एक गणेश मंदिर दिखाने ले गये थे।

और भी अनेक चरित्रों से परिचय होगा प्रेमसागर की कांवर पदयात्रा के दौरान। मुझे अहसास है कि मेरा बहुत सा समय प्रेमसागर के चक्कर में लगने वाला है। तब तक, जब तक प्रेमसागर को मीडिया वाले न झटक लें! :lol:

चलिये, कल पता चलेगा कि कहां तक पंहुचे प्रेमसागर पांड़े! कल की पोस्ट कल देखियेगा। हर हर महादेव! जय हो!


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