इस जगत के सुख दुख यहीं भोगने हैं


कुछ दिन पहले कैलाश जी पर एक पोस्ट लिखी थी। उनके द्वारा कुंआ खुदाई का जो विवरण दिया गया था, वह उसमें था।

मुझे लगता था कि कैलाश जी स्वयम तो एक फीचर फोन रखते हैंं जिसका प्रयोग केवल बातचीत के लिये होता है। वे एसएमएस का भी प्रयोग (सम्भवत:) नहीं करते या जानते। सो मुझे लगा कि मैं ही उनको उनके बारे में लिखा दिखाऊं और पढ़ कर सुनाऊं। इसलिये सवेरे उनके घर फिर गया।

Kailash Dubey
कैलाश दुबे

वे लेटे थे। बताया कि रात में पंखा चलाया था। मच्छरों के प्रकोप से बचने के लिये जरूरी था। पर लगता है उससे ठण्ड लग गयी। शरीर में ढीलापन था लेकिन उससे अधिक, उनके जोड़ों-घुटनों में दर्द बढ़ गया था। सवेरे स्नान – पूजा तो कर लिया, परंतु उसके बाद और कुछ करने का मन नहीं हुआ। इसलिये खाट पर लेटे थे। मुझे देख कर उठ बैठे।

मैंने उनके बारे में लिखा उन्हे दिखाया। उन्होने मेरे लेखन और शैली की प्रशंसा की। मैं चलने को हुआ तो जोर दे कर उन्होने चाय के लिये रोका। घर से चाय बन कर बाहर आये, तब तक हम लोगों ने इधर उधर की बातचीत की। बातें गांव के बारे में, लोगों के बारे में और खुद के कष्ट-व्याधियों के बारे में भी थीं। किसी की निंदा, किसी पर कटाक्ष नहीं। बदलते समय के बारे में और अपनी दैहिक, आत्मिक समस्याओं के बारे में बातें थीं। उन्होने बताया कि रोग-दोष तो लगा ही रहेगा इस जगत में। जो कुछ इस जन्म का और इससे पूर्व का संचित है, उसे तो ‘भोगना’ ही है। वही सुख-दुख है।

एक कहानी सुनाई कैलाश जी ने। एक महात्मा थे। पंहुचे हुये थे। नगर सेठ उनसे मिलने के लिये आया। महात्मा अस्वस्थ थे। तेज बुखार था। कहलवाया कि किसी और दिन आयें। नगरसेठ ने कहा कि उनका उसी समय मिलना आवश्यक है।

कुछ क्षणो बाद महात्मा जी ने नगर सेठ को बुलाया। उनकी कुटिया में नगर सेठ ने देखा कि साधू जी तो बड़े आराम से अपने आसन पर बैठे हैं। चारपाई खाली बिछी है।

“महाराज, आप तो स्वस्थ हैं। आपका शिष्य तो बता रहा था कि आप को बहुत तेज बुखार है!”

“वह तो है। उधर कोने में टंगी मृगछाला देखो।” अलगनी पर टंगी मृगछाला बड़ी तेज कांप रही थी जबकि कमरे में हवा रुकी हुई थी। “आप मिलना ही चाहते थे मुझसे तो मैने अपना बुखार इस मृगछाला को दे दिया है। आप चले जायेंगे तो वह वापस ले कर भोंगूंगा।”

“जब आप इतना कर सकते हैं, अपना ताप मृगछाला को दे सकते हैं तो इस मृगछाला को फिंकवा क्यों नहीं देते? उसके साथ आपका ताप, आपकी अस्वस्थता भी चली जायेगी!” नगरसेठ ने अपनी जिज्ञासा व्यक्त की।

“यह नहीं हो सकता। इस जगत के जो सुख दुख हैं, वे हमें भोगने ही हैं। निर्लिप्त भाव से उन्हें इसी जगत में ही भोग कर खत्म कर दिया जाये, यही उत्तम है। अन्यथा वे अगले जन्म में आपका पीछा करेंगे। उन्हें आपको भोगना तो है ही।” साधू महराज ने उनकी शंका का निवारण किया।

मोक्ष, कर्म, पुण्य-पाप संचय और पुनर्जन्म – हिंदू धर्म के ये आस्था के मजबूत स्तम्भ हैं। मैंने स्वामी चिन्मयानंद जी की गीता की टीका में पुनर्जन्म सिद्धांत का उल्लेख अन्य धर्मों में होना भी पाया है। यहां तक कि इस्लाम में भी। आप निम्न चित्र में अंतिम पैराग्राफ की अंतिम पंक्तियां पढ़ें जो पैगम्बर साहब के कथन पर हैं।

Geeta 2.12 Commentary
भग्वद्गीता अध्याय 2.12 पर स्वामी चिन्मयानंद जी की टीका

कुछ ऐसा ही श्री सूर्यमणि तिवारी जी ने भी मुझसे कहा था, जब मैं, अपनी पत्नीजी के साथ उनसे मिला। उस मुलाकात के विषय में आगे किसी ब्लॉग पोस्ट में लिखूंगा।


[स्वामी चिन्मयानंद (जब मैं बिट्स, पिलानी का छात्र था, तब वे) विजटिंग फेकल्टी थे बिट्स, पिलानी में। उन्होने मुझे भग्वद्गीता, केन-कठ उपनिषद और भजगोविंदम के विषय में व्याख्यान दिये थे। इस प्रकार से वे मेरे गुरु थे। उनकी गीता पर टीका अंग्रेजी में और उसका हिंदी अनुवाद – दोनो मेरे पास हैं। मैं नित्य स्नान के बाद कुछ श्लोक और उनपर स्वामी जी की कमेण्ट्री पढ़ता हूं। आज देखा तो पता चला कि स्वामीजी की गीता पर टीका – The Holy Geeta – हार्डबाउण्ड में तो 480.- रुपये की है पर किण्डल पर बिना पैसे के उपलब्ध है। आप कोशिश कर सकते हैं।]

The Holy Geeta and Swamy Chinmayanada

महुआ टपकने लगा है और अन्य बातें


उसकी माँ आधिया पर खेत जोतती है टुन्नू पण्डित का। मां अपने बड़े लड़के के साथ चने की फसल खलिहान में समेट रही थी। इस बच्चे के अभी काम में लगने के दिन नहीं आये हैं। स्कूल भी बंद हैं। वह टुन्नू पण्डित के परिसर में बहेड़ा के गिरे फल बीन कर उनकी गिरी फोड़ कर खा रहा था। पत्थर की एक बेंच पर बैठा था और उसी पर एक दूसरे पत्थर से बहेड़ा की गिरी (बीज) फोड़ रहा था। पूरे मनोयोग से। मेरा चित्र लेना भी नहीं देख रहा था।

वह एक पत्थर से बहेड़ा के बीज फोड़ कर खा रहा था। गरीब का बदाम

बहेड़ा के फल गिरते महीना से ऊपर हो गया। अब महुआ भी टपकने लगा है। चार पांच दिन हो गये, आसपस टपक रहा है महुआरी में। बच्चे एक एक पन्नी (पॉलीथीन की थैली) में महुआ के फूल बीनने लगे हैं। जुनून सा दिखता है उनमें महुआ बीनने का। गांव की बभनौटी की महुआरी में तो यह महिला भी महुआ बीनती दिखी। करीब डेढ़ महीना बच्चे और महिलायें व्यस्त रहेंगे महुआ उपक्रम में।

गांव की बभनौटी की महुआरी में तो बच्चों के साथ यह महिला भी महुआ बीनती दिखी।

उपले बनाने का काम, बावजूद उज्वला योजना के घनघोर विज्ञापन के, खूब जोरों पर है। हर सड़क के किनारे महिलायें सवेरे सवेरे उपले पाथते दिख जाती हैं। सवेरे एक दो घण्टे का यह नित्य अनुष्ठान है उनका – बहुत कुछ वैसे ही जैसे मेरे बचपन में सवेरे महिलायें अपने घर का दुआर लीपती और जांत पर दिन भर की जरूरत का आटा पीसती थीं। उपले पाथते हुये गीत गाने की परम्परा नहीं है वर्ना इसका एक सांस्कृतिक महत्व भी हो जाता। यह हाईवे के किनारे बना फुटपाथ उपले सुखाने के काम आता है।

यह हाईवे के किनारे बना फुटपाथ उपले सुखाने के काम आता है।

चाहे सड़क हो या रेल, सार्वजनिक स्थान लोगों के निजी उपभोग के लिये नामित है। रेलवे स्टेशन पर यह नया लम्बा साढ़े छ सौ मीटर का प्लेटफार्म बना है। रेलवे के हिसाब से यह विकास का हिस्सा है; मेरे ख्याल से फिजूलखर्ची। उसका उपयोग बगल के गांव वाले (जो शायद रेलवे की भी जमीन दाब कर अपने घर बनाये हैं) नये बने प्लेटफार्म का उपयोग अपनी फसल के खलिहान के रूप में करते हैं।

गांव वाले नये बने प्लेटफार्म का उपयोग अपनी फसल के खलिहान के रूप में करते हैं।

गंगा सिमट गयी हैं। अभी और सिमटेंगी। अप्रेल में जब पहाड़ों पर बर्फ पिघलेगी, तब गंगा में पानी बढ़ेगा। आज देखा, अब तो घेंटी (साइबेरियाई पक्षी) भी नहीं दिखी। शायद वापस लौट गये हैं। एक आदमी कोलाहलपुर के घाट पर स्नान के लिये जा रहा था। फोन पर किसी को तेज आवाज में निर्देश दे रहा था – “कोठरी में सिलिण्डर रखा है। उसे फलाने की दुकान पर रखवा देना। पैसा आ कर दूंगा। कहीं भागा थोड़े जा रहा है पैसा। बता देना कि गैस वाली गाड़ी आयेगी तो भरा सिलिण्डर उतरवा ले। … अरे भाई, कह रहा हूं न कि पैसा आ कर दे दूंगा।” बंदा गंगा स्नान को जा रहा है, अपने मन के झंझट साथ ले कर जा रहा है। डुबकी लगायेगा पर झंझट वहां भी त्याग कर नहीं आयेगा। सिलिण्डर भरवाने की चिंता चिपकी रहेगी उसके साथ!

बंदा गंगा स्नान को जा रहा है, अपने मन के झंझट साथ ले कर जा रहा है। डुबकी लगायेगा पर झंझट वहां भी त्याग कर नहीं आयेगा।

सर्दी कम हो गयी है। दिन में तो गांव में भी बाहर निकलने में कष्ट होने लगा है। पर सवेरे जब गंगा तट पर जाने को निकला तो हल्की ठण्ड थी। एक जगह तो तीन आदमी पूर्व की ओर मुंह किये सूरज की ऊष्णता जब्ज करते पाये। मेरा भी मन हुआ कि घर से एक मोटा कमीज या आधा स्वेटर पहन कर निकलता तो बेहतर होता। पर छोटे मकान या मड़ई वाले लोग अब खुले में सोने लगे हैं। यहां मुझे पेड़ के नीचे एक खाट दिखी। ऊपर पेड़ की टहनी से समेटी हुई मच्छरदानी लटकी हुई थी। सर्दी कम हुई तो मच्छर बढ़ गये हैं।

यहां मुझे पेड़ के नीचे एक खाट दिखी। ऊपर पेड़ की टहनी से समेटी हुई मच्छरदानी लटकी हुई थी।

उड़द और सरसों कट कर खलिहान में आ चुकी है। अब अरहर कटाई प्रारम्भ हो गयी है। आसपास दिखता है कि फसल अच्छी है। अरहर की कटाई करती महिलायें भी कोई गीत नहीं गातीं। उन्हें आपस में बातचीत करते, बड़बड़ाते या परनिंदा करते ही पाया।

अरहर की कटाई करती महिलायें भी कोई गीत नहीं गातीं। उन्हें आपस में बातचीत करते, बड़बड़ाते या परनिंदा करते ही पाया।
और अंत में –

आज का सबसे अच्छा सीन यह था। डईनियाँ में यह बछड़ा उछल उछल कर अपनी मां के थन से दूध (जो भी ग्वाले द्वारा दुहने से बचा हो) पी रहा था।


राजबली के साथ कुछ समय – बसुला और कलम का मेल


एक सप्ताह पहले राजबली को खिन्न पाया था। वे एक गुमटी बना रहे थे। बताया कि किसी ग्राहक के लिये नहीं, घर के बाहर लगेगी और पोता उसमें दुकान लगायेगा। पान मसाला बेचेगा।

“अरे, आप लोग तो कारीगर हैं। हाथ में हुनर है। इस तरह दुकान लगाने की क्या जरूरत? काम तो आप लोगों के पास आता है!” – मैंने कहा। मुझे वास्तव में आश्चर्य हो रहा था।

राजबली विश्वकर्मा गांव के कारीगर हैं – खाती और लुहार। भट्ठी, धौंकनी, बसुला, घन, हथौड़े से काम करने वाले। खेती किसानी उनके बल पर चलती रही है। आज भी उनके हुनर के अनेक प्रकार के काम गांवदेहात और शहर को कराने होते हैं। मेरी मचिया के फ्रेम उन्होने ही बनाये हैं।

गुमटी बनाते राजबली

जो उस दिन राजबली ने कहा; उससे स्पष्ट हुआ कि हुनर ही काफी नहीं। काम समय और नियमितता मांगता है। आपको अपनी साख के अनुसार मिल कार्य समय पर निपटाना पड़ता है – गुणवत्ता से भी और समय से भी। उसमें कोताही नहीं चल सकती। लगता है, उनके पोतों ने काम करने में कोताही की थी। उसका दर्द राजबली की बातचीत में झलक रहा था। बताया कि सवेरे छ बजे से काम में लगे हैं और चार घण्टे में पेट में एक दाना तक नहीं गया है।

दो ही दिन में गुमटी लगभग बन गयी है। उनकी गाय जहां बंधा करती थी, वहां अब गुमटी रख दी गयी है। अभी शायद कुछ काम बाकी है। पर मैं आशा करता हूं कि गुमटी का प्रयोग करने की उनके परिवार को जरूरत न पड़े। उनका परिवार अपने हुनर, अपने धर्म के अनुसार चले। देखें, आगे क्या होता है।

[…]

उस दिन की खिन्नता के उलट आज राजबली प्रसन्नमन थे। बसुला से एक लम्बी लकड़ी छील रहे थे। मैंने पूछा – क्या बना रहे हैं?

“फरसा का बेंट।”

बसुला से फरसा के बेंट के लिये लकड़ी छील रहे राजबली

“पर इसको तो बसुले से छील कर आधा कर दे रहे हैं। आप खुद ही कहते हैं कि लकड़ी बहुत मंहगी है। उसमें भी आधी लकड़ी छिलाई में निकल जायेगी। पैसा तो आप पूरी लकड़ी का ही लेंगे?!”

राजबली ने बताया कि लकड़ी मंहगी है, उसकी चिराई भी मंहगी है और छिलाई का भी अपना दाम है। पर कोई चीज बरबाद नहीं होती।

राजबली ने मेरे लिये कुर्सी मंगाई। घर से एक महिला चाय ले कर आई। मुझे कहा कि पी लूं। “चीनी बहुत कम डाली है।”

राजबली के चीनी न लेने के बारे में सवाल पूछने पर मैंने कहा – “नौकरी की जिंदगी में शारीरिक काम तो किया नहीं। चीनी जितनी खानी थी जिंदगी भर में, उससे दुगुनी, तिगुनी खा डाली। तो अब रोक तो लगानी ही पड़ेगी। … आपकी तरह बसुला तो चलाया नहीं। इसी लिये कहता हूं कि आप अपना काम सिखा दीजिये मुझे।”

“आप से नहीं चल पायेगा। दो दिनमें पेखुरा पिराई लागे। हाँथ की कोई न कोई उंगली कट जायेगी या चोटिल हो जायेगी। अस्पताल में भर्ती होने की नौबत आ जायेगी। आप मेरा काम नहीं कर सकते, मैं आपका काम नहीं कर सकता।” राजबली कहते हैं कि दो तीन घण्टा बसुला और घन चलाते हैं वे। भट्ठी की धौंकनी भी खींचते हैं। इस उम्र में भी इतना करते हैं। अब आंखें कमजोर होने लगी हैं इसलिये पलंग बनाने का बारीक काम नहीं करते, बाकी सब कर रहे हैं।

मैं उनकी चाय की तारीफ करता हूं तो वे अपने तरीके से कॉम्प्लीमेण्ट लेते हैं। “चाय हम लोगों के लिये क्या है! उपरी क पेट सोहारी से थोरौ भरथअ (उपले की जरूरत वाली खुराक के लिये पतली मठरी से कुछ फर्क थोड़े ही पड़ता है)। हम लोग तो मोटी मोटी खूब रोटियां खाने वाले लोग हैं।” उनके कहने का तात्पर्य यह था कि ग्लास भर की चाय उन लोगों के लिये तो ऊंट के मुंह में जीरा है!

राजबली ने कहा कि अगर मैं उनसे दस बीस साल पहले मिला होता तो वे मेरे साथ ही हो लेते। कोई भी नौकरी दिला देता तो ज्यादा बढ़िया रहता। … मुझे उनका काम स्वप्निल लगता है और उन्हे मेरी साहबी। हम दोनो जानते हैं कि एक दूसरे से केवल बोल बतिया ही सकते हैं। आपस में मिलने का आनंद ले सकते हैं। न वे मेरा काम कर सकते हैं न मैं उनका।

पर हम दोनो को एक दूसरे का साथ अच्छा लगता है। ऐसा मुझे अनुभव होता है। उन्हे भी होता ही होगा! उनसे मुलाकातें होती ही रहती हैं।

राजबली के घर के आगे गुमटी रख दी गयी है। आशा है उसकी जरूरत न पड़े। उनका परिवार अपने हुनर से ही समृद्धि अर्जित करे।

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